सविता

31 दिसम्बर 2018   |  जानू नागर   (106 बार पढ़ा जा चुका है)

सविता

अपने बचपन की सारी खुशीयों को अपने माँ बाप के साथ नही बाँट पाई। गाँव को समझ नही पाई, चाँद तारों की छाव में उनकी ठंडक को भाँप नही पाई, चन्द सवाल ही पूछ पाती कि चंदा मामा कितनी दूर है? गोरी कलाइयों में बंधे दूधिया तागे कमजोर पड़ गए थे| पैरो में पड़ी पाज़ेब की खनक छनक से अपने नानी नाना के दिल को मोहने लगी। ममता की गोद मे पलने वाली भोली सी सूरत माँ के आँचल में छुपने के बजाय, नानी के आँचल में अपने को महफूज पाया।

दिन गुजरते गए, रात कटती गई, उम्र में इजाफा हुआ, नाम सविता का मिला जो स्कूल के रजिस्टरों में दर्ज हुआ। उसका हसना खेलना मुहल्ले को भाने लगा था। नन्हें-नन्हें कदम गाँव की गलियों से होते हुए स्कूल की सरहद तक जाने लगे। नानी को सहारे की जरूरत थी। चारों मामाओ का पुलिस में नौकरी पाना, मामियों का उनके साथ चले जाने से घर में विरानगी छा गई, उसके हसने, रोने खेलने की आवाज से नानी-नाना का सीना खुशी से चौड़ा हो जाता। सविता समझ चुकी थी कि मुझे ही नानी के हाथों से छटती आटे की लोई को थामना है। नाना के हाथों से भारी बाल्टी थामना है। सब कुछ समझने लगी थी। अब तो स्कूल जाने वाले समय को भी समझने लगी, मुहल्ले में ढेर दोस्त बने जिसमे कुछ के नाम हैं नानकी, सरला, राधा, इत्यादि लड़के लड़कियाँ बने, तो खुब बिछड़े भी।

मुहल्ले में खड़े नीम के छ: पेड़ सब को निरोगी बनाया हुआ था| आखरी नीम के पेड़ के नीचे सविता का घर, गली जो आगे नाही जाती थी, दीवाल जो ठाकुर जी की थी। दूसरे नीम के पेड़ के नीचे सरकारी हैंड़- पाइप लगा था। ठंडे पानी का एहसास सारे मुहल्ले को देता। दोपहर के समय ठाकुर जी का दरवाजा खुलता, उस समय नल पर कोई न जाता, सिर्फ उनकी भैंसो को उनका नौकर पानी पिलाता, पानी पिलाने का तरीका भी गज़ब था। एक बड़ी बाल्टी जिसका कलर हल्का पीला था। चौड़े मुंह वाली बाल्टी को लेकर नौकर दरवाजा खोलता। मुहल्ले मे आवाज मारता जिसको अभी पानी भरना हो वो भर ले वरना भैंसे पानी पिएंगी। जिसको भरना होता भरते, मिट्टी के घर से एक आवाज आती, आप पिलाओ। बाल्टी को भरकर जानवर को लेने चले जाते। जानवरो को उनके खूँटो से खोलते और नल के पास लाकर उनके गिरवा को थाम कर रखते, भैंस अपना मुंह बाल्टी मे गड़ा देती वो पाइप के हेण्डल को चलाते पानी भैंस के माथे को छूता हुआ बाल्टी मे भरता जाता, जब बाल्टी उफान मे आ जाती तो वह अपना मुंह उठा कर कान को फड़फड़ाने लगती। भैंस की गोल भौरा सरीखे आंखो के सामने लगी बरौनी मे पानी की बूंद ठहर जाती। एक-एक करके करीब सात-आठ जानवरो को पानी पिलाते, नहलाते जब वो दूसरे जानवर को लाने जाते। उसी समय कोई न कोई अपनी बाल्टी नल के मुंह मे टांग कर पानी भर लेता।

ये रोजाना की जिंदगी मे शामिल था। एक दिन सविता स्टील का डिब्बा लेकर बीच मे पानी भरने आई थी कि अचानक वो भैंस लेकर आ गए सविता घबरा कर चिल्ला पड़ी। भैंस के बिचकन से वह और कपकपा गई। नाना ने आकार उसकी बाल्टी को थाम लिया। उस दिन से तो सारे मुहल्ले के बच्चे डरने लगे।

