कहीं भाजपा का ‘‘कमल’’(भगवा) एजेंडा’’ कांग्रेस के ‘‘नाथ’’ ने चुरा तो नहीं लिया है?

22 दिसम्बर 2018   |  राजीव खण्डेलवाल   (24 बार पढ़ा जा चुका है)

मध्यप्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में ‘‘कमल’’ को अनाथ न होने देने वाले हमारे पडोसी जिले छिंदवाडा के कमलनाथ द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली गई जिसके लिये उन्हे हार्दिक बधाईयाँ, वंदन व अभिनंदन। सम्पन्न शपथ ग्रहण समारोह में वास्तव में ऐसा लगा ही नहीं कि वह किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह हैं। देश के इतिहास में जहाँ तक मुझे याद है कंाग्रेसी मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में साधू-संतो की इतनी संख्या में उपस्थिती पहली बार हुई जो कि अभी तक भगवा बिग्रेड़ की बपौती मानी जाती रही है। इस देश में अधिकांश साधू-संतो को जन्म जात रूप से विश्व हिन्दू परिषद का भाग ही माना जाता रहा हैं जो ‘‘आरएसएस’’ का प्रमुख अग्रणी सहयोगी संगठन हैं तथा भाजपा के भगवा मुद्दे को आगे बढ़ाने में मजबूती से सहयोग करता आया है।

याद कीजिए वर्ष 2003 के सुश्री उमाश्री भारती के शपथ गहण समारोह को, जहाँ न केवल उनके पूज्य.‘‘गुरू’’ मंच पर थे, बल्कि अन्य धार्मिक नेता व साधु-संत भी थे जिसे मैंने बहुत ही नजदीक से देखा था। यदि यह कहा जाए कि राजनीति में भाजपा के शपथ ग्रहण समारोह में साधू-संतो की उपस्थित सामान्य रूप से प्रचलित तौर पर अनिवार्य मानी जाती रही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने पर मीडिया द्वारा कांग्रेस को (साफ्ट) कोमल हिन्दू का प्रमाण पत्र दिया जाता रहा हैं। उसी कड़ी में यदि कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह को देखा जाये तो निश्चित रूप से ऐसा आभास होता है जैसे उक्त कार्यक्रम के द्वारा कमलनाथ ने भाजपा के भगवा विचार प्रेम की चोरी कर ली हो। कमलनाथ द्वारा शपथ ग्रहण के पूर्व मंदिर में परिवार सहित पूजा की गई जो इसी का एक भाग था। इस शपथ ग्रहण समारोह में देश का अधिकांश विपक्ष भी शामिल हुआ। शपथ ग्रहण के तत्काल बाद प्रथम आदेश के रूप में किसानों की ऋण माफी पर हस्ताक्षर कर दिए ऐसा करके वचन पत्र के सबसे महत्वपूर्ण आश्वासन की पूर्ति कर दी और कम से कम आज तो यही सिद्ध किया है कि मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ ने वांछिल शुरूवात की है,ं और प्रदेश में सामंजस्य का वातावरण बनाया हैं। यह संदेश देकर उन्होने अपने मजबूत कदम जमीन पर रखे है जिसके लिये फिलहाल वे बधाई के पात्र है।

परन्तु एट्रोसिटी एक्ट (आत्याचार अधिनियम) के विषय में उनके द्वारा (एन.ड़ी टी.वी. को दिए गए इंटरव्यू में) किसी प्रकार का रूख स्पष्ट न करना उनकी कमजोरी को ही सिद्ध करता है। हम यह उम्मीद करते है कि वे शीघ्र अपना रूख स्पष्ट करेगें व माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई न्यायिक समीझा/प्रक्रिया को पुर्नस्थापित करके कानून के राज की स्थापना करना मात्र है। वह किसी विशेष वर्ग के खिलाफ न होकर समस्त वर्गो के हित में होगा। तभी उनके व्यक्तित्व को मजबूती मिल सकेगी। एक बात और कमलनाथ जिस तरह त्वरित ठोस निर्णय अपने घोषण पत्र का जो भाग है दिये जा रहे है निश्चित रूप से यदि चली तो उपरोक्त भाजपा के कर्णधारो के माथे पर तल सिलवटंे आना अवश्यंभावी है।

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