एक प्यार ऐसा भी

11 दिसम्बर 2018   |  विजय कुमार तिवारी   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

एक प्यार ऐसा भी-
विजय कुमार तिवारी

रमेश बाबू की जिन्दगी के सारे उतार-चढ़ाव समतल धरातल में बदल चुके हैं और लोग उनको आदर के भाव से देखने लगे हैं। जीवन की जिम्मेदारियाँ निपट गयी हैं और कीर्तन-भजन में मन लगने लगा है।उनका चिन्तन चलता रहता है और अनेक तरह के अनुभव याद आया करते हैं। संतोष एक ही है कि उन्होंने किसी को धोखा नहीं दिया है और कोई बड़ा सा मतभेद भी किसी के साथ नहीं रहा। वैसे जीवन में थोड़े-बहुत झमेले तो होते ही हैं जिसे हमेशा उन्होंने शान्ति और बुद्धिमता से सुलझाया है।यह भी मानते हैं कि परमात्मा की उनपर बड़ी कृपा सदैव बनी रही है।
उन्हें पता है कि खाली बैठकर जीवन काटना आसान नहीं होगा। उन्होंने स्वयं को व्यस्त रखने की कोशिशें शुरु कर दीं और उन कार्यो पर चिन्तन करना उचित समझा जो उनके मनोनुकूल हो। साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना,धार्मिक साहित्य मँगाना, यह तो उनका पहले से ही शौक रहा है। मित्रों की सलाह पर उन्होंने लैपटाप ले लिया और नेट की दुनिया में कदम रखा। शुरु में बड़ी परेशानी हुई परन्तु धीरे-धीरे उन्होंने काम चलने भर ज्ञान प्राप्त कर लिया। मोबाईल तो था ही। ह्वाट्सअप में सारे सगे-सम्बन्धियों को जोड़ लिया और फेसबुक,ट्वीटर,मैसेञ्जर पर भी आनन्द उठाने लगे।उनको बहुत शान्ति मिली कि घर बैठे आप दुनिया भर के लोगों के सम्पर्क में रह सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आप अपनी भावनाओं के अनुसार चुनाव कर सकते हैं और अपने मनोनुकूल जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने एक काम और शुरु किया। वल्कि ऐसे कहिये कि परमात्मा ने उन्हें यह काम सौंप दिया और पूरी तन्मयता से उन्होंने इसे पूरा किया। पड़ोस में रहने वाले बुजूर्ग-दम्पति की सुविधा और स्वास्थ्य के लिए उन्होंने चिन्तन किया। अन्तःप्रेरणा हुई तो उन्होंने 21 दिनों तक श्रीमद्भभागवद गीता का पाठ किया। अद्भूत अनुभव हुआ कि ऐसे भी जीवन में सुख,शान्ति और स्वास्थ्य लाया जा सकता है। इसतरह उनके साथ कुछ लोग आने-जाने लगे और धर्म चर्चा,ईश्वर चर्चा होने लगी।
फेसबुक और ट्वीटर पर उनके मित्रों,अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। पहले उन्होंने छोटे-छोटे लेख लिखे जिसको लोगों ने खूब पसन्द किया। बहुत लोग टिप्पणियाँ भी करते और कुछ तो अपनी समस्यायें भी बताने लगे। इस तरह दूर बैठे किसी को मार्गदर्शन देने का अनुभव बड़ा रोचक और प्रिय लगा। दुनिया में बहुत दुख है और अधिकांश लोग तो जानकारी के अभाव में दुखी हैं।उन्होंने यह भी अनुभव किया कि लोग अपने दुखों को समझ ही नहीं पाते और यह भी नहीं जान पाते कि सचमुच का दुख क्या होता है।
बहुत सी महिलाओं ने अपनी समस्यायें बतलायीं। अधिकांशतः समस्यायें घरेलू जीवन की होतीं जिनका समाधान अपने अनुभव के आधार पर बतलाते। कुछ ने अपनी नौकरी और कार्यालय की बातों की चर्चा की।
