"लघुकथा, अब कितनी बार बाँटोगे"

02 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (68 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा "अब कितनी बार बाँटोगे"


अब कितनी बार बाँटोगे यही कहकर सुनयना ने सदा के लिए अपनी बोझिल आँख को बंद कर लिया। आपसी झगड़े फसाद जो बंटवारे को लेकर हल्ला कर रहे थे कुछ दिनों के लिए ही सही रुक गए। सुनयना के जीवन का यह चौथा बंटवारा था जिसको वह किसी भी कीमत पर देखना नहीं चाहती थी। सबने एक सुर से यही कहा कि दादी किसी भी बंटवारे से बहुत दुखी हो जाती थीं। जब वह व्याह कर आयी तो इस परिवार का पहला बंटवारा अजिया ससुर का हुआ था जो इन्हें अच्छा तो न लगा पर कर ही क्या सकती थी। कुछ एक साल ही बीता कि इनके ससुर जो दो भाई थे अलग-बिलग हो गए, लोग बताते हैं कि चार दिनों तक इन्होंने खाना नहीं खाया था और निश्चय कर लिया कि अपने पति को उनके भाइयों से अलग नहीं होने देंगी। मिशाल भी कायम किया सुनयना ने बहुत कुछ सहन करके परिवार को एकजुट रखा पर समय के परिवर्तन पर किसका बस चला है टूट गईं जब परिवार तीसरी बार बँटकर बिखर रहा था। न वह शान रही न मर्यादा सब कुछ मिट्टी में मिलते अपनी उन्हीं आँखों से देखती रही जिसकी सुंदरता से बशीभूत होकर उनके पिता जी ने सुनयना नाम रखा था।

उम्र जब पचासी पार कर गई तो उनके खुद के बच्चों ने कलह शुरू कर दिया। सुनयना ने बहुत समझाया कि मेरे मरने के बाद ही अब तुम लोग अपने मन की करना, मेरे जीते जी चौथा बँटवारा संभव नहीं है। दश वर्ष कसमकश में निकला और उनके तीनो लड़के अपने बाल-बच्चों को लेकर शहर पकड़ लिए पर पुस्तैनी जमीन का मोह लिए सुनयना ने घर को अपने कमजोर हाथों से अकेले पकड़े रखा कि गर्मी की छुट्टी में सबका आना हुआ और बँटवारे की मंशा बलवती हो गई और श्राद्ध कर्म करके पूर्ण भी हो गई। सुनयना के एक नाती ने याद दिलाया कि दादी के तस्वीर के नीचे लिखवा दो न पापा, कि "अब कितनी बार बाँटोगे"।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी


अगला लेख: "पद" कोयल कुहके पिय आजाओ, साजन तुम बिन कारी रैना,डाल पात बन छाओ।।



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
25 नवम्बर 2018
"
वेटिंग रूम, लघुकथागर्मी का तपता हुआ महीना और कॉलेज के ग्रीष्मावकाश पर घर जाने की खुशी में रजिया और नीलू अपने बैग को पीठ पर लटकाए हुए स्टेशन की ओर कदम बढ़ाए जा रही थी। ट्रेन अपने समय पर थी और दोनों दिल्ली पहुँच गई। दूसरी ट्रेन आने में अभी पाँच घंटे इंतजार करना था अतः वेटिंग रूम का शरण लेना उचित लगा। थ
25 नवम्बर 2018
12 दिसम्बर 2018
"
"हाइकु" ठंडी की ऋतुघर घर अलावबुझती आग।।-1गैस का चूल्हान आग न अलावठिठुरे हाथ।।-2नया जमानासुलगता हीटर धुआँ अलाव।।-3नोटा का कोटाअसर दिखलायामुरझा फूल।।-4खिला गुलाबउलझा हुआ काँटामूर्छित मन।।-5महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
12 दिसम्बर 2018
06 दिसम्बर 2018
"कुंडलिया"कुल्हण की रबड़ी सखे, और महकती चाय।दूध मलाई मारि के, चखना चुस्की हाय।।चखना चुस्की हाय, बहुत रसदार कड़ाही।मुँह में मगही पान, गजब है गला सुराही।।कह गौतम कविराय, न भूले यौवन हुल्लण।सट जाते थे होठ, गर्म जब होते कुल्हण।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
06 दिसम्बर 2018
24 नवम्बर 2018
"
"मुक्तक"युग बीता बीता पहर, लेकर अपना मान।हाथी घोड़ा पालकी, थे सुंदर पहचान।अश्व नश्ल विश्वास की, नाल चाक-चौबंद-राणा सा मालिक कहाँ, कहाँ चेतकी शान।।-1घोड़ा सरपट भागता, हाथी झूमे द्वार।राजमहल के शान थे, धनुष बाण तलवार।चाँवर काँवर पागड़ी, राज चाक- चौबंद-स्मृतियों में अब शेष हैं, प्रिय सुंदर उपहार।।-2महातम
24 नवम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x