पहनावे मे तहमत मोटा तगड़ा बदन यूं ही खुला-खुला रहता कान मे सोने कि बाली। नाम लेने की किसी मे हिम्मत नहीं, कभी-कभी उनको इंद्रभान मामा कह कर पुकारते, उनको कभी किसी कपड़े मे नहीं देखा था। भरी बाल्टी को अंत मे यूं ही उठाकर ले जाते उनके आवा-भाव से बच्चे डरते, वो चाहते उतना ही थे। जितना डराते थे। जब भी कभी उनको मीट खाने का शोक होता तो पूरा का पूरा बकरा कटवा कर, रात तक पकाते, ये सब उनके मसाले के पकने से पता चल जाता। नीम की पत्तियाँ हवा के साथ पूरे मुहल्ले को महक से भीगो कर रख देती। लगता है आज वो मीट पका रहे है। नानी ने दो चार बकरियाँ पाल राखी थी। मुहल्ले का ऐसा कोई घर नहीं था, जिस घर मे दो चार बकरी न हो। सभी अपने-अपने स्कूल को जाते। उनमे सविता भी शामिल थी। सविता सबसे लंबी लड़की थी। उसकी लंबाई को देख कर सारे जग मामा ताना कसी करते कि नाना के यहाँ का माल खाती है। कभी लोगो के सामने वह शर्मा जाती, तो किसी के सामने ढिठाई से कहती तेरा नहीं खाती हूँ। फालतू मे क्यो देख कर जलते हो? मर जाओ, तुम भी खाओ।

एक दिन नाना नानी बाजार चले गए। सविता अकेली घर में रह गयी। यह अकेला पन नाना नानी के लिए था। आज तो मजा करने वाला दिन था। घर के हर हिस्से में जाने की आजादी। चौपाल,कोठारी बखरी, घनौची, एक बड़ा सा आगन जिसमे सारे दोस्तो के साथ छुपन छुपाई का खेल। सभी कही न कही दुपक-छुपक के बैठ जाते। सविता के अंदर एक डर था। कहते हैं न “बचपन हर दम से बेगाना होता हैं” जी भरके खेला। खेल ठीक-ठाक चला, शाम होते होते किसी ने नानी की नामक वाली मिट्टी की मटकी को तोड़ दिया। उसने सबसे पूछा किसी ने हाँ में जवाब नही दिया। अब उसने हर जुर्म को अपने सर मढ़ लिया। सबको गोला में खड़ा करके इस बात को नानी से न बताने का प्रस्ताव सबके सामने रखा। सबने कसम खाया विद्या रानी की। कोई भी नानी से नही बतायेगा। शाम ढलते-ढलते सभी तितर बितर हो गए। सविता के नाना नानी का आगमन हो गया। सविता ने सारे घर को झाड़ू से बहारा। बकरियों को खाने के लिए पीपल की टहनी में लगे पत्तों को सामने डाल दिया। डर से उसने सब कम किया जिसे वह कभी नही करती थी।

बाजार से नानी उसके लिए एक अच्छी सी फ़्रांक के साथ खाने के लिए समोसा लाई। सविता मजे से अपनी चारपाई में बैठ, पैर हिला-हिला कर समोसे खा रही थी। नाना गेहूँ पीसने के लिए चक्की चले गए। नानी शीक से बने पंखे को हाथो में पकड़ झोका पर झोका मार रही थी। नानी लंबी-तगड़ी आंखो मे लगाने वाला चश्मा, चश्मा मिट्टी से बने मोकवा मे रखा था। बच्चे अब दिन कि हरकत को भूलने वाले कहाँ थे। एक-एक करके आते उसके कान मे खुसर-फुसर दुआ जैसे पढ़ कर भाग जाते नानी ये सब काफी देर से सोच, देख रही थी। उनको थोड़ा-थोड़ा शक हो रहा था। पर वह समझ नहीं पा रही थी कि हुआ क्या है? सबके खुसरफुसर से वो तंग आ गई। अब तक नाना आटा की गठरी लाते हुए दिखे वो चार पाई से उठ कर दोड़ लगते हुए नाना के सिर का भर अपने सिर पर रख लिया। इतना भर सहने लायक बन चुकी थी। वो गठरी को लेकर बरामदे से होते हुए बखरी की तरफ गई। दूबरा वापस आकार चार पाई पर बैठ गई। दोस्तों के आना-जाने, काना फूसी करने का सिलसिला अभी थमा नहीं था। अंत मे नानी पंखे की बेटी से उसकी पीठ पर चपकाते हुए बोली, जब से आई हूँ, यही देख रही हूँ क्या है?

