कहाँ मिले परमात्मा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (50 बार पढ़ा जा चुका है)

कहाँ मिले परमात्मा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में अनेकों देवी - देवताओं का वर्णन मिलता है , इसके अतिरिक्त यक्ष , किन्नर , गंधर्व आदि सनातन धर्म की ही एक शाखा हैं | इन देवी - देवताओं में किस को श्रेष्ठ माना जाए इसको विचार करके मनुष्य कभी-कभी भ्रम में पड़ जाता है | जबकि सत्य यह है कि किसी भी देवी - देवता को मानने के पहले प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवित देवी - देवता अर्थात माता पिता को ही मानना चाहिए ! क्योंकि उनके ही माध्यम से हमारा इस पृथ्वी पर आगमन हुआ है | इसका उदाहरण अनेकों कथाओं के माध्यम से हमें देखने को मिलता है | विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश ने श्रृष्टि की परिक्रमा न करके माता-पिता की ही परिक्रमा करके इस विधा को प्रतिपादित किया एवं देवताओं में प्रथमपूज्य बने | श्रवण कुमार की मातृ - पितृ भक्ति जगत प्रसिद्ध है | माता - पिता और गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए हमारे पुराणों ने अनेक कथानक प्रस्तुत किये हैं | ब्रह्मा विष्णु एवं महेश तीनों को गुरु में समाहित करते हुए गुरुदेव भगवान को पारब्रह्म की संज्ञा भी दी गई है | माता पिता के बाद मनुष्य के जीवन जिसका प्रवेश होता है वह गुरु होता है | गुरु के ही माध्यम से हम देवी - देवताओं , पूजा पद्धतियों या फिर अपने वेदों - पुराणों से विषय में ज्ञानार्जन कर पाते हैं | गुरु की महिमा को लिख पाने में स्वयं सरस्वती जी की लेखनी रुक जाती है तो हमारी आपकी क्या बिसात है |* *आज मनुष्य इस प्रकार भटक गया है कि उसे अपने ही धर्म ग्रंथों पर अविश्वास सा होता प्रतीत हो रहा है | आज के मानव अनेक देवी-देवताओं के विषय में ज्ञान तो अर्जित करना चाहते हैं परंतु अपने जीवित देवी - देवता अर्थात माता - पिता एवं गुरु की उपेक्षा करने से नहीं चूक रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि आज का समाज गुरु तो किसी को भी मान लेता है परंतु समय-समय पर गुरु से वाद विवाद उनकी अवहेलना एवं हंसी भी उड़ा रहा है | आज विद्वानों की विद्वता वाद - विवाद , तर्क - कुतर्क एवं अपने अहं के लिए जानी जाने लगी है | किसी भी विषय पर क्रोधित हो जाना या तर्क करने लगना विद्वानों की पहचान बनती जा रही है | ऐसे विद्वान प्राय: देखे जा सकते हैं जो देवी - देवताओं एवं अनेक मान्यताओं को मानने एवं उनके रहस्य को खोजने में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं परंतु अपने माता पिता एवं गुरु की पूजा एवं आदर नहीं कर पाते हैं | गुरु में ही त्रिदेवों को महिमामण्डित करते हुए इस महान विभूति को अखिलनियन्ता पारब्रह्म भी कहा गया है | ऐसे में गुरु की पूजा करने मात्र से सभी देवताओं की पूजा हो जाती है | परंतु आज गुरु एवं शिष्य के रिश्तों के बीच भी स्वार्थ की मोटी परत जम गयी है | जिस गुरु ने शिष्य को समाज में स्थापित किया है उसी शिष्य के द्वारा आज गुरुओं की अवहेलना एवं स्थान - स्थान पर समय मिलते ही गुरु की उपेक्षा करते दिखाई पड़ते हैं | स्वयं को महान समझने वाले ये विद्वान आज यदि महान बने हैं तो उसमें माता - पिता एवं गुरु का महत्वपूर्ण योगदान रहा है | यह समझने की बात है |* *माता - पिता एवं गुरु में ही सभी देवी - देवता विराजमान हैं | इनका असम्मान करके मनुष्य कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकता |*

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