शौचालय का प्रेत भाग - १

18 नवम्बर 2018   |  विकास बौंठियाल   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

शौचालय का प्रेत भाग - १  - शब्द (shabd.in)

ये घटना सन् २०१३ की है, मैं तब मुँबई के Posh Area लोखंडवाला के पास के ओशिवरा के FAASOS fast food chain के एक Outlet में Store Manager के रूप मे काम करता था। वहाँ पर अक्सर सप्ताह के पाँच दिन मैं सुबह की Morning Shift करता था और जिस दिन मेरे Assistant Manager की Weekly Off होती, उस दिन रात की Closing Shift करता और एक दिन मैं Weekly Off लेता। लेकिन जब मेरी Morning Shift होती तब भी मैं अक्सर काम से ८-९ बजे के बाद ही निकलता और मुँबई मे मेरे मित्रों की संख्या इतनी थी की काम से घर निकलते-निकलते जहाँ-जहाँ से मैं गुजरता वहाँ-वहाँ पर कोई ना कोई मुझे धर ही लेता और फिर ईधर-उधर की बातचीत करते-करते काफी देर हो जाती और मैं कितनी भी जल्दी काम से निकलू लेकिन तब भी मैं १०-११ बजे से पहले घर कभी नहीं पहुँच पाता। उस दिन भी देर कुछ ज्यादा ही हो गई थी, हालाँकी store मे काम ज्यादा तो नहीं था किंतु आदतन काम करते-करते समय का पता ही नहीं चला और मैंने जब घडी देखी तो ९ बज चुके थे। मैंने अब Handover देकर घर जाने का निर्णय लिया और अपना बैग समेटने लगा। लंच बॉक्स, मोबाईल, चार्जर, चाबियाँ सब समेटकर निकलने से पहले Juniors से कुछ जरूरी Followups लेते-लेते लगभग साढे नौ बज चुके थे। तभी अचानक Store से निकलते ही मुझे एक मित्र का फोन आया और उसने मुझे एक जरूरी काम से पास की चाय की टपरी पर बुलाया। मुँबई के कई Posh Area मे देर रात तक चाय की छोटी दुकाने खुली रहती है और सुबह भी ३ से ४ के बीच मे वे चाय की टपरिया खुल भी जाती है, तो मैंने भी मित्र को वहीं टपरी पर इंतजार करने के लिए कहाँ। हम जिस चाय की टपरी पर मिलनेवाले थे वो ११-१२ बजे तक चलती थी और सुबह मे भी तडके ३:०० - ३:३० तक खुल जाती है। मैंने गणेश को Bike से मुझे वहाँ छोडने के लिए कहा। गणेश वहाँ पर Team Member था और Bike से Food Delivery का काम करता था। मेरी Shop से चाय की टपरी पैदल ४-५ मिनट की दूरी पर थी। चुँकी मैं बाईक से गया तो १ मिनट से भी कम समय मे चाय की टपरी पर पहुँच गया जहाँ पर मेरा वो लफंडर मित्र पहले से ही पहुँचकर चाय की चुस्कियाँ ले रहा था और सिगरेट के छल्ले उडा रहा था। मेरे पहुँचते ही उसने दो और चाय का ऑर्डर मेरे और गणेश के लिए दिया। चाय पीकर गणेश तो चला गया क्योंकी Store मे काम था लेकिन मैं वहीं पर अपने दोस्त के साथ बाते करने लगा।