नानी का गुस्सा बिलकुल साफ, आवाज़ा मे परिवर्तन साफ झलक रहा था। कहे री क्या बात है? बता क्या किया है तूने? नाना भी बोल पड़े बता क्या हुआ? सविता सबको कोसती हुई अपने माथे सारा इल्जाम ले लिया। ज्यादा देर तक बता नहीं पचा पाई, नमक वाली कुठली मुझसे झाड़ू लगाते समय फुट गई है। नानी, नाना का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ। नाना चल फुट जाने दे सविता को थोड़ी चैन की सास मिली पर साथियो पर गुस्सा थी। पंखे की डंडे की मार जो पा गई थी।

बचपन की बात याद किसको रहती? सोने मे ही रात कट गई। नई सुबह नया उमंग सबकुछ बदला-बदला नानी पत्थर के सिलबट्टे पर रात के फुले गेंहू को हलवा बनाने के लिए पीस रही थी। नाना कुछ ज्यादा कमजोर जितना कि नानी हष्ट-पुष्ट, गेंहू का हलुवा दूध में पकाती, सविता भी मजे मे खाती, खाने के बाद अपनी लंबाई का फाइदा उठाते हुए स्कूली ड्रेस पहन कर एक छोटा सा झोला दीवार में गड़ी खूटी से ऊतरती, जिसमे चाक का बना बुरखा, शीशी मे भरा होता। सरपत की कलम जिसको चाँक के बने बोरखे में डुबो करके काली पाटी में लिखती। जब भर जाती तो लौकी के हरे चौड़े पत्तों को तोड़ कर पाटी को साफ करती। साफ करने के बाद काँच की शीशी से पाटी को रगड़ते हुए कहते सुख-सुख पट्टी चन्दन घोट्टी कहते हुए अनगिनत बार रगड़ कर पाटी को चमका देते। बोरखे व सरपत की कलम से अ से ज्ञ तक 2से 10 तक पहाड़ा लिखना लाज़मी था। गुरु जी को दिखने के बाद पाटी को ज्यो का त्यो बना के घर पहुँचते तो नानी हमेशा पूछती स्कूल में कुछ पढ़ती भी हैं?

सविता के काम व शारीरिक अंग में इजाफ़ा आने लगा था। ड्रेस मे परिवर्तन काली पाटी का छूटना, कापी किताबों का बोझ बढ़ाने लगा था। बच्चों से दोस्ती कम करने लगी थी। मोहल्ले की औरतों की तरफ ध्यान ज्यादा बटने लगा। काम की दुनियाँ में खोई रहने लगी। हार खेत को जाने लगी। एक मौसम की याद आती हैं। आषाढ़ का महिना, वर्षा का आगमन हो गया। वह खेत से घास के गट्ठर को सर में रख कर पतली-पतली मेड़ में संभालती हुई चलती, फिर भी उसका पूरा का पूरा शरीर मेड़ से खेत में चला जाता इस तरह चढ़ते-उतरते नाले के ऊपर चढ़ आई थी। काले घने बादल बौछार के साथ जमीन में बिखरने लगे। उसका शरीर तो नही भींग रहा था। सर पर रखी घास की गठरी का वजन बढ़ता जा रहा था।उसकी लंबी मुलायम गर्दन लचकती जा रही थी।

घर आते-आते सास फूल आई थी।बरामंदे मे गठरी को फेक कर वही कोने में चुप शांत बैठ गई। आज मुस्कान गायब थी, चेहरे में गुस्सा झलक रहा था। हाथ में हासिया लेकर अपने आप को कोस रही थी। ममता की छांव को भूल कर ननिहाल की छांव में पल रही हूँ। सौ सुख को याद कर इस एक दुख को भूल गई। नल से नहाना छोड़ पर्दे के पीछे घनौची में नहाने लगी थी। घनौची-घनौची नही एक कमरा ही था जिसके चरो ओर ऊँची पट बनी थी जिसमे बाल्टी कलसे गगरों में पाने भरा रखा रहता था। पर्दे में नहाना साफ जाहीर क़र रहा था कि बढ़ती उम्र के साथ उभरते अंगो की समझ उसमे कूट-कूट कर समा रही थी।

