नाम एवं पद की मर्यादा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (65 बार पढ़ा जा चुका है)

नाम एवं पद की मर्यादा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*योनियों भ्रमण करने के बाद जीव को इन योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि प्राप्त होती है | मनुष्य जन्म लेने के बाद जीव की पहचान उसके नाम से होती है | मानव जीवन में नाम का बड़ा प्रभाव होता है | आदिकाल में पौराणिक आदर्शों के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखने की प्रथा रही है | हमारे पूर्वजों का ऐसा मानना था कि नाम के अनुसार ही बालक के गुण होते हैं | कहा भी गया है " यथा नाम तथा गुण" | मानस में परम पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि नाम एवं रूप में नाम का प्रभाव ज्यादा होता है | "राम ते अधिक राम कर नामू" | इस विचार से महापुरुषों के नाम से अपने अपने बालक एवं बालिकाओं का नाम रखा जाता रहा है , और यह भी सत्य है कि नाम का प्रभाव जीवन में बहुत अधिक पड़ता है | मनुष्य अपने नाम एवं समाज के द्वारा मिली पद व उपाधि के अनुसार कार्य करता रहा है , क्योंकि उसे अपने नाम एवं समाज द्वारा मिली उपाधि की मर्यादा का भी संरक्षण करना होता था | इसीलिए हमारे पूर्वज अपने नामानुरूप कर्म करते हुए अनेकों अनुसंधान करते रहे हैं जिसका लाभ आज समस्त मानव जाति उठा रही है |* *आज के चकाचौंध एवं अहंकारी युग में नाम का प्रभाव एवं मनुष्य के कर्म अपने नाम एवं पद के विपरीत देखे जा रहे हैं | जीवन में नाम का प्रभाव पड़ेगा इसीलिए हमारे अभिभावक हमारे नाम राम , कृष्ण , सीता , सती , अनुसुइया , मदालसा आदि के नाम पर रखते रहे हैं | परंतु आज नाम तो राम है परंतु कार्य रावण वाले देखने को मिल रहे हैं | आज समाज में वैमनस्यता एवं वाद - विवाद का कारण मनुष्य का अहंकार तो है ही , साथ ही मनुष्य जिस प्रकार अपने बच्चों का नाम टिंकू , पिंकू , लल्लू आदि रख रहा है उसका प्रभाव भी देखने को मिल रहा है | आज मनुष्य अपने नाम की मर्यादा के विपरीत कार्य कर रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" समाज में ऐसे लोगों को भी देख रहा हूं जिनका नाम तो हरिश्चन्द्र है परंतु वे रात दिन अनर्गल प्रलाप करते हुए झूठ ही बोला करते हैं | पूर्वकाल में हमारे महर्षियों को उनके कार्य एवं तपस्या के अनुसार पद से सम्मानित किया जाता था और वह अपने पद की मर्यादा में बंध जाते थे परंतु आज समाज में स्थापित एवं स्वघोषित उपाधियाँ धारण करने वाले अनेकों विद्वान अपने पद के विपरीत कार्य करते हुए देखे जा सकते हैं | मनुष्य समाज का दर्पण कहा गया है समाज में अपने कार्यों के द्वारा पथ प्रदर्शन करने वाले आज स्वयं पथ भ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित दिखाई पड़ रहे हैं | गंभीरता एवं सहनशीलता का ऐसे लोगों में अभाव दिख रहा है | ऐसे में नाम एवं पद का कोई औचित्य नहीं रह जाता है | सनातन के आदर्शों के पद चिन्हों पर चलने वाले लोग अपने नाम के विपरीत आज समाज में मांस मदिरा का भक्षण करके एवं जगह-जगह अनर्गल प्रलाप करके अपने नाम एवं पद की मर्यादा का हनन कर रहे हैं | इसीलिए कहा जाता है यह कलयुग है यहां कुछ भी हो सकता है |* *प्रत्येक मनुष्य को अपने नाम एवं अपने पद की मर्यादा का ध्यान रखते हुए समाज में आचरण करना चाहिए , क्योंकि आपका नाम एवं पद तथा आपका आचरण समाज की दिशा निर्धारित करता है |*

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