बाते करते-करते मैने घडी पर नजर डाली तो लगभग ११ बज चुके थे और अब तक हम कई चाय भी पी चुके थे। काफी चर्चा व बातें करने के बाद हम वहाँ से जाने के लिए उठे। चुँकी हम दोनों उस स्थान पर खडे थे जहाँ से गोरेगाँव व जोगेश्वरी दोनों स्टेशोंन पर जाने के लिए बसें आया करती थी तो मैं बस की प्रतिक्षा करने लगा। मित्र को अन्य दिशा मे जाना था सो वो अपने मार्ग निकल गया। मैं बस के इंतजार मे बस स्टॉप पर खडा था। अधिकतर मैं बस से गोरेगाव ही जाया करता था क्योंकी पहले जोगेश्वी और फिर बाद मे गोरेगाँव आता था तो जोगेश्वरी पहुँचकर मैं एक स्टेशन पिछे रहता था किंतु घर पहुँचने मे समय तो करीब-करीब दोनों ही स्टेशनों से उतना ही लगता था। फिर भी मैं गोरेगाँव ही जाना पसंद करता था क्योंकी जोगेश्वरी मैं कभी कभार ही जाता और इसलिए मैं वहाँ असहज भी महसूस करता था और इसी असहजता के कारण ट्रेन पकडने मे ज्यादा मेहनत करनी पडती थी। मैं भाईंदर जाने के लिए विरार की तरफ जानेवाली ट्रेन मे चढता था और आप Google Search करके विरार लोकल मे भिड की स्थिती का अंदाजा लगा सकते हो, यदि एक ट्रेन छूटी तो दुसरी आने मे १०-१५ मिनट लग जाते थे और कभी-कभी तो आधा घंटा तक लग जाता था, तो ऐसी स्थिती मे दिन भर थके-हारे होने के बाद स्टेशन पर खडा रहना फिर ट्रेन मे चढने पर लगभग ४५ मिनट खडे रहकर सफर करना मानो सच मे जान पर बन आती थी। इसलिए मैं प्लेटफार्म पर बैठने के लिए सीट या कोई बेंच देखता था चुँकी उन दिनों जोगेश्वरी स्टेशन के प्लेटफार्म मे बैठने की ठिक से व्यवस्था नही थी तो इसलिए भी मैं गोरगाँव जाना ही पसंद करता था। गोरेगाँव स्टेशन मे बैठने की व्यवस्था जोगेश्वरी स्टेशन की तुलना मे ज्यादा अच्छी थी एंव सीटों की संख्या भी अधिक थी जिससे बैठने के लिए सीट मिलने की संभावना भी अधिक थी किंतु कई बार तो घर पहुँचकर ही बैठने का सौभाग्य मिलता था। इसके अलावा जोगेश्वरी को नापसंद करने का मेरा एक और कारण था जिसका पता उन्हे लग ही गया होगा जो लोग मुझे बेहद करीब से जानते हैं किंतु उस कारण को यहाँ पर लिखने का मतलब विषय को भटका देना और दुसरी तरफ ले जाना होगा इसलिए मैं इस बात का उल्लेख यहाँ पर नहीं करूँगा। तो अब मैं सीधे आता हुँ अपनी कहानी पर।