गाँव के दूसरे छोर में बना कन्या-पाठशाला जिसमे में पढ़ने जाने लगी थी। पढ़ने में ध्यान देने लगी थी। उसकी लम्बाई उसे और ही कही ले जाने के लिए तैयार थी। स्कूल मे पंद्रह अगस्त का पर्व आया जिसमे उसने एक राष्ट्री गीत को गाने के लिए हिस्सा लिया। जिसमे उसको अगले दिन फूल ड्रेस में स्कूल जाना था। स्कूल पढ़ने का यह आखरी साल था, स्कूल अठवी तक ही था। कल उसे जूते भी पहना कर जाना था। उसके पास सारी ड्रेस थी कमी थी तो सिर्फ सफ़ेद जूतो की। सो उसने अपनी मौसी से मामा वाले सफ़ेद जूतो की मांग कर दी। मौसी ने मामा के पुराने जूते निकाल कर अगन में पटक दिया। ये ले कल चली जाना पहन कर। सविता ने जूतो को अपने पैरो मे डालकर देखा अगन में चलकर उछल कर जैसे उसने नया जूता किसी दुकान से लिया हो। समझ गई की यह जूता मेरे लायक हैं। ठीक हैं मौसी इनको साफ करके पहन लेती हू कल वापस कर दूँगी। मामा से बता देना। सुबह वह पूरी सफ़ेद ड्रेस में, बालो से बनी चुटियाँ में सफ़ेद रिबन लगे थे। स्कूली बैग पीठ में नही, अकेली नही, सारी सहेलियों के बीच में। बहुत दिनो बाद उसको सहेलियों के साथ उछलते ऊचकते देखा था।

दोपहर के एक बजने वाले थे, तब मुबाईल या घड़ी का प्रचलन इतना नही था। प्रचलन था तो सिर्फ एक अंदाजे का, नीम के पेड़ो की परछाई जो पलट चुकी थी। घर में पड़े छप्परों की हल्की-हल्की रेखा नुमा काली छाया धूप में बन जाती थी। कागज का लिफाफा लिए हुए उस घर की तरफ गई जिधर से सफेद जूतो को मांगा था। लिफाफे में दाग के साथ दो लड्डू ले रखा था। मौसी ने एक लड्डू खाया दूसरा लड्डू नानी के पास ले जाने के लिए कहा। उसने जूतो को चारपाई में बैठ कर ऊतार लिया था। जुरबों को अपने कुर्ते की थैली में रख लिया। पैर तो बिलकुल सफेदी पिए हुए थे। नंगे पैरो के बल उठ कर अपने घर की चौपाल मे गई, एडी के बल खड़े होते हुए मोटे बड़े दरवाजे की सिकरी को खोला। सीकरी ने इतना तो इशारा कर दिया था कि नाना नानी घर में नही हैं। बकरी के गेरवा खुले हुए खूटे के पास पड़े थे। जो बकरी के गले में फसे रहते थे।

वह चौपाल के बगल में बने कमरे में कपड़े बदलने गई। कमरा बहुत छोटा खुब-शूरत था। इसी कमरे में चरों ममियों ने अपना कुछ-कुछ वक्त गुजर कर मामाओ का साथ पाया था। कोई खास मेहमान आता उसी कमरे का होकर रह जाता। खासतौर पर वह कमरा महिलाओं के लिए। दरवाजे का रंग कोयले से भी काला अंदर प्लास्टिक के गुलदस्ते, एक बड़ा लंबा सोफा, एक लम्बा बेड या पलंग इतना जहन मे साफ नही गद्दा जो हमेशा बिछा रहता था। मटमैली चुनरी हल्का कत्थई रंग का सलवार कुर्ता पहन कर हाथों में सीक की झाड़ू थामे हुए निकली। झाड़ू को चौपाल में फैक कर आगन को पार करके बखरी से तेल नमक लगी रोटी को दाँतो से कटती अपने मौसी के लड़के को दिया। जो कभी भी उसका पीछा नही छोडता था। बस सोने से पहले अपने घर भाग जाता उसकी रात किस तरह से कटती। उसको कहाँ इतना याद रहता होगा दिन की थकान से।