एक दिन उन्हें एक महिला का सन्देश मिला।उसने उनके लगभग सभी रचनाओं,कहानियों,लेखों और उपदेशों को पढ़ा है और उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखती है। रमेश बाबू को इसतरह किसी ने कभी नहीं कहा है। उनको एक अलग सी अनुभूति हुई और उन्होने उसकी पूरी प्रोफाईल देखी। सूचनायें सामान्य ही थीं जैसे अमूमन होती हैं। फोटो में वह बहुत सुन्दर लग रही थी। उसने अपने बहुत से फोटो डाल रखे थे। कुछ फोटो उसके परिजनों के साथ भी थे।अच्छा भला परिवार था और सबकुछ ठीक-ठाक लगा।
उन्होंने लिखा," आप तो बहुत सुन्दर लग रही हो। चेहरे पर खुशी के भाव हैं,दुख या परेशानी तो होनी नही चाहिए।"
"आपकी बातें सही हैं," उसने लिखा,"मुझे किसी भी तरह की कमी नही है।"
"फिर क्या बात है?"
"कैसे बताऊँ मैं?" उसने बहुत देर के बाद उत्तर दिया।
रमेश बाबू ने थोड़ी शंका और थोड़े उत्साह से पूछा," आप अपना सही परिचय दीजिए। अपना सही नाम,आपकी उम्र और यह भी कि क्या ये फोटो आपके ही है ना।"
शायद उसने बुरा मान लिया। बहुत देर तक कोई उत्तर नहीं दी। रमेश बाबू उत्सुकता से प्रतीक्षा करते रहे।
उसने लिखा,"दुख हुआ कि आपने मुझे गलत समझा।मन में आया कि आप से मित्रता का सम्बन्ध त्याग दूँ। ऐसे ही शंका करोगे तो छोड़ भी दूँगी।"
"आप तो नाराज हो गयीं। मैंने ऐसे ही पूछ लिया था। आपको पता होगा ही कि फेसबुक पर जाने कितने लोगों ने गलत नाम से खाते खोल रखे हैं,"रमेश बाबू ने लिखा।
"मैं वैसी नहीं हूँ,"उसने कहा,"मैं आपको सब बताऊँगी। बस मुझे चिढ़ाना नहीं।"
"मैं किसी को चिढ़ाता नहीं और नारियों के प्रति आदर,सम्मान का भाव रखता हूँ," रमेश बाबू ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया,"आप तो बहुत अच्छी लग रही हो। आपको कैसे चिढ़ा सकता हूँ?"
"ओहो---क्या बात है--"उसने कहा,"बड़े रोमैण्टिक हो रहे हो।"
रमेश बाबू को किंचित आश्चर्य हुआ। थोड़ा अच्छा भी लगा।उन्होंने कहा," "आप इतनी सुन्दर हो,कोई भी हो जायेगा," रमेश बाबू ने उत्तर दिया। उन्होंने फिर से उसकी पूरी प्रोफाईल देखा और मन ही मन मान लिया कि सुन्दरता के साथ-साथ उसमें वाक्चातुर्य भी है।सभ्य भी है, खुशमिजाज और मिलनसार भी।उन्होंने मन ही मन आशीर्वाद दिया,"ऐसे ही हमेशा खुश रहो और तुम्हारे जीवन में सुख-शान्ति बनी रहे।"
"आपको ही सुन्दर लगती हूँ। जाने क्या देख रहे हो मुझमें?" उसने जैसे इतरा कर कहा होगा। रमेश बाबू मुस्करा उठे। भीतर एक विचित्र सी अनुभूति हुई जो बहुत प्रीतिकर लगी।
"देखने को तो बहुत कुछ देख रहा हूँ, पर कह नहीं सकता"रमेश बाबू ने कहा और मधुर अनुभूतियों के सागर की तरंगों में डूबने-उतराने लगे।मौसम मानो बासंती हो गया है,मलय पवन सभी को रोमांचित कर रहा है,कोयल ने तान छेड़ दी है,क्यारियों में फूल खिले हैं और भौंरे गुँजार कर रहे हैं। प्यार की जाग रही भावनाओं को उन्होने जोर देकर सुला दिया और नैतिकता की दुहाई देकर दिल को समझाने की कोशिशें कीं कि यह किसी भी तरह उचित नहीं है।
"बातें तो की ही जा सकती हैं,"उनके दिल ने दलील पेश की। उन्होंने मान लिया कि बातें करने में कोई बुराई नहीं है। खुशी हुई कि उधर से भी तो सकारात्मक भाव दिख रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि किसी की भावनाओं का सम्मान करना उचित नहीं है।

