ब्राह्मण :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (95 बार पढ़ा जा चुका है)

ब्राह्मण :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम पर ब्राह्मण पूज्यनीय रहा है | सृष्टि संचालन ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण योगदान रहा वेदों को पढ़ कर दो उसके माध्यम से ज्ञानार्जन कर मानव मात्र का कल्याण कैसे हो ब्राह्मण सदैव यही विचार किया करता था | अपने इसी स्वतंत्र विचार के कारण ब्राह्मण पृथ्वी की धुरी कहा गया | ब्राह्मण कभी भी इस पृथ्वी का शासक नहीं रहा उसने सदैव शासन व्यवस्था में सहयोग कर शासकों के नए कीर्तिमान स्थापित करने में सहायता की | ब्राह्मण का कार्य समाज को उच्चस्तर तक ले जाना ही रहा है | विद्या का धनी होते हुए भी ब्राह्मण सदैव से निर्धन ही रहा है | संसार को ज्ञान देकर शिक्षित करने वाला ब्राह्मण भिक्षाटन करके ही जीवन - यापन करता रहा है | यदि आदिकाल में ब्राह्मण चाहता तो वह सारे इतिहास - पुराणों को स्वयं के अनुसार लिखकर शासक बन सकता था ! परंतु ब्राह्मणों ने ऐसा न करके मानवमात्र को सच्चा जीवन - दर्शन कराने का प्रयास किया | वर्ण व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान पाने के बाद भी ब्राह्मण सभी साधन - सुविधाओं से दूर ही रहा | क्योंकि उसका उद्देश्य समाज को अपने ज्ञान के माध्यम से सदैव कर्मपथ पर अग्रसारित करना | अपने इन्हीं कार्यों से ब्राह्मण प्रत्येक काल में पूजित रहा है |* *आज ब्राह्मण अपने सबसे बुरे दौर में है | आज ब्राह्मण को समाज बाँटने वाला बताकर प्रस्तुत किया जा रहा है | आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं | ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया | वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया | बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें | किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं | जिस प्रकार एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है | आच चारों ओर ब्राह्मणों का विरोध करने वालों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूँगा कि यदि ब्राह्मण को सर्वोच्च ही बनना था तो त्रेता के क्षत्रिय रघुवंशी श्री राम को , एवं द्वापर के यदुवंशी श्रीकृष्ण को भगवान की संज्ञा देकर न पूजता | कलियुग में भी यदि आचार्य चाणक्य चाहते तो चन्द्रगुप्त के स्थान पर स्वयं शासक बन सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया | यदि ब्राह्मण अन्य वर्णों के शिक्षा का विरोधी था तो गुरु वशिष्ठ ने श्री राम को एवं गुरु सांदीपनि ने वैश्यान्तर्गत यदुवंशी श्री कृष्ण को वेद वेदांग की शिक्षा क्यों दी थी | यह विचार करने का विषय है | भारतीय समाज को तोड़ने का जो कुचक्र मुगलों ने चलाया दुर्भाग्य से वह आज भी अनवरत जारी है |* *ब्राह्मण को दलित विरोधी / समाज विरोधी कहने वाले विचार करें कि यदि ब्राह्मण न चाहता तो अन्य वर्ण निरक्षर ही रह जाते |*

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