मैं जोगेश्वरी रेल्वे स्टेशन पहुँचा ही था की एक ट्रेन आई जो विरार की ही थी और यात्रियों से खचाखच भरी थी, लेकिन विरार ट्रेन मे चढना हो तो भिड नहीं देखनी चाहिए केवल चढने की कोशिश करनी चाहिए, एक बार आप चढे और ट्रेन शुरू हुई तो सबकुछ अपने आप Manage हो जाता है। कम से कम दबते-दबाते, मारखाते हुए या मारते हुए आप घर तक पहुँच ही जाओंगे। मेरी उम्र रही होगी २२-२३ बर्ष की तो युवावस्था के उन दिनो मे जोश भी था इसलिए ट्रेन भरी हो या खाली, सब मुझे एक-समान ही दिखती थी। मुँबई मे विरार की ट्रेनों मे एक Trend रहता है, जिस भी Coach के दरवाजे से ट्रेन मे चढने का प्रयत्न करों तो दरवाजे पर खडे लोग बोल पडते है ट्रेन Pack है, पीछे के Coach मे जाओं, पीछे दुसरी खाली ट्रेन आ रही है वगैरह-वगैरह। ऐसा वे इसलिए कहते हैं ताकी ट्रेन के भितर गर्दी की वजह से बाहर की तरफ दबाव न आये और वे मजे से दरवाजे पर झूलते-लटकते, ठंडी हवा का आनंद लूटते हुए आराम से यात्रा करें। दरवाजे पर लटकनेवाले लोग अक्सर उस ट्रेन के उस Coach के रोज के यात्री होते हैं और एक ही ट्रेन मे कई वर्षों से सफर करने की वजह से आपस मे Group बना लेते हैं और फिर ट्रेन को अपने बाप का समझकर हल्ला हो मचाते हुए चलते हैं अर्थात किसी एक से पंगा लिया तो पूरी ट्रेन मिलकर तुम्हारी कुटाई करेगी। इन लोगों मे युवा, वयस्क, बूढे और कई बार तो दुष्ट महिलाये भी होती है जो कुछ खास तमाशा तो नहीं करती किंतु २ आदमी जितने जगह लेती है और कई यात्रियों को असहज महसूस कराती है। खैर मैं तो इन सब का आदि हो चुका था। तो हुआ युँ की विरार की ट्रेन तो आ चुकी थी और भिड भी दबाकर थी। मैं चाहे तो ट्रेन मे चढ सकता था। मेरे लिए वो भी क्या खाक भिड थी....? मैं तो ना के बराबर जगह वाली ट्रेन मे भी चढकर अभ्यस्त हो चुका था किंतु उस समय भिड इसलिए दिख रही थी क्योंकी मैं बस वो ट्रेन नहीं पकडना चाहता था और इसलिए मैंने अपने आप को समझाया की इसमे भिड बहुत है और पिछे भी कई ट्रेने होंगी, तो जिस ट्रेन मे भी कम भिड हो उसमे चल देंगे। वैसे भी ट्रेन मे चढने का महिर होने के बावजूद कई बार मैं ट्रेन नहीं पकड पाता था और कई बार तो कई ट्रेन मे चढने के प्रयास व काफी ट्रेन छोडने के बाद ही किसी ट्रेन मे चढ पाता था।






उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। ३-४ ट्रेन या शायद उस से भी ज्यादा ट्रेने छोडकर मैं कुछ थक चुका था और मुझे जोर से पेशाब भी आयी हुई थी। फिर मैंने M-Indicator (जो की मुँबई के लोकल बस एंव ट्रेन की समय सारिणी देखने वाला एक APP) पर देखा की अब २-३ बोरिवली की ट्रेनों के बाद एक भाईंदर लोकल है तो मुझे ऐसा महसूस हुआ की मानों प्रभु राम की कृपा ही हो गई। इस लोकल मे विरार की तुलना मे (कुछ अपवाद छोडकर) कम भिड रहती है जिसके कारण ट्रेन मे चढने मे कुछ आसानी होती है, लेकिन तब भी ट्रेन पर चढ ही जाओंगे इसकी कोई Guarantee नहीं रहती। चर्चगेट से लेकर प्रत्येक प्लेटफार्म पर सैकडो लोग इस ट्रेन का इंतजार कई घंटो से करते रहते हैं। कई तो ऐसे भी होते हैं जिनको जाना विरार होता है किंतु वे विरार ट्रेन पकड पाने मे अक्षमता के कारण भाईंदर लोकल पकडकर वहाँ से दुसरी ट्रेन बदल लेते हैं। तो मुझे पता था की इस लोकल को पकडने का एक ही नियम है और वो नियम है “पहले आओं और पहले पाओ”। मतलब ट्रेन स्टेशन पर रूकने से पहले ही आपको चलती ट्रेन मे छलाँग लगानी होगी तब कहीं जाकर आप ये मान सकते हो की आप १००% ट्रेन मे चढ ही जाओंगे। भाईंदर मे तो मैं रहता ही था और आनेवाली ट्रेन का अंतिम स्थान भी वहीं था तो इसलिए मैंने तो १००% की तैय्यारी कर ली थी। मुझे काफी समय से पेशाब आई थी किंतु ट्रेन पकडने के जद्दोजहज मे मैं उसे टाल रहा था। भाईंदर लोकल आने मे अभी थोडा समय था और जब १००% की तैय्यारी कर ही रखी थी तो पेशाब इस तैय्यारी मे अडचन पैदा कर सकता था। मैं प्लेटफार्म नंबर १ पर खडा था और सार्वजनिक शौचालय प्लेटफार्म नंबर २ और ३ पर था जो की एक ही प्लेटफार्म के दो हिस्से थे। प्लेटफार्म का एक किनारा २ नंबर व दुसरा किनारा ३ नंबर कहलाता था। यदि प्लेटफार्म नंबर १ पर एक ट्रेन आये तो उसके यात्री ट्रेन के दोनों दरवाजों से उतर सकते थे क्योंकी दोनों प्लेटफार्म के मध्य से एक ही पटरी गुजरती थी और आनेवाली ट्रेन के दोनों तरफ प्लेटफार्म नंबर १ व २ लगते थे। मैं १ नंबर प्लेटफार्म के अगले हिस्से मे था जहाँ ट्रेन के आगे के डिब्बे आते थे। हालाँकी मैं कभी आगे के डिब्बे नहीं पकडता क्योंकी ये मेरा भ्रम ही है की अगले डिब्बों मे भिड अधिक होती है। किंतु न जाने जब भी मैं जोगेश्वरी जाता था तब प्लेटफार्म के आगले भाग पर ही ट्रेन की प्रतिक्षा करता एंव ट्रेन आनेपर कुछ अग्रिम डिब्बे छोडकर पिछे के डिब्बों मे चढता। यहाँ पर इतनी स्पष्ट जानकारी इसलिए दे रहा हुँ ताकी पाठक अपने आँखों के सामने कहानी के दृष्य को सजीव कर सके एंव कहानी का यथार्थ अनुभव कर सके।





(शेष अगले भाग मे....)


ये घटना सन् २०१३ की है, मैं तब मुँबई के

Posh Area

लोखंडवाला के पास के ओशिवरा के

FAASOS fast food chain

के एक Outlet में

Store Manager

के रूप मे काम करता था। वहाँ पर अक्सर सप्ताह के पाँच दिन मैं सुबह की

Morning Shift

करता था और जिस दिन मेरे

Assistant Manager

की

Weekly Off

होती, उस दिन रात की

Closing Shift

करता और एक दिन मैं

Weekly Off

लेता। लेकिन जब मेरी

Morning Shift

होती तब भी मैं अक्सर काम से ८-९ बजे के बाद ही निकलता और मुँबई मे मेरे मित्रों की संख्या इतनी थी की काम से घर निकलते-निकलते जहाँ-जहाँ से मैं गुजरता वहाँ-वहाँ पर कोई ना कोई मुझे धर ही लेता और फिर ईधर-उधर की बातचीत करते-करते काफी देर हो जाती और मैं कितनी भी जल्दी काम से निकलू लेकिन तब भी मैं १०-११ बजे से पहले घर कभी नहीं पहुँच पाता। उस दिन भी देर कुछ ज्यादा ही हो गई थी, हालाँकी store मे काम ज्यादा तो नहीं था किंतु आदतन काम करते-करते समय का पता ही नहीं चला और मैंने जब घडी देखी तो ९ बज चुके थे। मैंने अब

Handover

देकर घर जाने का निर्णय लिया और अपना बैग समेटने लगा। लंच बॉक्स, मोबाईल, चार्जर, चाबियाँ सब समेटकर निकलने से पहले

Juniors

से कुछ जरूरी

Followups

लेते-लेते लगभग साढे नौ बज चुके थे। तभी अचानक

Store

से निकलते ही मुझे एक मित्र का फोन आया और उसने मुझे एक जरूरी काम से पास की चाय की टपरी पर बुलाया। मुँबई के कई

