एकादशी माहात्म्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

एकादशी माहात्म्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*सनातन धर्म में मनाये जाने वाले सभी पर्व एवं त्यौहार ही सनातन धर्म की दिव्यता का द्योतक हैं | भारत इतना विशाल देश है यहाँ अनेकों धर्म सम्प्रदाय के लोग रहते हैं | यहाँ वर्ष भर प्रतिदिन कोई न कोई पर्व , व्रत एवं त्यौहार मनाये ही जाते रहते है | सनातन धर्म में व्रत एवं त्यौहारों की एक लम्बी सूची है | इन सभी व्रतों का मुकुट "एकादशी" को कहा गया है | एकादशी के माहात्म्य का वर्णन प्राय: सभी धर्मग्रंथों में देखने को मिलता है | एकादशी के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है | वैसे तो अनेकानेक व्रत का भिन्न - भिन्न विधान है परंतु एकादशी का विधान प्राय: सभी व्रतों में अपनाने योग्य होता है | मनुष्य का शरीर वैसे तो पाँच तत्वों से बना है परंतु मनुष्य के समस्त क्रिया - कलाप ग्यारह अवयवों से सम्पन्न होते हैं ! इनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ , पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं एक मन मिलकर ग्यारह होते हैं | इन्हीं एकादश अंगों को वश में करना ही एकादशी है | एकादशी का व्रत रहने का अर्थ सिर्फ भूखा रहकर शरीर सुखाना नहीं अपितु यह व्रत रहने का तात्पर्य यह है कि दशमी के दिन से ही मनुष्य को अपनी ज्ञानेन्द्रियों , कर्मेन्द्रियों एवं मन को वश में रखकर झूठ , कपट , अनृत , अनाचार एवं मन में उठ रहे कुविचारों का संयम करते हुए एकादशी को श्रीहरि विष्णु का पूजन करके व्रत रहना चाहिए | व्रत रहने का मात्र भोजन की वर्जना नहीं बल्कि भोजन के साथ यदि उपरोक्त नकारात्मक क्रिया - कलापों की वर्जना भी कर ली जाय तभी एकादशी का व्रत रहना सार्थक कहा जा सकता है | विधिपूर्वक उपवास करने से पाप जलते है और तन -मन शुध्ध होते है | यदि विधिपूर्वक किया न जाये तो मर्यादानुसार अन्नाहार का त्याग करके फलाहार करो | यह व्रत आरोग्य की दृष्टि से भी आवश्यक है |* *आज लोगों के क्रिया - कलाप की ही तरह उनकी मानसिकता में भी परिवर्तन आया है | अधिकतर लोग एक दिन का व्रत रहने के लिए दो दिन पहले से तैयारियाँ प्रारम्भ कर देते हैं , और तैयारियाँ भी मात्र फलाहार की सामग्रियों की | आज के व्रत तरह तरह के फल व अन्य व्यंजनों के स्वाद लेने का कारक बन रहा है | जहाँ हमारे ऋषियों ने व्रत का विधान एक दिन अन्न का त्याग करके आरोग्यता प्राप्त हेतु बनाया था वहीं आज मनुष्य व्रत के दिन अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक ही उदर भरण कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप तरह तरह के रोग उसको घेर रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के व्रतियों को देखकर सोंचने को विवश हो जाता हूँ कि जिस प्रकार एकादशी का व्रत रहने वालों को अपने शरीर के एकादश अवयवों पर संयम रखते हुए वचन से झूठ / अनर्गल प्रलाप एवं अन्य अंगों के द्वारा कोई भी ऐसा कार्य न करने का निर्देश दिया गया है जो कि मानवता के विरुद्ध हो , वहीं आज लोग एकादशी का व्रत तो बहुत श्रद्धा के साथ करते हैं परंतु अपने - अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान व अन्य कार्यक्षेत्रों में दिन भर झूठ , अनाचार , कदाचार करते रहते हैं | ऐसे लोगों को व्रत रहने का क्या फल मिलेगा यह विचारणीय है | हास्यास्पद तो तब लगता है जब चिकित्सक के कहने पर तो लोग दस दिन तक अन्न जल तक का त्याग कर देते हैं परंतु एकादशी के दिन एक दिन का निर्जल व्रत नहीं रह सकते | ऐसा करके लोग व्यर्थ में ही परमात्मा द्वारा अपनी भलाई की आशा करते हैं |* *एकादशी के दिन जिन एकादश शारीरिक अवयवों पर संयम का निर्देश मिलता है उसमें से यदि मात्र मन पर ही संयम कर लिया जाय तो शेष सभी इन्द्रियां स्वमेव संयमित हो जायेंगी | मनुष्य को प्रथम यही प्रयास करना चाहिए |*

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