संयासी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (72 बार पढ़ा जा चुका है)

संयासी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में प्रत्येक मनुष्य की आयु सौ वर्ष निर्धारित करते हुए चार आश्रमों की व्यवस्था बनाई गयी है | ये चार आश्रम हैं :- गृहस्थाश्रम , ब्रह्मचर्यआश्रम , वानप्रस्थ एवं संयास आश्रम | संयास आश्रम की आयु वैसे तो ७५ से १०० वर्ष के बीच की आयु को कहा गया है परंतु यह पूर्वकाल के लिए था जब मनुष्य की सैकड़ों वर्ष मानी जाती थी | अपने जीवन का अधिकतर समय सांसारिक मोह माया में व्यतीत करने के बाद सांसारिक विकारों (राग - द्वेषादि) से स्वयं को दूर रखते हुए मनुष्य संयास आश्रम में प्रवेश करता था | प्राय: मनुष्य की सोंच यह है कि परिवार एवं समाज का त्याग करके ही मनुष्य संयासी बन सकता है | परंतु ऐसा नहीं है | जिस मनुष्य ने अपनी इन्द्रियों का निग्रह अर्थात वश में कर लिया हो , जिसके हृदय से काम , क्रोध , मद , लोभादि षडविकार समाप्त हो जाते हैं वह संयासी की श्रेणी में आ जाता है | संयास का सीधा अर्थ है :- इंद्रिय निग्रह | सच्चा संयासी वही है जिसने सांसारिक सुखों को विष के समान त्याग दिया है | विवेक द्वारा उत्पन्न वैराग्य के फलस्वरूप जिसकी इच्छायें समाप्त हो गई हैं तथा वह सतत् आत्मस्वरूप के आनन्द में मग्न रहता है | ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष चाहे जहाँ और जिस अवस्था में रहें, वह सर्वत्र उसी एक आत्मस्वरूप के दर्शन करता रहता है | उसे फिर न तो कोई आकर्षण लुभा पाता है और न कोई बन्धन बाँध सकता है | यदि किसी साधक का मन उत्तेजनाओं और प्रलोभनों के मध्य भी शान्त व स्थिर बना रहता है तो वह निश्चित ही दूसरे साधारण व्यक्ति से भिन्न होगा और इससे कोई फर्क नहीं पडेगा कि वह घर-परिवार में रह रहा है या वन में | सन्यास ग्रहण करने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य सत्य के मार्ग पर आगे बढना व अनावश्यक अवरोधों तथा आकर्षणों से अपने आपको सुरक्षित करना होता है |* *आज जिस प्रकार समाज की मानसिकता परिवर्तित हुई उसका अंदाजा पूर्व में ही लगाकर आदिशंकराचार्य जी ने संयासी सम्प्रदाय की स्थापना की थी | परंतु आज न तो आयु का बंधन रह गया है और न ही संयासी बनने की योग्यता का परिमाप | लोग संसार से विरक्त होने का स्वांग रचते हुए दण्डी - संयासी तो बन रहे हैं परंतु उनके हृदय से राग - द्वेष नहीं निकल पा रहा है | आज ऊँचे मठ - मन्दिरों पर आधिपत्य के लिए संयासी आपस में भिड़कर इस दिव्य परम्परा को लज्दित कर रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इस दिव्य आश्रम के विषय में टिप्पणी करने के योग्य तो नहीं हूँ परंतु कलियुग के संयासियों के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवश्य लिखा है :- "नारि मुई गृह सम्पति नासी ! मूड़ मुड़ाइ भये संयासी !! यह पढकर आज के संयासियों के विषय में जाना जा सकता है | जिस प्रकार पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती हैं उसी प्रकार इसी कलियुग के एक युवा संयासी का उदाहरण अवश्य समाज के समक्ष है | युवा संयासी - स्यासी विवेकानंद जी से विवाह करके उनके जैसा पुत्र पाने की इच्छा पर अंग्रेज महिला को विवेकानन्द जी काम - क्रोधादि विषय विकारों से ऊपर उठकर उससे यह कहाँ था कि माँ ! आप मुझसे मेरे जैसा पुत्र उत्पन्न करने की अपेक्षा मुझे ही अपना पुत्र क्यों नहीं मान लेती ?? परंतु अब समय परिवर्तित हो गया | भगवान की माया प्रबलता से सभी जीवों को घेर चुकी है |* *साधारण मनुष्य जहाँ जीवन से प्रेम करता हुआ जीवन जीने के लिए जीवित रहता है वहीं संयासी मृत्यु से प्रेम करके मृत्यु प्राप्त करने के लिए जीवन व्यतीत करता है |*

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