अहिंसा परमो धर्म: :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (98 बार पढ़ा जा चुका है)

अहिंसा परमो धर्म: :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*अखिलनियंता , अखिल ब्रह्मांड नायक परमपिता परमेश्वर द्वारा रचित सृष्टि का विस्तार अनंत है | इस अनंत विस्तार के संतुलन को बनाए रखने के लिए परमात्मा ने मनुष्य को यह दायित्व सौंपा है | परमात्मा ने मनुष्य को जितना दे दिया है उतना अन्य प्राणी को नहीं दिया है | चाहे वह मानवीय शरीर की अतुलनीय शारीरिक संरचना हो या उसका मानसिक विकास अथवा धर्म संस्कृति , विज्ञान , तकनीकी , आध्यात्म जैसे संभावनाओं को साकार करने की सामर्थ्य हो | अन्य जीवो की अपेक्षा मनुष्य को विधाता ने कुछ ज्यादा ही दे करके इस पृथ्वी पर भेजा है | मनुष्य की सहायता करने के लिए मनुष्य के आसपास अनेक प्रकार के पशुओं की भी संरचना उस विधाता ने किया है | यह पशु आदिकाल से मनुष्य के विकास में सहयोगी की भूमिका निभाते रहे हैं | मनुष्य के हृदय में परमात्मा ने प्रेम उत्पन्न करके दूसरे जीवों की रक्षा एवं उनकी हिंसा न करने का संदेश भी दिया है | जहां हमारे शास्त्रों में "अहिंसा परमो धर्म:" का उद्घोष किया गया है वहीं परम पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी मानस लिखा है "पर पीड़ा सम नहिं अधमाई" अर्थात दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा कोई पाप नहीं है | जीवों के प्रति मनुष्य के हृदय में परमात्मा ने जो विशेष चीज दी है उसे संवेदना कहा गया है | यही भाव संवेदना मनुष्य की आत्मिक प्रगति की सच्ची कसौटी है | यदि मनुष्य के पास परोपकार की , अहिंसा की संवेदना नहीं है तो उसका जीवन मृतप्राय ही कहा जा सकता है | मनुष्य में मानवता का अर्थ मात्र दूसरे मनुष्यों के प्रति अपनी संवेदना के प्रति करना नहीं बल्कि संपूर्ण जीव जगत हर प्राणी , सृष्टि के प्रत्येक घटक के प्रति संवेदना की भावना रखना है |* *आज जहां एक और मनुष्य निरंतर उत्तरोत्तर विकास करता चला जा रहा है वहीं ऐसी घटनाएं भी प्रचुर मात्रा में दिखाई पड़ रही जिनमें मनुष्य दूसरे प्राणियों के प्रति हिंसक दुर्व्यवहार करता दिखाई पड़ता है | अन्य पशुओं की बात छोड़िए आज तो मनुष्य मनुष्य के लिए ही हिंसक हो गया है | मनुष्य के व्यवहार को देखकर हृदय में शंका उत्पन्न होती है और एक प्रश्न उठता है कि आज मानव की मानवता को भला क्या हो चुका है ?? मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" विचार करता हूं कि आज मनुष्य अपने मानवोचित कर्तव्यों एवं ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व को एकदम से भूलता क्यों चला जा रहा है ? जीवों के प्रति विशेषरूप से पशुओं के प्रति मनुष्य की क्रूरता बढ़ती चली जा रही है | जो लोग ऐसा कर्म कर रहे एक बात अवश्य जान ले पशु तो मर कर अपना चर्म किसी उत्पाद को बनाने में लगा जाते हैं परंतु मनुष्य का चर्म किसी भी प्रयोग में न आ करके करके मात्र दुर्गंध फैलाने वाला ही हो जाता है | यह जानते हुए भी मनुष्य परमात्मा का राजकुमार कहलाने पर भी जीवित पशुओं का चर्म खींचता दिखाई पड़ता है | दूसरों को पीड़ा दे कर के स्वयं के लिए सुख की कामना करना बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती | आज मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण यही है कि वह स्वयं दूसरों को दुख देने लगा है |* *यदि स्वयं के प्रति अहिंसा की कामना है तो सर्वप्रथम स्वयं को अहिंसक बनना पड़ेगा | बेजुबान पशुओं की हत्या बंद करनी पड़ेगी तभी मानवता सार्थक होगी |*

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