जितनी तेजी से यह सम्बन्ध आगे बढ़ रहा था और रमेश बाबू को आनन्द आना शुरु हुआ था,उसी रफ्तार में स्थिति बदल भी गयी। उसने उत्तर देना बंद कर दिया और उनको लगा किसी ने सामने परोसा हुआ थाल खींच लिया है। अपने स्वभाव के अनुसार पहले उन्होंने अपनी गलती की पड़ताल की और बारीकी से अपने सभी वार्तालापों की जाँच की।स्थिति थोड़ी भिन्न तो है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बहुत गलत माना जाय। उन्होंने स्वयं को साफ-सुथरा माना और उसे भी बहुत अच्छा दोस्त समझा।मित्रता भले ही नहीं थी परन्तु रमेश बाबू को उसकी यादें आती रहती। कभी-कभी वे उसकी प्रोफाईल पर जाते और फोटो देखते। कभी-कभी सुप्रभात भी लिख देते लेकिन वह कोई जवाब नहीं देती।
किसी शाम उन्होंने लिखा,"क्या आपको बातें करना पसन्द नहीं है?"
उसने उत्तर दिया,"मैं एक घरेलू,शादी-शुदा औरत हूँ और बच्चे सम्भालने हैं। खाली समय नहीं मिलता।"
"जी,बहुत अच्छा,"रमेश बाबू ने कहा।
उसने फिर लिखा,"मुझे आप बड़ी बुआ के रिश्ते-नाते में लगे,इसलिए जोड़ ली थी।आप की कहानियाँ बहुत अच्छी लगती हैं।सोचा कि आपकी रचनायें पढ़ा करुँगी।बातें करने का समय तो बिल्कुल नहीं है मेरे पास।"
"कोई बात नहीं।आप वही कीजिए जो आपका मन करे।"रमेश बाबू ने थोड़ी निराशा के भाव से कहा। एक समस्या और खड़ी हो गयी कि वे अपनी ओर से मित्रता का प्रस्ताव भेज नहीं सकते थे।उन्होंने लिखा," देखिये,यदि अच्छा लगे तो जुड़िये मुझसे और सम्पर्क में रहिए।"
रमेश बाबू को सुखद आश्चर्य हुआ कि उसने मित्रता का प्रस्ताव भेजा जिसे उन्होंने तुरन्त स्वीकार कर लिया।धीरे-धीरे बातें भी होने लगी।
एक बार फिर उसकी खूबसूरती और मधुर बातों ने रमेश बाबू को प्रभावित किया। वह भी प्रभावित थी,उनकी बातों,कहानियों और लोगों के अन्तर्सम्बन्धों की जटिलताओं की व्याख्या से। उसने किसी दिन पूछ ही लिया," आप नारी-मन की इतनी सटीक व्याख्या कैसे कर लेते हो?कैसे समझ जाते हो कि मेरे मन में क्या है?"
रमेश बाबू ने उत्तर तो दिया परन्तु वह बात नहीं बतायी जो उनके मन में थी।
वह हँस पड़ी,"मैं सब समझती हूँ।"
"यही तुम्हारी विशेषतायें मुझे प्रभावित करती हैं,"रमेश बाबू भी हँस पड़े।साथ ही एक शंका भी उन्हें चिन्ता में डाल रही थी,"कौन सा कारण है कि वह इस कदर आत्मीय होती जा रही है?हालाँकि उसका आत्मीय होना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। रमेश बाबू उसकी भावनाओं को समझ नहीं पा रहे थे और अपनी सोच में बहुत निम्न स्तर पर थे जिसके लिये उन्होंने उस से माफी भी माँगी। उसने जब कहा,"आपसे एक बात बोलूँ।"तो उन्होने कहा," कुछ माँगना चाहती हो क्या?"
वह विफर उठी,"आपने मुझे समझ क्या रखा है?मेरे पास सबकुछ है-धन-दौलत,बंगला,गाड़ी और भरा-पुरा परिवार। सभी बहुत अच्छे हैं और मुझे सबका भरपूर स्नेह-आदर मिलता है।"
रमेश बाबू को लगा- वह नाराज हो जायेगी और फिर दोस्ती खत्म। शुक्र है,ऐसा कुछ भी नहीं हुआ परन्तु उसने अनेक बार उलाहनायें दीं कि उन्होंने उसे माँगनेवाली समझा।उन्हें आत्मग्लानि हुई और बार-बार उन्होंने इसके लिए पश्चाताप की बातें की।खुशी हुई कि उसने इस बात को भूल जाने को कहा। रमेश बाबू को वह एक बहुत समझदार और सुलझी हुई महिला लगी। उनके दिल में प्यार,सहानुभूति के साथ उसके लिए आदर-सम्मान की भावना उभरी।उन्होंने इस अनुभूति की चर्चा भी की जिसे उसने यह कहकर नकार दिया,"उसके दिल में आपके लिए प्यार पहले से ही है। हाँ,यह आदर वाला प्यार है,प्यार वाला प्यार नहीं।"उसने पुनः कहा," आपकी सत्यवादिता ने मुझे बहुत प्रभावित किया जब आपने कहा कि मैं उम्रदराज आदमी हूँ।पहले तो मैं खूब हँसी थी उस दिन और मन हुआ कि अपना माथा दीवार में दे मारूँ। अरे दोस्ती भी की तो ऐसे इंसान से? फिर मुझे आपकी सच्चाई ने खींच लिया अपनी ओर, और मैं आदर वाले प्यार के साथ आपकी हो गयी।"
