ट्रेन यात्रा

18 दिसम्बर 2018   |  विजय कुमार तिवारी   (23 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

ट्रेन यात्रा

विजय कुमार तिवारी

(यह कहानी उन चार लड़कियों को समर्पित है जो ट्रेन में छपरा से चली थीं और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जा रही थीं।वे वहीं की छात्रायें थीं।)

"खड़े क्यों हैं,बैठ जाईये,"एक लड़की ने जगह बनाते हुए कहा।थोड़े संकोच के साथ भरत बैठ गया।"आराम से बैठिये,"उसने फिर कहा।"मैं ठीक हूँ,"भरत ने कहा और धन्यवाद दिया।

उसने देखा कि चार लड़कियाँ है।तीन उसके साथ बैठी हैं और एक सामने वाली सीट पर खिड़की के पास।भरत के साथ, खिड़की के पास बैठी लड़की को बहुत हवा लग रही थी।उसने आग्रह किया," क्या आप यहाँ आ जायेंगें?"भरत खिड़की के पास आ गया।उसने भरत को मुस्करा कर देखा और धन्यवाद कहा।सामने वाली सीट पर लड़की के बगल में धोती-कुर्ता पहने एक उम्रदराज सज्जन थे।उनके बगल में पैंट-शर्ट पहने एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति थे।किनारे पर एक युवा लड़का था।उधर साईड वाली दूसरी तरफ की सीट पर सभी युवा थे और वे सभी अपनी धून में थे।लड़कियाँ आधुनिक वेश-भूषा में थीं और अपने में खुश थीं।उनकी हँसी और खिलखिलाहट से पूरा वातावरण गूँज रहा था।

भरत शीघ्र ही इन सबसे परे अपने चिन्तन में चला गया और आज की सामाजिक स्थितियों पर विचार में खो गया।

युवा लड़के थोड़ी शरारत की मुद्रा में थे और आपस में बहुअर्थी बातें कर रहे थे। वे चाहते थे कि लड़कियाँ ध्यान दें।ऐसा हो नहीं रहा था। लड़कियों ने आपस में मिलकर अपना माहौल बना लिया था।केतली लिए एक चाय वाला लड़का पहुँचा।लड़कियाँ चाय के लिए उत्सुक हुईं,"भैया हमें चाय देना।"जब चारों के हाथ में चाय पहुँच गयी तो एक ने कहा,"एक और चाय देना।"सभी का ध्यान इस अतिरिक्त चाय पर गया।लड़की ने चाय लेकर भरत की ओर देखा,"लीजिए,आप के लिए।"

भरत अपनी चिन्तन की दुनिया से बाहर निकला और बोला,"इसकी क्या आवश्यकता थी?"लड़की ने हँस कर कहा,'लीजिए ना जल्दी,हाथ जल रहा है।"उसने तेजी से चाय भरत को पकडा दिया।लड़कियाँ हँस पड़ी और भरत झेंप गया।

लड़कों में किसी ने दबी जबान कटाक्ष किया,"हम भी तो हैं।"भरत ने लड़कों की ओर देखा।लड़कियों ने भी उस लड़के को देखा। फिर आपस में एक-दूसरे को देख कर हँस पड़ी।भरत ने बगल में बैठी लड़की से कहा,"आप लोगों को मुझे चाय नहीं देनी चाहिए थी।"

"क्यों?" एक साथ लड़कियाँ बोल पड़ी। भरत को उत्तर देते नहीं बना।वह चुप हो गया।

लड़के इस से ध्यान हटा कर राजनीति की बातें करने लगे।किसी ने कहा,"महिलायें भी अब राजनीति में आना चाहती हैं?"शायद यह उनका पसंदीदा विषय हो,पैंट-शर्ट पहने अधेड़ व्यक्ति ने कहा,"राजनीति सबके बस की बात नहीं।"

"सही कह रहे हैं आप," उनके बगल वाले लड़के ने कहा,"महिलाओं को तो दूर ही रहना चाहिए।"

लड़कियाँ आपस में एक-दूसरे को देख रही थीं और मुस्करा रही थीं।भरत भी मौन था।धोती-कुर्ता वाले सज्जन भी चुप थे।लड़के नाना तरह के तर्क दे रहे थे और उस अधेड़ व्यक्ति की हाँ में हाँ मिला रहे थे।शायद वह बहुत उत्साहित हो रहे थे,उन्होंने नारी को कमतर आँकते हुए बहुत सारी बातें कह डाली।उनकी आवाज भी तेज होती जा रही थी।भरत चुपचाप कभी उनको देखता,कभी लड़कियों को देखता और कभी उन सारे लड़कों को।लड़के उत्साहित थे और लड़कियाँ उत्तेजित।

एक लड़की ने बहुत शान्त स्वर में कहा,"बस इतना भी याद रखा करें अंकल तो आपकी समझ में आ जायेगा कि आपको एक स्त्री ने ही जन्म दिया है।"

सभी मौन हो गये।थोड़ी देर की शान्ति के बाद चोट खाये सर्प की भाँति वह व्यक्ति बड़बड़ाने लगा और नाना प्रलापों से आक्रामक हो उठा।

दूसरी लड़की ने पूछा,"अंकल आपकी कोई बेटी है?"

