लेख, "वृद्धाश्रम की उपयोगिता: क्यों : कारण और निदान"

09 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (317 बार पढ़ा जा चुका है)

लेख, "वृद्धाश्रम की उपयोगिता: क्यों : कारण और निदान"


भारतीय परिवेश और भारतीयता अपने दायित्व का निर्वहन करना बखूबी जानती है। जहाँ तक आश्रमों की बात है अनेकों आश्रम अपने वजूद पर निहित दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं जिसमेँ गृहस्ताश्रम, पथिकाश्रम, शिक्षाश्रम, बाल आश्रम, विधवा आश्रम, वृद्धाश्रम, अनाथ आश्रम, नारी सुरक्षा आश्रम और तीर्थाश्रम इत्यादि जरूरत पड़ने पर पटल पर विद्यमान हो जाते हैं और उनकी सेवा मुहैया हो जाती है जो परिवर्तित परिस्थितियों व समय सर्जित जरूरतों को ध्यान में रखकर सृजित होते रहे हैं। जब कि हम भारतीय अपनी रहनी- करनी के सारे साधन अपने गाँव-घर में उपार्जित करके, अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के आदी हैं और उसी में खुशी के साथ ही साथ आत्मीय दायित्व निभाने का सन्तोष मानकर उसके ममत्व व लगाव में झलकतेँ रहे हैं।

पुनरावलोकन करें तो आज के परिवेश को देखकर दिल द्रवित हो जाता है, लाचार माँ- बाप अपनी नाजों से पालित गृहस्ती को बसाकर, दुलारकर और अपने हाथों से सिंचित बाग में तमाम फल-फूल लगाकर उसकी छाया से उस समय बंचित कर दिए जाते है जब उन्हें सबसे अधिक अपनों के सहारे की जरूरत होती है। उनके हाथों के छाले उनकी झूलती झुर्रियां अपनों से पूछना चाहती हैं कि जब इस आश्रम में मेरी जगह नहीं है तो उस वृद्धाश्रम में कौन ऐसा फरिश्ता है जो उन्हें अपनत्व देने के लिए व्याकुल हुआ जा रहा है क्यों मुझे कसाई के कटघरे में ढकेल रहे हो क्या अपराध है मेरा, कुछ तो बताओं मेरे जिगर के टुकड़े मेरे सुपुत्र! बड़े त्याग से पालन किया था। बड़ी उम्मीदें सजाई थी नाती-पोतों के लिए मनौतियां मांगी थी, मंदिरों की ऊँची सीढ़िया चढ़कर घंटियां बजाई थी और तुम आज उन्हीं हड्डियों को अपने से जुदा कर रहे हो जिनमें वह दर्द है जो कँहरता तो था पर आवाज नहीं करता था कि मेरे सलोने की नींद टूट जाएगी। खेलना चाहता था , हँसना चाहता था इन नन्हीं किलकारियों के साथ जो तुम्हारी औलाद है महसूस करना चाहता था तुम्हारा अपना बचपन इस बुढ़ापे में इन अबोध नाती-पोतों के साथ और सुख की नींद सो जाना चाहता था इसी छत के नीचे जिसे हमने अपने अरमानों को कुचल कर बनाया था। जो आज तुम्हारा है, तुम वारिस हो हमारे दुनिया का। इतना बता दो मेरे लाल कि माँ-बाप भार क्यों हैं?, बुढापा अपराध कैसे है, वृद्धाश्रम इसका इलाज है यह सर्वत्र दिखाई देता है पर क्या दर्द दूर होता है इसका निजात करने वाला शायद यह भूल गया कि एक दिन वह भी वृद्ध होगा, तब क्या वह यह दर्द बरदाश्त कर पायेगा। शायद नहीं, क्यों कि उसने परोपकार के नाम पर अपना उपकार किया है और वृद्धाश्रम के नाम पर उन लोगों को दर्द दिया है जो लोग अपने अंतिम पड़ाव पर हैं और अपनों के हूफ़ से वंचित इस लिए कर दिए गए हैं कि घर के अलावा वृद्धाश्रम का विकल्प मौजूद है।