Posh Area

मे देर रात तक चाय की छोटी दुकाने खुली रहती है और सुबह भी ३ से ४ के बीच मे वे चाय की टपरिया खुल भी जाती है, तो मैंने भी मित्र को वहीं टपरी पर इंतजार करने के लिए कहाँ। हम जिस चाय की टपरी पर मिलनेवाले थे वो ११-१२ बजे तक चलती थी और सुबह मे भी तडके ३:०० - ३:३० तक खुल जाती है। मैंने

गणेश

को

Bike

से मुझे वहाँ छोडने के लिए कहा।

गणेश

वहाँ पर

Team Member

था और

Bike

से

Food Delivery

का काम करता था। मेरी

Shop

से चाय की टपरी पैदल ४-५ मिनट की दूरी पर थी। चुँकी मैं बाईक से गया तो १ मिनट से भी कम समय मे चाय की टपरी पर पहुँच गया जहाँ पर मेरा वो लफंडर मित्र पहले से ही पहुँचकर चाय की चुस्कियाँ ले रहा था और सिगरेट के छल्ले उडा रहा था। मेरे पहुँचते ही उसने दो और चाय का ऑर्डर मेरे और

गणेश

के लिए दिया। चाय पीकर

गणेश

तो चला गया क्योंकी

Store

मे काम था लेकिन मैं वहीं पर अपने दोस्त के साथ बाते करने लगा।

बाते करते-करते मैने घडी पर नजर डाली तो लगभग ११ बज चुके थे और अब तक हम कई चाय भी पी चुके थे। काफी चर्चा व बातें करने के बाद हम वहाँ से जाने के लिए उठे। चुँकी हम दोनों उस स्थान पर खडे थे जहाँ से गोरेगाँव व जोगेश्वरी दोनों स्टेशोंन पर जाने के लिए बसें आया करती थी तो मैं बस की प्रतिक्षा करने लगा। मित्र को अन्य दिशा मे जाना था सो वो अपने मार्ग निकल गया। मैं बस के इंतजार मे बस स्टॉप पर खडा था। अधिकतर मैं बस से गोरेगाव ही जाया करता था क्योंकी पहले जोगेश्वी और फिर बाद मे गोरेगाँव आता था तो जोगेश्वरी पहुँचकर मैं एक स्टेशन पिछे रहता था किंतु घर पहुँचने मे समय तो करीब-करीब दोनों ही स्टेशनों से उतना ही लगता था। फिर भी मैं गोरेगाँव ही जाना पसंद करता था क्योंकी जोगेश्वरी मैं कभी कभार ही जाता और इसलिए मैं वहाँ असहज भी महसूस करता था और इसी असहजता के कारण ट्रेन पकडने मे ज्यादा मेहनत करनी पडती थी। मैं भाईंदर जाने के लिए विरार की तरफ जानेवाली ट्रेन मे चढता था और आप Google Search करके विरार लोकल मे भिड की स्थिती का अंदाजा लगा सकते हो, यदि एक ट्रेन छूटी तो दुसरी आने मे १०-१५ मिनट लग जाते थे और कभी-कभी तो आधा घंटा तक लग जाता था, तो ऐसी स्थिती मे दिन भर थके-हारे होने के बाद स्टेशन पर खडा रहना फिर ट्रेन मे चढने पर लगभग ४५ मिनट खडे रहकर सफर करना मानो सच मे जान पर बन आती थी। इसलिए मैं प्लेटफार्म पर बैठने के लिए सीट या कोई बेंच देखता था चुँकी उन दिनों जोगेश्वरी स्टेशन के प्लेटफार्म मे बैठने की ठिक से व्यवस्था नही थी तो इसलिए भी मैं गोरगाँव जाना ही पसंद करता था। गोरेगाँव स्टेशन मे बैठने की व्यवस्था जोगेश्वरी स्टेशन की तुलना मे ज्यादा अच्छी थी एंव सीटों की संख्या भी अधिक थी जिससे बैठने के लिए सीट मिलने की संभावना भी अधिक थी किंतु कई बार तो घर पहुँचकर ही बैठने का सौभाग्य मिलता था। इसके अलावा जोगेश्वरी को नापसंद करने का मेरा एक और कारण था जिसका पता उन्हे लग ही गया होगा जो लोग मुझे बेहद करीब से जानते हैं किंतु उस कारण को यहाँ पर लिखने का मतलब विषय को भटका देना और दुसरी तरफ ले जाना होगा इसलिए मैं इस बात का उल्लेख यहाँ पर नहीं करूँगा। तो अब मैं सीधे आता हुँ अपनी कहानी पर।

