न दैन्यं न पलायनम्

25 दिसम्बर 2018   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (44 बार पढ़ा जा चुका है)

न दैन्यं न पलायनम् - शब्द (shabd.in)

ओजस्वी और संवेदनशील कवि, महान राजनीतिज्ञ श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिवस पर उभिन की दो रचनाओं के साथ समर्पित हैं श्रद्धा सुमन – इस महान युग पुरुष को…

न दैन्यं न पलायनम्

कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है |
किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में
हम कभी रुके नहीं हैं
किसी चुनौती के सम्मुख
हम कभी झुके नहीं हैं |
आज, जब कि राष्ट्र-जीवन की
समस्त निधियाँ, दाँव पर लगी हैं,
और,
एक घनीभूत अंधेरा
हमारे जीवन के सारे आलोक को
निगल लेना चाहता है;
हमें ध्येय के लिए
जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर
मरने के संकल्प को दोहराना है
|
आग्नेय परीक्षा की इस घड़ी में
आइए, अर्जुन की तरह उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है
|
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं
|
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं
|
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है
|
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है
|
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है
|
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये
|

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