समीक्षा

11 दिसम्बर 2018   |  ओमप्रकाश क्षत्रिय '' प्रकाश -   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक पुस्तक: हास्य-व्यंग्य


भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक


पुस्तक: हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी

रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167

प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675


स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है।


वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है।


समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है ।


रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं।



व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है।



कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं।



कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है ।


पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है ।


पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है

_______________________________


ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' ,

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़

जिला -नीमच (मध्यप्रदेश)

पिनकोड- 458226

9424079675


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From: Omprakash Kshatriya

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Subject: समीक्षा--भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक




भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक


पुस्तक: हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी

रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167

प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675


स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है।


वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है।


समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है ।


रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं।



व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है।



कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं।



कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है ।


पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है ।


पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है

_______________________________


ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' ,

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़

जिला -नीमच (मध्यप्रदेश)

पिनकोड- 458226

9424079675


की भेलपूरी रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167 प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294 समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675 स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है। वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है। समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है । रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं। व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है। कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं। कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है । पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है । पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है _______________________________ ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' , पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़ जिला -नीमच (मध्यप्रदेश) पिनकोड- 458226 9424079675 Show quoted text ---------- Forwarded message --------- From: Omprakash Kshatriya Show quoted text Show quoted text Subject: समीक्षा--भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक पुस्तक: हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167 प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294 समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675 स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है। वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है। समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है । रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं। व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है। कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं। कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है । पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है । पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है _______________________________ ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' , पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़ जिला -नीमच (मध्यप्रदेश) पिनकोड- 458226 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भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक पुस्तक: हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167 प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294 समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675 स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है। वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है। समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है । रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं। व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है। कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं। कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है । पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है । पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है _______________________________ ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' , पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़ जिला -नीमच (मध्यप्रदेश) पिनकोड- 458226 9424079675 Show quoted text ---------- Forwarded message --------- From: Omprakash Kshatriya Show quoted text Show quoted text Subject: समीक्षा--भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक भेलपूरी सी चटपटी व्यंग्य की शानदार पुस्तक पुस्तक: हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी रचनाकार: विनोद्कुमार विक्की 9113437167 प्रकाशक: रवीना प्रकाशन, सी -316 , गली नंबर- 11 गंगा विहार, दिल्ली -110094 मोबाइल 92 0512 7294 समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' 9424079675 स-हित जो रचा जाता है वह साहित्य कहलाता है । इसमें समाहित उद्देश्य यदि परम या लौकिक हो तो उसे लौकिक साहित्य कहते हैं। कुछ इसी भाव से व्यंग्य रचा जाता है तो उस में विशेष अर्थ समाहित हो जाता हैं । इस का उद्देश्य भी अलौकिक हित साधना होता है । जहां दूसरी विधाओं में अपनी बात विधा अनुरूप कही जाती है वही व्यंग्य में वक्रोक्ति द्वारा स-हित की पूर्ति की जाती है। वक्रोक्ति जितनी तीक्ष्ण, पैनी और हृदय को चीरती हुई निकलती है उतना ही तीव्र घाव करती है । घाव जितना गहरा होता है असर उतना गहरा और घातक होता है। समीक्ष्य पुस्तक 'हास्यव्यंग्य की भेलपूरी' में यही बात बहुत सटीक ढंग से कही गई है । रचनाकार अपनी बात को हास्य-व्यंग्य के पुट में व्यंग्य का मिश्रण कर , सरल और सहज बात को वक्रोक्ति में करता चला जाता है । रचनाकार की रचना में व्यंग्य और हास्य मुखरित होकर व्यक्त होता है । इस भूखंड में गधे रिपेयर होते हैं, मोबाइल से भली सौतन, कलयुगी लेखक का फेसबुकी पाठक, एक लाइक की कीमत तुम क्या जानो, एफबी कथा अनंता-शीर्षक स्वयं अपनी व्यथाकथा में व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए महसूस होते हैं। व्यंग्य की यह कृति अपनी सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में हास्य को भी समेटे हुए हैं । व्यंग्य की धार प्रस्तुत कृति में सहजता से व्यक्त हुई है । हास्य का पुट इसी के साथ चला आता है । रचनाकार अपनी सरल भाषा के प्रभाव में व्यंग को सहज ही बहा ले जाता है। कृति में हिंग्लिश भाषा का ज्यादा उपयोग इसमें हास्य के साथसाथ व्यंग्य को प्रस्फुटित करता है । युवावर्ग की खिचड़ी भाषा से युक्त उन्हीं के मनोभावों को व्यक्त करती इस सुंदर कृति में छोटेबड़े सभी तरह के व्यंग्य प्रस्तुत किए गए हैं। कथातत्व युक्त चुटीली शैली में लिखी गई व्यंग्योक्ति की भाषा चुटीली और लच्छेदार है। वाक्य छोटे हैं । उक्ति के अनुरूप प्रयोग किए गए हैं । भाव के अनुरूप भाषा का उपयोग पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करता है । पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक है। 118 पृष्ठों में समाहित 57 रचनाओं की चटपटी भेलपूरी का खट्टामीठा स्वाद पाठकों को रास आएगा । पुस्तक में अक्षर की साइज बहुत ज्यादा छोटी है । इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंग्रेजी भाषा का ज्यादा प्रयोग होने के बावजूद भाषा का प्रवाह बाधित नहीं होता है । भाषा की उपयोगिता पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है । पुस्तक उपयोगी और पठनीय है । पाठक वर्ग इसका शानदार स्वागत करेंगे। ऐसी आशा है _______________________________ ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' , 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