गीत

22 नवम्बर 2018   |  अलोक सिन्हा   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

शादी के बाद ससुराल से एक बेटी की अपनी माँ को भावनात्मक पाती --

गीत

जिसकी रज ने गोद खिलाया ,

पैरों को चलना सिखलाया .

जहाँ प्यार ही प्यार भरा था - वह आंगन बहुत याद आता है |


सुबह सुबह आँखें खुलते ही ,

तेरा वह पावन सा चुम्बन |

फिर दोनों बांहों में भरकर.

हलका हलका सा आलिंगन |


बाबा की मीठी सी गोदी ,

दादी का हंस हंस बतियाना |

पापा का कांधों पर लेकर .

बाहर फूलों से बहलाना |


कैसे सब घर परिधि बनाकर ,

मेरे लिए खेल रचता था |

और जरा सा गिर जाने पर ,

चींटी के सौ शव गिनता था |


तुम पल्लू से गात पोंछ कर ,

कैसे मुझको चिपटाती थी |

मेरी पीड़ा दुलराने को ,

भू को कितना डटियाती थी |

माँ वह बेलों , बूटे वाला ,

पावन मंगल गोटे वाला ,

जिसने मेरे आंसू पोंछे - वह दामन बहुत याद आता है |

कैसे मधुरिम थे वो सब दिन ,

कितनी प्यारी सी सखियाँ थीं |

कैसे चिता रहित विचरते ,

हर पग पर बिखरी खुशियाँ थीं |


कभी खेलते आँख मिचोनी ,

गुड़ियों की हम शादी करते |

झूठ मूठ के व्यंजन रच कर ,

सबसे आ खाने को कहते |


रक्षाबन्धन के दिन सबका ,

कितना चरम प्यार मिलता था |

और जनम दिन की संध्या पर ,

कैसा घर उत्सव मनता था |


तीजें आतीं , महदी रचती ,

पेड़ों पर नव झूले पड़ते |

सखियाँ मेघ मल्हारें गाती ,

हम पेंगों से नभ को छूते |


माँ वह मधुर बयारों वाला ,

शीतल मंद फुहारों वाला ,

जिसमें जीवन के सब रंग थे - वो सावन बहुत याद आता है |


मुझे पता था तितली जुगनू ,

तुम्हें बहुत करुण लगते हैं |

उन्हें पकड़ना , बंदी रखना ,

तुम्हें बहुत आहत करते हैं |


फिर भी छूने के लालच वश ,

मैं जब इनके लिए मचलती |

तो अगाध ममता के कारण ,

कभी न क्रोध जरा सा करतीं |


कितना दिल था बड़ा तुम्हारा ,

कैसे सबका मन रखती थीं |

मैं थोड़ा भी सुस्त दिखूं तो ,

सारी रात साथ जगती थीं |


बीस बरस जो हर पल पाया ,

कैसे अब वह प्यार भुलाऊँ |

किसकी गोदी में सर रख कर ,

अपनी हर पीड़ा दुलराऊँ |

माँ वह तेरा भोला भाला ,

सबकी चिंता करने वाला ,

जिसमें ममता ही ममता थी , वो आनन बहुत याद आता है |



रेणु
23 नवम्बर 2018

कितना दिल था बड़ा तुम्हारा ,
कैसे सबका मन रखती थीं |
मैं थोड़ा भी सुस्त दिखूं तो ,
सारी रात साथ जगती थीं |
बीस बरस जो हर पल पाया ,
कैसे अब वह प्यार भुलाऊँ |
किसकी गोदी में सर रख कर ,
अपनी हर पीड़ा दुलराऊँ |
माँ वह तेरा भोला भाला ,
सबकी चिंता करने वाला ,
जिसमें ममता ही ममता थी ,
वो आनन बहुत याद आता है !!!!!!!!!!!!!
निशब्द !!!!!!!!!!!!

अलोक सिन्हा
27 नवम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद सटीक टिप्पणी के लिए |

रेणु
23 नवम्बर 2018

आदरणीय आलोक जी -- सच कहूं तो इस गीत के लिए मेरे पास शब्द नहीं | एक बेटी के अंतस की अंतर्वेदना का उच्छ्वास है ये रचना जिसका शब्द शब्द करुणा | से सराबोर है | इसकी अनुभूति वही मन कर सकता है जो इस वेदना से गुजरा हो | जब एक बेटी बाबुल का आँगन हमेशा के लिए छोड़कर आती है तो उसकी हालत नई जगह रोपे एक मुरझाये पौधे की भांति होती है | क्योकि पौधा भी नयी मिटटी में रोपने के बाद पहले मुरझाता है फिर पनपता है | वैसे ही माँ के आंचल की छाया और पिता का दुलार बेटी के मन को बहुत याद आता है | आपकी रचना अत्यंत मर्मस्पर्शी और भावुक करने वाली है | मुझे भी अपने विवाह के बाद के दिन स्मरण हो आये जिन दिनों मेरे मन में भी एसा ही चितन चलता रहता था |माँ के सम्पूर्ण त्याग और ममता को समर्पित ये रचना पाठकों के लिए एक भावपूर्ण उपहार है | सभी से निवेदन है कि इसे जरुर पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया जरुर दे | आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | रचना पढ़ तो उसी समय ली थी पर प्रतिक्रिया उसी समय नहीं दे पाती हूँ | सादर

अलोक सिन्हा
27 नवम्बर 2018

बि ल्कुल सच लिखा है आपने | एक अच्छी व् सार्थक विवेचना के लिए बहुत बहुत आभार |

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