एक बात और कहना चाहूँगी," मैं पहले बहुत नकचढ़ी थी। मेरे मन के खिलाफ कोई मुझसे कुछ भी नहीं करवा सकता था।मेरे पति भी मेरी भावनाओं को समझते हैं और उसी के अनुसार व्यवहार करते हैं। कई बार वे अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं जब मैं किसी दूसरी स्थिति-परिस्थिति में होती हूँ। इसलिए मैं उनका बहुत सम्मान करती हूँ। यह तभी हो सकता है जब कोई आपको बहुत प्यार करता हो। भगवान सभी महिलाओं को ऐसा प्यार करने वाला पति दे।"
वह पूरे रौ में बोले जा रही थी,"आपको बताती हूँ-बचपन में ही मेरी माँ की मृत्यु हो गयी। पिता और दादी की देखरेख में बड़ी हुई। अनुशासन में रहना था और लगता था कि माँ होती तो कुछ और होता। शादी की बात चली तो इनके पिता ने मुझे देखा और पसन्द किया। इनका तर्क दूसरा था। अपनी माँ को बोलते थे कि गाँव की लड़की से शादी नहीं करूँगा।इनके पिताजी ने कहा कि पहले एक बार जाकर देख तो लो। फिर जैसा कहोगे,वही होगा।"
"फिर क्या हुआ?" रमेश बाबू ने पूछा।
वह हँस पड़ी," आप को सच बता रही हूँ। मैं तो इनको देख ही नहीं पायी। जब पलकें उठाऊँ तो यही निहारते मिले। ऐसे लट्टू हुए कि पूछिये नहीं।शादी हो गयी और मैं चली आयी। सभी ने मेरा खूब स्वागत किया और बहुत प्रेम से रखा। मैंने भी अपनी ओर से कोई कमी नहीं की और पूरे घर को सम्भाल लिया। दादी ने सिखाया था कि वही तुम्हारा घर है। जैसा करोगी वैसा ही मिलेगा। सचमुच कह रही हूँ-मुझे बहुत स्नेह और प्यार मिला।"
"आप हो ही इसके लिए काबिल,"रमेश बाबू ने उसकी आँखों की खूबसूरती को देखते हुए कहा,"आपको कौन नहीं प्यार करेगा?"
"अब इतना भी मत चढ़ाईये।"उसने धीरे से कहा।रमेश बाबू को लगा-शायद शरमा रही होगी। मृदुल हँसी का भाव उनके चेहरे पर उभरा।
उसने कहा,'ऐसा क्या है आपमें, मैने अपनी सारी बातें साझा की और आपको अपना परिजन ही एक मान रही हूँ। दरअसल आपने मेरा वह रिक्त स्थान भर दिया है जो मुझे खाली-खाली लगने लगा था।सास-ससुर अपनी दुनिया में,देवर-देवरानी अपनी मस्ती में,पतिदेव आफिस और बच्चे अपने स्कूल। अब मैं आपको पढ़ती हूँ,आपसे बातें करती हूँ, स्वयं को बदल रही हूँ और आपको प्यार भी करती हूँ।

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Tushar Thakur
13 दिसम्बर 2018

Thanks For sharing such a amazing article, i really love to read your content
regulearly.

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उदय पूना
13 दिसम्बर 2018

पाठक को बांध कर रखनेवाली कहानी, बधाई, प्रणाम

रेणु
11 दिसम्बर 2018

आदरणीय विजय जी -- ऐसे रूहानी सम्बन्ध अगर निस्वार्थ हों तो सचमुच उस रिक्तता को भरते हैं जो सबके होते भी जीवन में अनायास पैदा हो जाती है | पर ऑनलाइन बहुत से धोखे होने की संभावना भी रहती होगी || रोचक कथा के लिए सादर बधाई और शुभकामनायें |

आभार आपका ,आप कहानी की भावनाये समझती है .

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