संध्या विधान :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

संध्या विधान :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा द्वारा बनाई हुई सृष्टि आदिकाल से गतिशील रही है | गति में निरंतरता बनाए रखने के लिए इस संसार की प्रत्येक वस्तु कहीं न कहीं से नवीन शक्तियां प्राप्त करती रहती है | इस संसार में चाहे सजीव वस्तु हो या निर्जीव सबको अपनी गतिशीलता बनाए रखने के लिए आहार की आवश्यकता होती है | किसी भी जीव को अपनी गतिशीलता बनाए रखने के लिए यदि समय-समय पर भोजन पानी की आवश्यकता होती है तो प्रत्येक जीव की भीतर स्थित आत्मा को भी समय-समय पर आहार की आवश्यकता होती है | आत्मा जो कि अजर अमर है | वह इस सृष्टि में सबसे अधिक गतिशील मानी गई है तो ऐसे में आत्मा को सबसे अधिक आहार की आवश्यकता मानी जाती है | विचारणीय विषय यह है कि आत्मा का आहार क्या है ?? तो जहां तक मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जान पाया हूं कि आत्मा को स्वाध्याय , सत्संग , आत्मचिंतन , उपासना एवं साधना आदि के द्वारा आहार प्राप्त होता है | इस प्रकार आहार पाकर के आत्मा चेतन , क्रियाशील रहते हुए बलवान बनती है | इस संसार में जो भी मनुष्य इन आहारों से अपनी आत्मा को वंचित रखते हुए सांसारिक माया जाल में फंसाए रखते हैं उनकी आत्मा भूखी हो करके निश्तेज , निर्बल और मूर्छित अवस्था में पड़ी रहती है | इसीलिए हमारे महर्षियों ने आत्म साधना को प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक मानते हुए इसे नित्यकर्म में सम्मिलित करने का प्रयास किया है | जिस प्रकार आत्मा को आहार प्राप्ति के लिए इन दिव्य उपायों की आवश्यकता है उसी प्रकार कुत्सित विचारों का विसर्जन भी महत्वपूर्ण होता है | आत्मा को चेतन एवं बलवान बनाने की पद्धति को साधना कहते हैं | यह साधना प्रत्येक जीव के आत्मिक विकारों को नष्ट करते हुए उसे दिव्य बनाती है | नित्यकर्म में सम्मिलित इसी आत्म साधना को हमारे पूर्वजों ने तीन भागों में विभक्त करते हुए संध्या का नाम दिया है | त्रिकाल संध्या प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है क्योंकि इससे मनुष्य कुछ समय के लिए ध्यानस्थ हो करके आत्म साधना कर सकता है |* *आज के व्यस्ततम जीवन में सत्संग साधना करना सबके लिए शायद संभव नहीं है | जिस प्रकार पूर्व समय में मनुष्य दिन भर सत्संग -;कथा आदि में बैठ करके कुछ समय भगवान की आराधना करने का प्रयास करता था , उसके विपरीत आज प्रत्येक मनुष्य अपने आप में व्यस्त हैं | ऐसे में सबके लिए संभव नहीं है कि वह सत्संग कथाओं को समय दे पाए | इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमारे महर्षियों ने मनुष्य के लिए त्रिकाल संध्या का विधान रखा है | प्रातः काल , मध्यान्ह एवं सायंकाल को तीनों समय संध्या करके मनुष्य अपनी आत्मा को तेजवान एवं बलवान बना सकता है | परंतु आज समाज में बिरले मनुष्य ही तीनों समय की संध्या करते मिलेंगे , क्योंकि आज किसी के पास समय ही नहीं है | यदि कोई त्रिकाल संध्या करता भी है तो आज का अधिक पढ़ा लिखा समाज उसे ढोंगी एवं महापंडित की संज्ञा दे देता है , परंतु मनुष्य को ऐसे लोगों का ध्यान न दे करके अपने कार्य में लगे रहना चाहिए , क्योंकि ऐसा करके आप अपनी आत्मा को भोजन करा रहे हैं | जैसा कि मैंने बताया कि जैसे हमारे शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार आत्मा को भी भोजन की आवश्यकता होती है , और आत्मा का भोजन त्रिकाल संध्या के माध्यम से , स्वाध्याय के माध्यम से , सत्संग के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है | संध्या का विधान देखने में तो बहुत कठिन है परंतु जिस प्रकार मनुष्य को भोजन करने के लिए पहले अन्न को पकाना पड़ता है उसी प्रकार आत्मा को भोजन कराने के लिए कुछ तो कार्य करना ही पड़ेगा | इसलिए मनुष्य को संध्या अवश्य करनी चाहिए |* *संध्या ना करने वाला मनुष्य निस्तेज हो जाता है , क्योंकि जब उसकी आत्मा निस्तेज हो जाएगी तो सर्वगुण संपन्न होने के बाद भी मनुष्य में तेज नहीं हो सकता |*

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