कई सालो बाद पड़ोस के घर में खुशी का महोल था।दोस्तो में सबसे बड़ी दोस्त थी। सुधा ने कई दिनो से नल में पानी लेने आना बन्द कर दिया था।यहाँ तक उसके नहाने के लिए पानी भरने और ही कोई आता था। दोपहर के वक्त वो पीला शूट पहने हाथ में मेहंदी रची, कलाई में बंधा हल्दी से साना पीला कपड़ा जिसमे एक गाठ बनी हुई थी। चेहरे में एक पीला पन छाया हुआ था। आंखे शर्म से झुक-झुकी। सुधा की बारात आने की तैयारी चल रही थी। सारे पड़ोस को पता था कि सुधा की बारात दो दिन रुकेगी।पहले दिन पक्का खाना खिलाया जाएगा। दूसरे दिन कच्चा खाना खिलाया जाएगा। बारात, बैलगाड़ी से आयेगी। इन सारी बातो को सुनकर सविता की पूरी टोली बारात देखने का पूरा-पूरा प्लान बना लिया था। गैर बिरदरी की बारात होने की वजह से घर से आज्ञा नही थी। जिस दिन बारात को आना था उस दिन सबने छत में सोने का प्लान बनाया। बाहर की तरफ घर वाले सोते रहेंगे। पूरी तैयारी के साथ शाम से छत पे बिस्तर लग गए। शाम अंधेरे में घिरने लगी दूर की चीजें धुंधली होने लगी। मानो बुढ़ापे वाली आंखे हो। किसी ने कहा हमे पता कैसे लगेगा की बारात आ गई हैं? अरे पते की क्या बात हैं। रवाइस जब छूटेगी गोले में बहुत आवाज होती हैं। खुद पता चल जाएगा।

एक गोले की आवाज आई सबको पता चल गया। लेकिन घर वालों के डर से सिर्फ सोने एक बहाना था। आज सविता की मौसी का लड़का भी था।जो सोते सामय अलग हो जाया करता था। सभी चुप-चाप पीछे वाले जीने से एक-एक उतर कर जनवाशे पहुँच गए। जहां पर बारात ने अपना पड़ाव डाला हुआ था। सारे बाराती स्कूल मे पड़ी चारपाईओ पर आराम फर्मा रहें थे। ये चारपायी गाँव के घरो से आई थी । स्कूल के पीछे पंद्रह बैल गाडियाँ खड़ी थी। पंद्रह बैल गाड़ियो को लाने वाले तीस बैल हरा चारा खाने मे लगे थे। बाकी के बाराती नास्ता पानी करने मे लगे पड़े थे। दूल्हा झूलनी पहने हुए था, उनकी बिरादरी का प्रमुख पहनावा माना जाता था। स्कूल के एक कमरे मे आराम फरमा रहा था। तैयारी चल रही थी। बाजे मे बाजा व दहकी आया था। जिसको पूरा ग्रुप सुनने मे मस्त था। सब बे खबर हो गए कि हम सब घर वालों की चोरी से आए हैं। बारात निकासी के लिए निकल पड़ी सभी लोग बारतीयों के साथ न होकर मन भाने वाला बाजा उसके आगे पीछे। बारात सुधा के घर के समने पहुँचने वाली थी कि सविता के मौसी ने ताक लिया। मौसी को देख कर सबके हलक का पानी सुख ही गया। सविता अपने मौसी के लड़के से कहा भाग तेरी मम्मी ने देख लिया है। सब भागे पीछे की तरफ, डर की वजह से वह भागा अपने बाबा की तरफ। कहाँ जवानी की दौड़, कहाँ बचपन के लड़खड़ाते कदम कितना रफ्तार पकड़ते। वह पकड़ा गया बारात की सारी खुशी उसके लिए एक याद बन गयी। नीम के गोजा से मुलायम कोमल शरीर पर वार पर वार चिल्लता मांफी मांगता, अब कभी बारात नहीं जाऊंगा। खंडहर वाले घर का दरवाजा बंद कर पीट रहा था। उसे कोई बचाने वाले नहीं बाबा की दहकती आवाज को सुनके मौसी ने दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही वह बाबा से जा लिपटा।