मैं जोगेश्वरी रेल्वे स्टेशन पहुँचा ही था की एक ट्रेन आई जो विरार की ही थी और यात्रियों से खचाखच भरी थी, लेकिन विरार ट्रेन मे चढना हो तो भिड नहीं देखनी चाहिए केवल चढने की कोशिश करनी चाहिए, एक बार आप चढे और ट्रेन शुरू हुई तो सबकुछ अपने आप

Manage

हो जाता है। कम से कम दबते-दबाते, मारखाते हुए या मारते हुए आप घर तक पहुँच ही जाओंगे। मेरी उम्र रही होगी २२-२३ बर्ष की तो युवावस्था के उन दिनो मे जोश भी था इसलिए ट्रेन भरी हो या खाली, सब मुझे एक-समान ही दिखती थी। मुँबई मे विरार की ट्रेनों मे एक

Trend

रहता है, जिस भी

Coach

के दरवाजे से ट्रेन मे चढने का प्रयत्न करों तो दरवाजे पर खडे लोग बोल पडते है ट्रेन

Pack

है, पीछे के

Coach

मे जाओं, पीछे दुसरी खाली ट्रेन आ रही है वगैरह-वगैरह। ऐसा वे इसलिए कहते हैं ताकी ट्रेन के भितर गर्दी की वजह से बाहर की तरफ दबाव न आये और वे मजे से दरवाजे पर झूलते-लटकते, ठंडी हवा का आनंद लूटते हुए आराम से यात्रा करें। दरवाजे पर लटकनेवाले लोग अक्सर उस ट्रेन के उस

Coach

के रोज के यात्री होते हैं और एक ही ट्रेन मे कई वर्षों से सफर करने की वजह से आपस मे

Group

बना लेते हैं और फिर ट्रेन को अपने बाप का समझकर हल्ला हो मचाते हुए चलते हैं अर्थात किसी एक से पंगा लिया तो पूरी ट्रेन मिलकर तुम्हारी कुटाई करेगी। इन लोगों मे युवा, वयस्क, बूढे और कई बार तो दुष्ट महिलाये भी होती है जो कुछ खास तमाशा तो नहीं करती किंतु २ आदमी जितने जगह लेती है और कई यात्रियों को असहज महसूस कराती है। खैर मैं तो इन सब का आदि हो चुका था। तो हुआ युँ की विरार की ट्रेन तो आ चुकी थी और भिड भी दबाकर थी। मैं चाहे तो ट्रेन मे चढ सकता था। मेरे लिए वो भी क्या खाक भिड थी....? मैं तो ना के बराबर जगह वाली ट्रेन मे भी चढकर अभ्यस्त हो चुका था किंतु उस समय भिड इसलिए दिख रही थी क्योंकी मैं बस वो ट्रेन नहीं पकडना चाहता था और इसलिए मैंने अपने आप को समझाया की इसमे भिड बहुत है और पिछे भी कई ट्रेने होंगी, तो जिस ट्रेन मे भी कम भिड हो उसमे चल देंगे। वैसे भी ट्रेन मे चढने का महिर होने के बावजूद कई बार मैं ट्रेन नहीं पकड पाता था और कई बार तो कई ट्रेन मे चढने के प्रयास व काफी ट्रेन छोडने के बाद ही किसी ट्रेन मे चढ पाता था।

उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। ३-४ ट्रेन या शायद उस से भी ज्यादा ट्रेने छोडकर मैं कुछ थक चुका था और मुझे जोर से पेशाब भी आयी हुई थी। फिर मैंने M-Indicator(जो की मुँबई के लोकल बस एंव ट्रेन की समय सारिणी देखने वाला एक APP) पर देखा की अब २-३ बोरिवली की ट्रेनों के बाद एक भाईंदर लोकल है तो मुझे ऐसा महसूस हुआ की मानों प्रभु राम की कृपा ही हो गई। इस लोकल मे विरार की तुलना मे (कुछ अपवाद छोडकर) कम भिड रहती है जिसके कारण ट्रेन मे चढने मे कुछ आसानी होती है, लेकिन तब भी ट्रेन पर चढ ही जाओंगे इसकी कोई Guarantee नहीं रहती। चर्चगेट से लेकर प्रत्येक प्लेटफार्म पर सैकडो लोग इस ट्रेन का इंतजार कई घंटो से करते रहते हैं। कई तो ऐसे भी होते हैं जिनको जाना विरार होता है किंतु वे विरार ट्रेन पकड पाने मे अक्षमता के कारण भाईंदर लोकल पकडकर वहाँ से दुसरी ट्रेन बदल लेते हैं। तो मुझे पता था की इस लोकल को पकडने का एक ही नियम है और वो नियम है “पहले आओं और पहले पाओ”। मतलब ट्रेन स्टेशन पर रूकने से पहले ही आपको चलती ट्रेन मे छलाँग लगानी होगी तब कहीं जाकर आप ये मान सकते हो की आप १००% ट्रेन मे चढ ही जाओंगे। भाईंदर मे तो मैं रहता ही था और आनेवाली ट्रेन का अंतिम स्थान भी वहीं था तो इसलिए मैंने तो १००% की तैय्यारी कर ली थी। मुझे काफी समय से पेशाब आई थी किंतु ट्रेन पकडने के जद्दोजहज मे मैं उसे टाल रहा था। भाईंदर लोकल आने मे अभी थोडा समय था और जब १००% की तैय्यारी कर ही रखी थी तो पेशाब इस तैय्यारी मे अडचन पैदा कर सकता था। मैं प्लेटफार्म नंबर १ पर खडा था और सार्वजनिक शौचालय प्लेटफार्म नंबर २ और ३ पर था जो की एक ही प्लेटफार्म के दो हिस्से थे। प्लेटफार्म का एक किनारा २ नंबर व दुसरा किनारा ३ नंबर कहलाता था। यदि प्लेटफार्म नंबर १ पर एक ट्रेन आये तो उसके यात्री ट्रेन के दोनों दरवाजों से उतर सकते थे क्योंकी दोनों प्लेटफार्म के मध्य से एक ही पटरी गुजरती थी और आनेवाली ट्रेन के दोनों तरफ प्लेटफार्म नंबर १ व २ लगते थे। मैं १ नंबर प्लेटफार्म के अगले हिस्से मे था जहाँ ट्रेन के आगे के डिब्बे आते थे। हालाँकी मैं कभी आगे के डिब्बे नहीं पकडता क्योंकी ये मेरा भ्रम ही है की अगले डिब्बों मे भिड अधिक होती है। किंतु न जाने जब भी मैं जोगेश्वरी जाता था तब प्लेटफार्म के आगले भाग पर ही ट्रेन की प्रतिक्षा करता एंव ट्रेन आनेपर कुछ अग्रिम डिब्बे छोडकर पिछे के डिब्बों मे चढता। यहाँ पर इतनी स्पष्ट जानकारी इसलिए दे रहा हुँ ताकी पाठक अपने आँखों के सामने कहानी के दृष्य को सजीव कर सके एंव कहानी का यथार्थ अनुभव कर सके।




(शेष अगले भाग मे....


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