अन्तर्मन की व्यथा

15 दिसम्बर 2018   |  विजय कुमार तिवारी   (8 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

अन्तर्मन की व्यथा

विजय कुमार तिवारी

"है ना विचित्र बात?"आनन्द मन ही मन मुस्कराया," अब भला क्या तुक है इस तरह जीवन के बिगत गुजरे सालों में झाँकने का और सोयी पड़ी भावनाओं को कुरेदने का?अब तो जो होना था, हो चुका,जैसे जीना था,जी चुका। ऐसा भी तो नही हैं कि उसका बिगत जीवन बहुत दुखों या असुविधाओं में ही बीता है। इस क्षण ऐसी कौन सी स्मृति भीतर सिर उठा रही है? कौन सी दबी हुई भावना जागना चाहती है? कौन सी इच्छा कुलबुला रही है जो अब तक पूरी नहीं हुई है?कौन सा जीवन का प्रश्न अनुत्तरित रह गया है?"

आनन्द उल्लसित हुए और थोड़ा रोमांचित भी। भीतर अतल गहराई में भय की सिहरन कुलबुला कर सो गयी। वह कमरे से बाहर निकले और रसाल वृक्ष के नीचे खाट पर बैठ गये।यह उनका प्रिय स्थान है।आसपास फैली झाड़ियाँ और कैम्पस के अन्य लताद्रुम अलौकिक आभा से वातावरण को आलोकित कर रहते हैं। प्रभाव यह होता है कि मन-मस्तिष्क की सारी चिन्तायें तिरोहित हो आनन्द को आनन्दित और खुशनुमा कर डालती है।हमेशा ऐसे में आनन्द कहीं खो जाते हैं और दूर-दूर तक मन की यात्रायें करते रहते हैं।अद्भूत सुखानुभूति होती है और जीवन के अनेक रंग उभरते रहते हैं।कभी-कभी कुछ यादें दुखी कर जाती हैं और आनन्द को रोना आ जाता है।

उन्हें अपनी दोनो बहनों के चेहरे स्पष्ट दिखाई देते हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।एक उनसे तुरन्त छोटी थी और दूसरी भाई-बहनों में सबसे छोटी। गाँव में भरा पूरा परिवार रहता था।खेत-खलिहान,गोरु-बैल,गायें और बाग-बगीचों से पूरित उसके पिता की सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी थी। आनन्द से तुरन्त छोटी बहन की शादी गंगा किनारे बसे गाँव में हुई और उसके चार बच्चे हुए। शादी की रात लेन-देन को लेकर कुछ कहासुनी हुई थी और उसके पिता ने उत्तर में कहा,"अच्छा है, सामान को बाहर फेंक देना और बेटी को गंगा में बहा देना।" यही हुआ।आनन्द लगभग दो सालों तक उस बहन-बहनोई के साथ रहा और अपनी पढ़ाई की। जीवन में संघर्ष होता है और लड़कियाँ कैसे दुख सहकर निर्वाह करती है,आनन्द ने अपनी आँखों से देखा।उसने महसूस किया कि धन और सुख के साधनों की कमी में भी जीवन आगे बढ़ सकता है,यदि विचार अच्छा हो। जीवन जीने का तरीका हर किसी को सीखना चाहिए।वह तो बहुत सुन्दर थी और पूरा तालमेल मिलाकर उनका घर सम्भालती थी। जबतक सास रही,घर ठीक-ठाक रहा। उनके गुजरने के बाद हालात बिगड़ते गये। ससुर की मनःस्थिति खराब हो गयी। खूब खाते और पूरे घर में गंदगी फैलाते रहते। कहीं भी पाखाना कर देते और बहन साफ करते करते त्रस्त रहती। सबसे बड़ी निराशा उसे अपने पति के असहयोगात्मक रवैये से थी। आनन्द ने कभी भी बहन को खुश नहीं देखा। फिर भी वह हँसती रहती थी।प्रेम के बिना हर नारी टूट जाती है। आनन्द दुनिया के सभी पुरुषों से कहना चाहता है कि जीवन में आयी हर नारी का सम्मान किया करो।अपनी पत्नी से प्रेम करो। शादी के पहले खूब सोच-विचार कर लो। अपनी मन-पसन्द लड़की को खोज लो। जब शादी हो जाये तो शेष सम्पूर्ण जीवन उसे प्रेम दो।पत्नी को प्रेम करोगे तो तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे। तुम्हारा घर आदर्श होगा।नारियाँ कोमल मन और तन की होती हैं। उन्हें सहेज कर रखो। जिस घर की नारी का मन टूटता है और दुखी होता है वह घर,घर नहीं रह जाता।सबकुछ बिखर जाता है।