बाबा क्यो बच्चे कि जान लाने में लगी हो? वैसे ही इसके हाड़ –हाड दिख रहे हैं। पिछली वाली बारात मे कुलिन्दी के लड़के को गोली का छर्रा लग गया था। इस बात को सुनकर बाबा उसको गोद मे उठाकर घर कि तरफ ले गए। उधर सविता का सारा ग्रुप डरा हुया था। सबके घर मे मार के आसार झलक रहे थे। उसकी पीठ पर गोजे कि छाप, छप गयी थी। सब जहा के तहा सो गए।

रात गयी बात गयी छुट्टी का दिन था। सुधा के घर पर दूल्हे का शाम वाली झूलनी को पहनकर दहकी बीन कि धुन के साथ आना जाना लगा था। शाम पक्की खाया था। कच्ची का निमंत्रण, बैल खेत के समीप बसींम खा रहे थे। दूल्हे वाली बैल गाड़ी बहुत अच्छे ढंग से सजी थी। जिस तरह पहले पछउवा लोहार अपना पिनस रब्बा सजा कर रखते थे। अगली सुबह उसकी बिदाई उसी बैल गाड़ी से हुई। बैल गड़ी घसीटने वाले भरी भरकम बैल जिनके गले मे चौरासी, पैरो मे घुंघरू की छनक उनके हर कदम मे उनका साथ दे रहे थे।

एक की कमी महसूस होने लगी थी। उसका कभी आना कभी जाना लगा रहा। सविता के ग्रुप मे लड़कियां ज्यादा थी जो अपनी उम्र और कद के अनुसार बारात बुलाती, बिदा हो जाती। सब मे अच्छा बुरा अपना पराया की समझ कूट-कूट कर भर रही थी साथी बिछड़ने लगे। प्यार प्रेम कम होने लगा, सविता भी खूब मस्त दिखती। 8वी पास करने के बाद एक साल का वक्त घर गुजारा अब तो उसको देखने-सुनने वाले आने लगे। जिसको वो मौसी बोलती थी असल मे वो उसकी मामी थी रिस्ता थोड़ा टेड़ा था। सविता की नानी वाला रिस्ता इस वजह से मौसी कहती लेकिन गाँव के रिस्ते से मामी लगती। सविता की अदा-कदा, उसकी सुंदरता व लंबाई पर मामी फिदा थी। तभी तो वो अपने मईके से रिस्ता लाई थी। अब तक 15 की पूरी 16वी मे लगने वाली थी। शरीर की बनावट से खूब जवान दिखती थी। कहते भी है अगर बेटी की उम्र कितनी भी कम हो, शरीर पूरी तरह उभर कर दिखने लगे तो उसे उसके घर भेज देना चाहिए। न जाने क्यों ये धारणा उन लड़कियो को कोसती रहती, सारे अनुभव तो अभी लिया नहीं, ये नई आफत कहां से जन्म ले लेती है? इस पर कोई क्यों नहीं आपत्ति उठाता? एक हाँ कर दे तो सबके मुंह से हाँ-हाँ निकलती है। सविता मे बदलाव दिखता वह मासूम, खोई-खोई दिखती वो सबसे शर्माती दोपहर के वक्त जब सारे दोस्तो को टाइम मिलता। सारे दोस्त एक जगह जमा होकर मजे लेते। अब यह दुल्हन बन कर कहीं जाएगी? लड़का सुंदर व मस्त मिलेगा। मामी जो इतना दावा करती है। सविता आज-कल अपनी मामी के आस-पास दिखती बांकी सबको तो छोटा व बच्चा मानने लगी थी।