किसी व्यवस्था पर उँगली उठाने का यहाँ तनिक भी विचार नहीं है, गुण-दोष सर्वत्र विद्यमान होते हैं पर भावनाओं के साथ खेलने और उन्हें प्रताड़ित करने का अधिकार भारतीय परंपरा में किसी किसी को नहीं है। आयाती दृष्टिकोण जब भी अपनाए जाते हैं तो कमोवेश यहीं परिणाम होता है। रहन-सहन, खान-पान, वेष-भूषा, विचार सरणी किसी पर थोपी नहीं जाती। अनुकूल होने पर सहर्ष उसे अपनाया जाता है, जरूरी नहीं कि हर वस्तु हर मौसम में लाभदायी हो, हर मकान हर जलवायु के अनुकूल हो, हर विचार सर्वमान्य हो, जरूरी यह है कि हमारी भावना, हमारे आदर्श हमारी नैतिकता किसको समाहित करके खुशी प्राप्त करती है उसको अपनाना और प्रसारित करना उत्तम है।

वृद्धाश्रम क्यों, उसकी उपयोगिता और निदान: पर दृष्टि डालें तो मन गुमराह हो जाता है कि इसकी क्या जरूरत है जब वारिसदार मौजूद है, उपयोगिता को देखें तो कष्ट ही कष्ट होता है कि माँ-बाप अभी जिंदा है और हम उनकी छाया से अपनी सुख-सुविधा के लिए वंचित हैं क्यों कि वृद्धाश्रम है। निदान- बहुत आसान है हम बिना पर उड़ना बंद कर दें और यह जाने कि परमात्मा के बाद अगर कोई आत्मा हमारे भले के लिए पृथ्वी पर है तो वह है माँ-बाप। इनकी आत्मा दुखाकर हम सुखी नहीं रह सकते, इनकी चरणों में चारोधाम है। इनकी पूजा हमारा कर्तव्य है इनका आशीष हमारे सशक्त निधि है। इनको प्यार से रखें और भारतीय सानिध्य को बरकरार रखें। इस जन्नत को जहन्नुम न बनाएं। इस वटवृक्ष को सम्हालें और तमाम व्याधियों से मुक्त रहें।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "पद" कोयल कुहके पिय आजाओ, साजन तुम बिन कारी रैना,डाल पात बन छाओ।।



महातम मिश्रा
15 दिसम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय, स्वागतम

Tushar Thakur
14 दिसम्बर 2018

Thanks For Posting such an amazing article, i really love to read your Post
regulearly on this community of shabd.


Also Visit :bharatstatus &
Read Also: WhatsApp Funny jokes
Read Also:attitude status in hindi

महातम मिश्रा
10 दिसम्बर 2018

मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस लेख को श्रेष्ठ रचना का सम्मान देने के लिए व मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

महातम मिश्रा
10 दिसम्बर 2018

स्वागतम आदरणीय, हार्दिक धन्यवाद

महातम मिश्रा
10 दिसम्बर 2018

स्वागतम आदरणीय, हार्दिक दहन्यवद

उदय पूना
10 दिसम्बर 2018

भावपूर्ण लेख के लिए, बधाई |

रेणु
09 दिसम्बर 2018

आदरणीय भैया -- वृद्धाश्रम की उयोगिता क्यों ? ये प्रश्न बहुत ही अजीब है | माता पिताके लिए हम जो आज सोचेंगे कल वाही हमारे साथ होने वाला है ये बात जरुर याद दिलाने वाली है | अपनी कहूं तो मैं भी माता - पिता जी यानि मेरे सास - ससुर के सानिध्य में बाईस साल से हूँ | मुझे कभी बच्चों की चिंता नहीं हुई | उनके सुख मैंने हर पल अनुभव किये हैं | कभी - कभी बुजुर्ग - दिवस , मातृ- दिवस या पितृ- दिवस इत्यादि पर वृद्धाश्रम के संतान द्वारा त्यागे गये माता - पिताओं की व्यथा कथा मन को भिगो देती है | तब प्रश्न उठता है उन्होंने क्या कमी कर दे होगी अपने स्नेह ममता के बारे में ? और हम क्या खास करते हैं अपनी संतान के लिए जो हम उनसे अपने सुरक्षित भविष्य की आशा रखते हैं? हर माता पिता अपने पालन पोषण पर गर्व करता है और यथा संभव अपने बच्चों के लिए करता है | भारतीय संस्कृति में स्वेच्छा से गृह त्याग के उदाहरन तो मिलते हैं पर माता पिता को घर से दूर वृद्धाश्रम में भेजने के नहीं | वृद्धाश्रम जैसी व्यवस्था इस पर दाग के सामान है | श्रवण कुमार की भूमि पर वृद्धाश्रमों की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए | आपे विचारों से अक्षरशः सहमत हूँ | काश कोई भटका बेटा बेटी ये विचार अपनाकर भटके रस्ते से वापिस लौट आये || भावपूर्ण लेख के लिए सस्नेह बधाई |