अक्सर बहुत से पुरुषों को देखा जाता है कि दुनिया भर से वे खुशी से व्यवहार करते हैं,सभी से तालमेल मिलाकर चलते हैं,नाना तरह से समझौते करते हैं परन्तु अपनी पत्नी,अपनी माँ,अपनी बहन और अपनी बेटी से बुरा व्यवहार करने लगते हैं।अपनी सारी नाकामियों के लिए इन्हें ही जिम्मेदार मानते हैं। ऐसा नहीं है। ऐसे लोगों को जीवन जीने नहीं आता। आपने गौर किया होगा कि जब आप दुखी होते हैं,आपके साथ आपकी पत्नी,माँ,बहन और बेटी सभी दुखी होती हैं। सभी आपको उस दुख की स्थिति से बाहर निकालना चाहती हैं। आपके लिए त्याग करती हैं। यह उनका आपके लिए प्रेम ही है। पता नहीं पुरुषों को उनका यह प्रेम क्यों नहीं दिखाई देता?

आनन्द को बहुत दुख हुआ।उसकी बहन नहीं रही।

सबसे छोटी बहन की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं रही। सबसे छोटी होने के कारण माँ-पिता की दुलारी तो थी ही,घर में भाभियों के आ जाने से उसका महत्व और बढ़ा हुआ था।उसकी शादी में जो बारात आयी,उसमें बड़े -बड़े प्रतिष्ठित लोग आये।अचानक आनन्द के मामा जी बदहवास घर में आये और पिता से बोले," बारात मे मेरे गाँव का डकैत अपने दल-बल के साथ आया है। खून-खराबा करेगा और सब लूट ले जायेगा।"

आनन्द घर से बाहर आये और बन्दूक लिए उस व्यक्ति को देखा। चेहरा पहचाना सा लगा। मुस्कान के साथ आनन्द ने स्वागत किया। वह भी पहचान गया। उसने ईशारा से अपने साथियों को रोका और बढ़कर आनन्द से हाथ मिलाया।"आप यहाँ कैसे?"उसने पूछा।

"यही मेरा घर है और मेरी बहन की शादी हो रही है,"आनन्द ने उत्साह से कहा,"आओ,भोजन किया जाये।"

दरअसल वह आनन्द का सहपाठी था,कभी दोनो साथ पढ़ते थे।अब जिले का सबसे बड़ा डकैतों का गिरोह बना लिया है और खुद उसका सरगना है।उसके खिलाफ हत्या और डकैती के बहुत से मामले चल रहे हैं।अक्सर शादियों में जाकर एकत्र हुई औरतों के आभूषण लूट लेता है।पहला शिकार दुल्हन होती है।विरोध होने पर हत्या भी कर देता है।

आनन्द के लगभग सारे दोस्त जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के बेटे-बेटियाँ थे।अपने जिले के लड़के-लड़कियाँ आनन्द को किसी ऐसे ही परिवार का मानते थे और आदर-सम्मान करते थे।वह भी आनन्द के प्रति अच्छा भाव रखता था।

इसीलिए शायद उसने विचार बदल दिया और अपने साथियों से कहा,"यह मेरी बहन की शादी है। चलो,भोजन करें।आनन्द सेवा में लग गया।आदर और सम्मान के साथ भोजन परोसा और सभी को काफी पिलाकर विदा किया।

पिता और मामा सहित सभी ने राहत की सांस ली।लगभग साल भी नहीं बीता, आनन्द को बहन की मृत्यु की सूचना मिली।जिसे डकैतों ने छोड़ दिया,वह घर में ही मरी मिली। ऐसे लोग शादी ही क्यों करते हैं जो अपनी पत्नी को प्रेम और सुरक्षा नहीं दे सकते?उदास मन आनन्द ने ईश्वर को याद किया।


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रेणु
15 दिसम्बर 2018

कथा अच्छीहै आदरणीय विजय जी -- पर कुछ अधूरी सी है | आनन्द के जीवन के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं , पर संस्कारी पात्र है | सादर --

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