सविता के ननिहाल से 140 किलो मीटर दूर रिस्ता पक्का हो गया। अब सभी कहते बच्ची की उम्र क्या है? अभी दुनिया को देखने की समझ को बनाया था। कुछ बाल विवाह जैसा था। खेलने खाने के शिवा अपने को समझने का समय आया तो उसके जीवन मे सरल और भरी बोझ बहुत आहिस्ता से शादी का रख दिया। कहती भी किस्से, जब अपना कोई नहीं। कुछ महीने बाद दुल्हन बनने की कगार पर आ चुकी थी। नानी-नाना, मामी-मामा, मम्मी-पापा, उनके छोटे भाई बहन जिनकी चहल-पहल। सविता से मिलने का मौका कम मिलता। नानी का घर चुना व मिट्टी से पोता गया। कागज की पंखुड़ियों से सजाया गया। सविता अपनी कम उम्र को कोसती, सोचती, डरती कि इस कमसम उम्र मे दुल्हन बन रही हूँ। आंखो मे आँसू फूट पड़ते, बड़े बुजुर्ग समझाते कि बेटी तो पराया धन है, जितनी जल्दी अपने घर जाए उतनी अच्छी बात। सविता कहने लगी इनती कम उम्र मे भी बेटी को दूसरे के घर नहीं जाना चाहिए। उसकी सुनता कौन? प्रोत्साहित तो सभी करते कि तुमको तुम्हारा जीवन साथी मिल रहा है। उसको पहचानो उसकी कदर करो दुनिया मे कोई है तो पति, तुम्हें मरते दम तक साथ देगा। जाने क्या-क्या बाली उम्र को बता डाला? जिन शब्दो से अंजान थी उसको भी जान बुझ कर थोप दिया।

गर्मी की तपन से सारे नाते रिस्तेदार अन्य बिरादरी वाले घरो मे जमावड़ा रखते। बाग-बगीचो मे घूमना नीम के पेड़ के नीचे लगे नल पर नहाना, ढोलक की थाप का पूरे मोहल्ले मे गूंजने लगे। सहेलियों का आना-जाना जो अभी खुद बहुत कुछ समझने की कोशिश करती। न समझ उम्र मे सोचती भी क्या? सिर्फ दुआ के। ऊपर वाला क्या अजीब जीवन रचता है? शाम फिर आई, बिजली की रोशनी से अनछुआ गाँव अंधेरे मे घिरने लगा। किसी के घर दीपक का प्रकाश तो किसी के घर लैम्प व लालटेन का प्रकाश। सविता के घर होंडा जल रहा जो बड़ी लालटेन की तरह जिसका मेंटल जलता है। जिसमे बिजली की तरह सफ़ेद रोशनी नीम के पत्तों से बाते कर रही थी। उनके मामा अब हर ब्यवस्था को देखने मे मसरूफ़ थे। सविता अपने नमकीन आँसुओ से अपने सूखे होठो को सींच लेती। एक होंडा घर पर दूसरा होंडा जहां पर बारात को आ कर ठहरना था। सविता के सारे दोस्त जनवासे का मुआइना कर रहे थे, जल रहे मेंटल की रोशनी पीपल और बरगद के पेड़ पर छाई थी। ये सब गाँव के सरकारी स्कूल मे था। कुछ देर बाद एक ट्रक आकार रुका जिसमे 50 से 100 आदमियों का जमावड़ा था। मामा जी उसके पास जाकर सबको बैठने के लिए कहा, पानी सरबत बटने लगा भीड़ का महोल बन गया था।

ट्रक के आगे वाले हिस्से की लाल लाइट जल रही थी, जिसमे गोल मटोल लंबा तगड़ा गोरा सा लड़का चमकीली टोपी लगाए बैठा था। जिसको गाँव की भाषा मे मौर बलते है। उस चमकीले मौर की वजह से दूल्हा को पहचानना मुसकिल नहीं था। सविता के दोस्तो ने खबर दिया वास्तव मे लड़का तो बड़ा बढ़िया है। अनसुईया ने कहा कि मेरी बहन मे क्या कमी है? उससे लंबी ही होगी दूसरी ने कहा कि ये अपनी लंबाई से क्या-क्या करेगी? अरे इसकी लंबाई ने ही तो इसे इस बंधन मे बांध दिया। बचकाने अंदाज मे सविता ने कहा हाँ री तू सच कह रही है। मेरा नाना मानता ही नहीं वो तो बस एक ही रट लगा रखा है, बहन बेटी जिनती जल्दी अपने घर जाए उतना अच्छा है। इस बेरूखे घर से अच्छा हैं। कम से कम अपना घर तो होगा।

गोले की आवाज पूरे गाँव मे छा गई जिसको पता नहीं था उसको भी पता चल गया कि गाँव की किसी बेटी की बारात आई है। गाँव बहुत बड़ा था, गाजे-बजे के साथ बारात दरवाजे चढ़ आई। सारे मोहल्ले की आँख तांक-झांक मे लगी थी दूल्हा को देखने के लिए। दोस्तो ने न जाने किस-किस खिशियों का प्लान बनाया हुआ था? गाजे-बजे की धुन मे नाचने वाले अपनी-अपनी धुन मे खोए हुए थे। पंगत फट्टे पर बैठ चुकी थी खिलने वाले खिला रहे था खाने वाले ख रहे थे। दूल्हे के साथी उसक आगे-पीछे घूम रहे थे। भानू के नन्हें-नन्हें कदम थक कर सो गए।