"हाँ है," उन्होंने उत्तर दिया।

"क्या करती है?"

"गाँव की पाठशाला से उसने पाँचवी पास की है और घर में सब काम करती है। साल-दो साल में उसकी शादी करवा दूँगा,"उन्होंने ऐसे कहा मानो बहुत बड़ी बात कह रहे हों।

लड़की हँस पड़ी,"आपने अंकल,उसे पंगु बना दिया। कम से कम और पढ़ाना चाहिए था।समाज और दुनिया तो उसे बाद में मारेगी,आपने पहले ही अधमरा कर दिया।"

दूसरी लड़की ने उसे रोका," किसे सुना रही हो? ऐसे लोग कभी समझने वाले नहीं हैं।"

पहली ने पुनः कहना शुरू किया,"शिक्षा,स्वतन्त्रता और विश्वास से हर लड़की घर-परिवार और समाज को उन्नत करती है।आज नारियाँ जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति कर रही हैं। कठिन से कठिन कामों को अंजाम दे रही हैं।"

धोती-कुर्ता वाले सज्जन ने कहना शुरु किया,"तुम जो भी कह लो,आज पतन हो गया है नारियों का। उनका पहनावा,उनके विचार,उनके विरोध,सारी वर्जनाओं को तोड़ते उनके मापदण्ड, अब बचा ही क्या है?"

लड़कियों ने हँस कर कहा,"बस इतना ही बाबा जी? इसतरह आपका सोचना सही नहीं है।समाज का उत्थान-पतन केवल नारी से नहीं होता।इसके लिए दोनो जिम्मेदार होते हैं।आप धोती-कुर्ता पहनते हो। यह आपका चुनाव है। लड़कियों को भी पहनने दो,जो वो पहनना चाहती हैं। उनके विचारों को सुनो और उनके विरोध को भी समझने की कोशिश करो।आज की नारी वही वर्जनायें तोड़ने पर उतारु हैं जो बेड़ी बनकर उन्नति में बाधक है। यह पुरुष का विरोध नहीं है।"

भरत बहुत खुश हुआ और उसने जोरदार शब्दों में कहा,"बहन,आपने बिल्कुल सही कहा।मुझे लगता है-जिस दिन पुरुष वर्ग नारी को सहयोग और सम्मान देना शुरु कर देगा, हमारा समाज उन्नतिशील हो जायेगा।स्त्री को सुरक्षा चाहिए,सहभागिता चाहिए और साथ ले चलने का हौसला चाहिए। स्त्री है तो जीवन में सरसता है,सौन्दर्य है,सुख और शान्ति है।हमने ही आदिम काल से उनके सौन्दर्य और पहनावे के मानदण्ड तय किये हैं और समय समय पर उसमें बदलाव किया है।वह वही पहनती है,वही करती है जिसमें पुरुष की मौन सहमति होती है। जिस दिन पुरुष भिन्न तरीके के पहनावे को सौन्दर्य-बोध के साथ स्वीकृति देगा,निश्चित ही बदलाव दिखने लगेगा। यह पीढ़ियों का मतभेद है।ऐसा चिन्तन आगे बढ़ने में सहायक नहीं है।इन्होंने मुझे साथ मे बैठाया और चाय भी पिलायी क्योंकि इन्हें मुझसे भय महसूस नहीं हुआ।

सभी मौन हो गये।

भिति तो तूने उठायी रात-दिन को एक करके,

आज क्यों कायल हुए हो देखकर परिणाम को।

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उदय पूना
19 दिसम्बर 2018

"शिक्षा,स्वतन्त्रता और विश्वास से हर लड़की घर-परिवार और समाज को उन्नत करती है।" शिक्षा,स्वतन्त्रता और विश्वास हर किसी को चाहिए; आपसी समझ और विश्वास चाहिए समाज में; कहानी में आज का मुद्दा उठाया है; इस तरह की चर्चा की आवश्यकता है; साधुवाद, प्रणाम

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