महातम मिश्रा
10 दिसम्बर 2018

बिल्कुल सही बहन जी, यही सब बातें मन को झंकझोर गई और यह लेख निकलकर सामने आ गया, बहुत बहुत धन्यवाद बहना, शुभाषीश

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
02 दिसम्बर 2018
"
लघुकथा "अब कितनी बार बाँटोगे"अब कितनी बार बाँटोगे यही कहकर सुनयना ने सदा के लिए अपनी बोझिल आँख को बंद कर लिया। आपसी झगड़े फसाद जो बंटवारे को लेकर हल्ला कर रहे थे कुछ दिनों के लिए ही सही रुक गए। सुनयना के जीवन का यह चौथा बंटवारा था जिसको वह किसी भी कीमत पर देखना नहीं चाहती थी। सबने एक सुर से यही कहा
02 दिसम्बर 2018
01 दिसम्बर 2018
दे
देवरहा बाबा के बहानेविजय कुमार तिवारीजब हम एकान्त में होते हैं तो हमारे सहयात्री होते हैं-आसपास के पेड़-पौधे। वे लोग बहुत भाग्यशाली हैं जिन्हें ऐसी अनुभूति होती है। मेरा दुर्भाग्य रहा कि मुझे पूज्य देवरहा बाबा जी का दर्शन करने का सुअवसर नहीं मिला। साथ ही सौभाग्य है कि आज मैं उन्हें श्रद्धा भाव से या
01 दिसम्बर 2018
30 नवम्बर 2018
"
"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2
30 नवम्बर 2018
24 दिसम्बर 2018
एक और साल अपने नियत अवधि को समाप्त कर जाने को है और एक नया साल दस्तक दे रहा है। बस, एक रात और कैलेंडर पर तारीखे बदल जायेगी। दिसम्बर और जनवरी महीने की कुछ अलग ही खासियत होती है। कहने को तो ये भी दो महीने ही तो है पर साल के सारे महीनो को बंधे रखते है। दोस
24 दिसम्बर 2018
04 दिसम्बर 2018
"
वज़्न--212 212 212 212 अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— लुभाते (आते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे"गज़ल"छोड़कर जा रहे दिल लुभाते रहेझूठ के सामने सच छुपाते रहे जान लेते हक़ीकत अगर वक्त कीसच कहुँ रूठ जाते ऋतु रिझाते रहे।।ये सहज तो न था खेलना आग सेप्यास को आब जी भर प
04 दिसम्बर 2018
27 नवम्बर 2018
"
मापनी--212 212 212 212, समान्त— बसाएँ (आएँ स्वर) पदांत --- चलो "गीतिका" साथ मन का मिला दिल रिझाएँ चलोवक्त का वक्त है पल निभाएँ चलोक्या पता आप को आदमी कब मिलेलो मिला आन दिन खिलखिलाएँ चलो।।जा रहे आज चौकठ औ घर छोड़ क्योंखोल खिड़की परत गुनगुनाएँ चलो।।शख्स वो मुड़ रहा देखता द्वार कोगाँव छूटा कहाँ पुर बसाएँ
27 नवम्बर 2018
04 दिसम्बर 2018
"
"पद"कोयल कुहके पिय आजाओ,साजन तुम बिन कारी रैना, डाल-पात बन छाओ।।बोल विरह सुर गाती मैना, नाहक मत तरसाओ ।भूल हुई क्यों कहते नाहीं, आकर के समझाओ।।जतन करूँ कस कोरी गगरी, जल पावन भर लाओ।सखी सहेली मारें ताना, राग इतर मत गाओ।।बोली ननद जिठानी गोली, आ देवर धमकाओ।बनो सुरक्षा कव
04 दिसम्बर 2018
30 नवम्बर 2018
कि
दिन भर सूरज से बाते करता , खुद भूखा रहता हे फिर भी कर्मरत - हे वह निरंतर दिन भर तपता ,सूरज की गर्मी में देखता - क्या दम सूरज में की दे दे वो शाम को दो दाने वो ान के भर दे शायद वो पेट उनका भी जो - बैठे हे एकटक बाट ज़ोह किसी अपने की (ये ऐसी केसी ह
30 नवम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x