आइये जाने मोबाइल टावर रेडिएशन से मर रहे पक्षियों को इन्साफ दिलाने आये पक्षीराज की पूरी कहानी

03 दिसम्बर 2018   |  अंकिशा मिश्रा   (125 बार पढ़ा जा चुका है)

 आइये जाने मोबाइल टावर रेडिएशन से मर रहे पक्षियों को इन्साफ दिलाने आये पक्षीराज की पूरी कहानी

फिल्म 2.0 ने इन दिनों बॉक्स-ऑफिस पर धमाल मचाया हुआ है। इस फिल्म में एक बहुत ही ख़ास मुद्दे मोबाइल टावर से निकलने वाले रे‌डिएशन से पक्षियों को होने वाले नुकसान को उठाया गया। मोबाईल टावर से निकलने वाले रेडिएशियन पर की शोध हुए है और कई बहस भी हुई हैं और इस बात से बिलकुल इंकार नहीं किया जा सकता कि इससे कई नुकसान भी होते है फिर चाहे वो पक्षी हों या फिर इंसान।देश में ही कई विश्वविद्यालय और आईआईटी मोबाइल और उसके टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन से मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर शोध कर चुके हैं।




आपको बता दें की 2.0 की कहानी की शुरूआत ही होती है कुछ इस तरह मोबाइल फ़ोन के रेडिएशन से पक्षियों को नुकसान पहुंच रहा है जिसके चलते एक बूढा व्यक्ति ( पक्षीविज्ञानी ) जो आत्महत्या कर लेता है ताकि वो इंसानों से इस बात का बदला ले सके।मोबाइल टावर रेडिएशन एक ऐसा विषय है जिस पर कई शोध हुई और कई बहस भी हुई है और ये बहुत ही हानिकारक होता है पक्षियों के लिए ऐसा निष्कर्ष निकला गया है।


अधिकतर शोध से यही निष्कर्ष निकला है कि मोबाइल टॉवर से होने वाला रेडिएशन इंसानों के लिए ही नहीं जीव जंतुओं के लिए भी काफी हानिकारक है। आपको बता दें कि मोबाइल टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन पर आईआईटी दिल्‍ली के प्रोफेसर गिरीश कुमार ने काफी पहले एक शोध किया था। उनके अनुसार मोबाइल से ज्यादा परेशानी उसके टॉवरों से है। क्योंकि मोबाइल का इस्तेमाल हम लगातार नहीं करते, लेकिन टावर लगातार चौबीसों घंटे रेडिएशन फैलाते हैं।



प्रोफेसर गिरीश का कहना है कि मोबाइल पर यदि हम एक घंटे बात करते हैं तो उससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए हमें 23 घंटे मिल जाते हैं, जबकि टावर के पास रहनेवाले उससे लगातार निकलने वाली तरंगों की चपेट में रहते हैं। प्रो इस बात का दावा करते हैं कि अगर घर के समाने टावर लगा है तो उसमें रहनेवाले लोगों को 2-3 साल के अंदर सेहत से जुड़ी समस्याएं शुरू हो सकती हैं।


मोबाइल टावर के 300 मीटर एरिया में सबसे ज्यादा रेडिएशन होता है। एंटिना के सामने वाले हिस्से में सबसे ज्यादा तरंगें निकलती हैं। जाहिर है, सामने की ओर ही नुकसान भी ज्यादा होता है, पीछे और नीचे के मुकाबले। इसी तरह दूरी भी बहुत अहम है। टावर के एक मीटर के एरिया में 100 गुना ज्यादा रेडिएशन होता है। टावर पर जितने ज्यादा ऐंटेना लगे होंगे, रेडिएशन भी उतना ज्यादा होगा।


जर्मनी में हुए एक रिसर्च के मुताबिक जो लोग ट्रांसमिटर ऐंटेना के 400 मीटर एरिया में रहते थे उनमें कैंसर होने की आशंका तीन गुना बढ़ गई। 400 मीटर के एरिया में ट्रांसमिशन बाकी एरिया से 100 गुना ज्यादा होता है।



वहीं केरल में हुई रिसर्च के अनुसार सेल फोन टॉवरों से होने वाले रेडिएशन से मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता 60 फीसदी तक गिर गई। कभी हमें हर समय घर के आसपास दिखाई देने वाली गौरया ढूंढे नहीं मिलती। इसी तरह कौवों और अन्य पक्षियों की संख्या भी तेजी से घटी है।


वैज्ञानिक इसका कारण भी मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली रेडिएशन को मानते हैं। केरल में हुई जांच के अनुसार सेल फोन टावरों के पास जिन गौरेयों ने अंडे दिए, 30 दिन के बाद भी उनमें से बच्चे नहीं निकले, जबकि आमतौर पर इस काम में 10-14 दिन लगते हैं। गौरतलब है कि टावर्स से काफी हल्की फ्रीक्वेंसी (900 से 1800 मेगाहर्ट्ज) की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्ज निकलती हैं, लेकिन ये भी छोटे चूजों को काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं।


कुछ टाइम पहले राजस्‍थान के जयपुर में रे‌‌डिएशन पर आयोजित सेमिनार में भाग लेने आई नोबल पुरस्कार विजेता डा. डेवेरा डेविस ने जोर देकर कहा था कि रेडियेशन के कारण ब्रेन कैंसर, याददाशत में कमी, बहरापन और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।


डा. डेविस ने मोबाइल फोन और टावर से निकलने वाले रेडियेशन के खतरों पर लंबे समय तक शोध किया है, उनकी इन्हीं शोध के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शोध के आधार पर ही उन्होंने दावा किया मोबाइल फोन को सीने से चिपकाकर रखने वाली महिलाओं में ब्रेंस्ट कैंसर तथा पेंट की जेब में मोबाइल रखने वालों में नपुंसकता, शुक्राणुओं में कमी और कैंसर जैसे रोग पनप रहे हैं।



उन्होंने बताया कि मोबाइल टावर के निकट रहने वाले लोगों में कैंसर का खतरा अन्य के मुकाबले अधिक होता है। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए तो यह ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने शोध के बारे में बताया था कि रेडिएशन से चूहों के प्रजनन तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ा, इसके कारण पशु-पक्षी तक मोबाइल टावर के पास नहीं जाते।


कई शोध होने के बाद भी और उनके नतीजे सामने होने के बाद भी सरकार की इस विषय पर कभी कोई पुख्ता प्रक्रिया देखने को नहीं मिलती।



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