श्रेष्ठता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (91 बार पढ़ा जा चुका है)

श्रेष्ठता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का सृजन करने वाले अखिलनियंता , अखिल ब्रम्हांड नायक , पारब्रह्म परमेश्वर , जिसकी सत्ता में चराचर जगत पल रहा है ! ऐसे कृपालु / दयालु परमात्मा को मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नामों से जानता है | वेदों में कहा गया है :- "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति" | वही ब्रह्म जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वहां उस प्रकार का स्वरूप धारण करके इस जगत का कल्याण मात्र करता है | ऐसे परमात्मा को हजार हाथ वाला , हजार मुख वाला एवं कुछ ना करते हुए भी सभी कर्म करने वाला बताया गया है | जब परमात्मा को सृष्टि संचालन की इच्छा हुई तो उसने आवश्यकता के अनुसार ब्रह्मा , विष्णु , रूद्र , इंद्र आदि अनेकों रूप धारण करके इस सृष्टि के संचालन में अपना योगदान दिया | जिस प्रकार किसी भी राष्ट्र का राष्ट्रपति सर्वोच्च होता है एवं सर्वाधिकार उसी के पास होता है उसी प्रकार अनेकों देवी देवता होते हुए भी सर्वोच्च सत्ता उस पारब्रह्म परमेश्वर की ही मानी जाती है | ऐसे में यदि हमारे मन में यह विचार आता है कि देवताओं में श्रेष्ठ कौन है ? तो यह हमारी अज्ञानता का प्रतीक है | पौराणिक कथा के अनुसार त्रिदेव में भगवान श्री नारायण को श्रेष्ठ माना गया है , क्योंकि वे सृष्ट के पालनकर्ता है | यह सार्वभौमिक सत्य है कि सृजन एवं संहार करने वाले से पालन करने वाला सर्वश्रेष्ठ होता है | परंतु कभी भी मन में यह विचार नहीं होना चाहिए कि कौन श्रेष्ठ है ? और कौन लघु | ऐसा करके हम परमात्मा के दोषी बनते हैं |* *आज अनेकों लोगों के मस्तिष्क में एक प्रश्न उठता है कि ब्रह्मा , विष्णु , रूद्र आदि देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कौन है ? राम , कृष्ण , दुर्गा , काली आदि देवी - देवताओं में भेद करने वालों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही बताना चाहूंगा कि सभी देवी - देवताओं अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण स्थान है | इसमें कभी भेद नहीं करना चाहिए , क्योंकि एक तरफ हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं कि भक्त और भगवान में कोई अंतर नहीं होता है , दूसरी तरफ हम भगवान के अवतारों में अंतर करना चाहते हैं | विचार कीजिए जब भगवान और भक्त में अंतर नहीं है तो भगवान के अवतारों में भला अंतर कैसे हो सकता है | जैसे एक शिक्षक पीएचडी करके पीएचडी के छात्रों को उच्च शिक्षा देता है परंतु वही शिक्षक जब प्राइमरी के बच्चों को बढ़ाता है तो उनको वर्णमाला का ज्ञान कराता हुआ दिखाई पड़ता है | ऐसे में विचार करना कि इस शिक्षक को कुछ आता ही नहीं है , या यह तो प्राइमरी के बच्चों को पढ़ा रहा है यह मूर्खता के अतिरिक्त क्या कहा जा सकता है ? शिक्षक को जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है उस प्रकार का ज्ञान बाँट़ता है | ठीक उसी प्रकार वह परमात्मा भी जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वैसा स्वरूप धारण करके प्रकट होता है | मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं घोषणा की है कि मुझ में और भगवान शिव में भेद करने वाला मुझे कभी प्राप्त नहीं कर सकता | ब्रह्मा , विष्णु , रुद्र तीनों एक ही शक्ति हैं इन तीनों में भेद बुद्धि दर्शाने वाले पाप के भागी तो बनते ही हैं साथ ही उनकी उपासना पद्धति हुई दिग्भ्रमित हो जाती है |* *परमात्मा के सभी स्वरूप एक ही हैं इनमें कभी भेद नहीं करना चाहिए | जैसी जिसकी आवश्यकता हो वैसा स्वीकार करके ईश्वर आराधना करनी चाहिए |*

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