कर्म प्रधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

कर्म प्रधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई इस महान श्रृष्टि में सबसे प्रमुखता कर्मों को दी गई है | चराचर जगत में जड़ , चेतन , जलचर , थलचर , नभचर या चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने वाला कोई भी जीवमात्र हो | सबको अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है | ईश्वर समदर्शी है , ईश्वर की न्यायशीलता प्रसिद्ध है | ईश्वर का न्याय सिद्धांत ऐसा है कि इसको कोई काट नहीं सकता है | अगर मनुष्य को सुख और दुख प्राप्त हो रहा है तो यह समझ लेना चाहिए कि यह उसके कर्मों का फल है , इसमें अन्य किसी का कोई दोष नहीं है | प्रत्येक मनुष्य अपना कर्म करने के लिए स्वतंत्र होता है | यदि वह सत्कर्म करता है तो उसका अच्छा फल मिलता है , वहीं दुष्कर्म करने वाले मनुष्य को दुख भोगने के साथ ही अपने कर्म फल का भी भोग करना पड़ता है | मानव शरीर में आकर के जीव जब कुछ विशेषाधिकार प्राप्त कर लेता है तो कभी - कभी वह विशेषाधिकार का हनन करने का भी प्रयास करता है , जिसके परिणामस्वरूप उसको उसका विपरीत परिणाम उसको भोगने पड़ते हैं | चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव शरीर को पाकर कि यदि मनुष्य सत्कर्म नहीं कर पाता है तो यह उसके दुर्भाग्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता है | लोग अपने कर्मों के अनुसार फल भोगते हैं और उसका दोष ईश्वर को लगाते हैं , जबकि जो भी जैसा कर्म करेगा उसको उसका फल अवश्य भोगना ही पड़ता है |* *आज के युग में मनुष्य इस प्रकार व्यस्त है कि अपनी व्यस्तता के चलते वह कभी कभी शुभाशुभ का विचार नहीं कर पाता है , और कभी जानकर और कभी अनजाने में पाप कर्म करता रहता है | जब उसका फल उसको भुगतना पड़ता है तो कभी इसका दोष अपने मित्रों पर , अपने सहचरों पर , परिवार के सदस्यों या फिर परमात्मा के ऊपर लगा देता है कि :- मैंने तो अपना कर्म किया परमात्मा ने फल नहीं दिया तो मैं क्या करूं ? मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऐसे सभी लोगों को बताना चाहूंगा कि यदि किसान अपने खेत में गेहूं का बीज डालता है तो अरहर नहीं काट पायेगा , काटना उसको गेहूं ही पड़ेगा | यहां जैसा बोओगे वैसी ही फसल मिलती है | इसी प्रकार जैसा कर्म किया जाता है मनुष्य को वैसा ही फल मिलता है | यदि कोई अपनी वृद्धावस्था में अपने बच्चों के द्वारा उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहा हैं तो ऐसे लोगों को यह मान लेना चाहिए , या अपने पूर्व में किए हुए को याद करना चाहिए कि क्या उन्होंने अपने माता-पिता के साथ उचित व्यवहार किया था ? हां यह भी हो सकता है कि आपने ऐसा न किया हो , परंतु पूर्व जन्म के कर्म भी आपको इसी जन्म में भुगतने पड़ते हैं | तो हो सकता है कि पूर्व जन्म में आपके द्वारा आपके माता-पिता का अनादर किया गया हो उनकी उपेक्षा की गई हो ? क्योंकि आपके किए गए कर्मों के अतिरिक्त रत्तीभर भी आपको कुछ नहीं मिलना होता है | यही संसार का सत्य है , यही ईश्वर का न्याय है |* *मनुष्य अपने भविष्य का निर्माणकर्ता स्वयं होता है | यदि अच्छे फल की आकांक्षा हो तो अच्छे कर्मों के बीजों का रोपण करना ही होगा |*

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