"लघुकथा, अब कितनी बार बाँटोगे"

02 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (96 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा "अब कितनी बार बाँटोगे"


अब कितनी बार बाँटोगे यही कहकर सुनयना ने सदा के लिए अपनी बोझिल आँख को बंद कर लिया। आपसी झगड़े फसाद जो बंटवारे को लेकर हल्ला कर रहे थे कुछ दिनों के लिए ही सही रुक गए। सुनयना के जीवन का यह चौथा बंटवारा था जिसको वह किसी भी कीमत पर देखना नहीं चाहती थी। सबने एक सुर से यही कहा कि दादी किसी भी बंटवारे से बहुत दुखी हो जाती थीं। जब वह व्याह कर आयी तो इस परिवार का पहला बंटवारा अजिया ससुर का हुआ था जो इन्हें अच्छा तो न लगा पर कर ही क्या सकती थी। कुछ एक साल ही बीता कि इनके ससुर जो दो भाई थे अलग-बिलग हो गए, लोग बताते हैं कि चार दिनों तक इन्होंने खाना नहीं खाया था और निश्चय कर लिया कि अपने पति को उनके भाइयों से अलग नहीं होने देंगी। मिशाल भी कायम किया सुनयना ने बहुत कुछ सहन करके परिवार को एकजुट रखा पर समय के परिवर्तन पर किसका बस चला है टूट गईं जब परिवार तीसरी बार बँटकर बिखर रहा था। न वह शान रही न मर्यादा सब कुछ मिट्टी में मिलते अपनी उन्हीं आँखों से देखती रही जिसकी सुंदरता से बशीभूत होकर उनके पिता जी ने सुनयना नाम रखा था।

उम्र जब पचासी पार कर गई तो उनके खुद के बच्चों ने कलह शुरू कर दिया। सुनयना ने बहुत समझाया कि मेरे मरने के बाद ही अब तुम लोग अपने मन की करना, मेरे जीते जी चौथा बँटवारा संभव नहीं है। दश वर्ष कसमकश में निकला और उनके तीनो लड़के अपने बाल-बच्चों को लेकर शहर पकड़ लिए पर पुस्तैनी जमीन का मोह लिए सुनयना ने घर को अपने कमजोर हाथों से अकेले पकड़े रखा कि गर्मी की छुट्टी में सबका आना हुआ और बँटवारे की मंशा बलवती हो गई और श्राद्ध कर्म करके पूर्ण भी हो गई। सुनयना के एक नाती ने याद दिलाया कि दादी के तस्वीर के नीचे लिखवा दो न पापा, कि "अब कितनी बार बाँटोगे"।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी


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