रात मे और क्या-क्या हुआ क्या पता? बेखबर ऊपर छत पर सोता रहा सुबह बाजे की तड़ाम-धड़ाम को सुनकर जगा तो देखा कि सविता पीली साड़ी के साथ आँगन की तरफ जा रही थी। आधे घंटे बाद लाल साड़ी के घूँघट से झाँकता हुआ उसका लंबा चेहरा, काफी सुंदर लग रहा था। सविता दोस्त नहीं बहन नहीं भाभी लग रही थी। सविता का ब्याह भानू के ननिहाल मे जो हुआ था। दुल्हन अब बिदाई चरम सीमा पर थी। दरवाजे की सामने वाली दीवार पर लिखा था सविता संग देव नारायण, देव नारायण को सभी प्यार से देवा कहते थे। बिदाइ कुछ अंछुई सी रह गई। घर सुने पन को जीने लगा। सारे नाते रिस्तेदार अपने-अपने काम, नौकरी पेसे की तरफ चले गए। नानी का आँगन सुना-सुना नानी नाना का हाथ बटाने उसकी बहन अजीता आ गई।

कई सालो तक सविता की आवाज, सूरत दोनों गायब हो गई, रह गई थी तो कुछ यादे। जो वो बांटा करती थी। इतना ही नहीं वो इस गाँव के प्यार को भुला बैठी थी। नए जीवन को अपने पति के साथ जीने लगी, जहां पर उसको नया परिवार मिला था। पति का बड़ा भाई, भाई के बीबी बच्चों के साथ उनके पिता जी भी थे। भानू से ये रिस्ते छुपे हुए नहीं थे, भानू का नानीहाल, सविता का ससुराल एक था। सविता अब पर्दे मे रहती किसी से ज्यादा बात नहीं करती। ये सब भानू ने देखा था। जब वो अपनी नानी के गाँव मे गया था। सविता के ससुर थोड़ा सर्र्बर्र बकने वाले थे। आस-पड़ोस के सारे लोग उन्हे पागल की उपाधि दे रखा था। सास के प्यार से अंजान सविता अपने ससुर का बड़ा ख्याल रखती। भाई-भाभी कानपुर मे जाकर रहने लगे। बचा तो सविता का अपना परिवार पति, ससुर, खुद स्वयं।

पति का खेतो मे काम करना सविता के मन को भाया नहीं वो उन्हे शहर की तरफ जाने के लिए प्रेरित करती रहती। अभी हम दो है, कल को हमारी संताने होंगी। क्या वो भी, हम दोनों को मजदूर की हालत मे देखेंगे? देवा को समझ आया वो बहुत ही सूझ-बुझ के साथ हर काम को करता था। अगर सविता बीस भर सोचती तो वो इक्कीस भर जरूर सोचता। देवा अपने परिवार की परिभाषा को समझ चुका था। कानपुर के पास रनिया मे पेंट की फेक्टरी पर काम करने लगा। रोज सुबह साईकिल से फेक्टरी जाता और उसी से शाम को वापिस गाँव आता। दिन यूं ही गुजरते गए कभी खेतो मे जाकर फसल काटते तो कहीं बगीचे से सुखी लकड़ी तोड़ कर लाते। जिससे शाम का खाना पक पाता। वक्त का मारा इंसान जख्मी होने से कहीं ज्यादा तड़पता है।

रोजाना साईकिल चलाकर आने जाने से उनका हाइड्रोसील बढ़ गया, जिससे उसका ऑपरेशन करवाना पड़ा। पेंट वाला काम भी छुट गया। एक महीने की छुट्टी के दौरान उनकी फैक्ट्री मे पक्की कारण का काम हुआ जिसकी वजह से देवा का नाम पीछे वाली लिस्ट पर चला गया और परमानेंट होते-होते रह गया। वक्त का पाशा पलट जाना, बीमारी मे देवा का घिर जाना, पहले जैसे मोड मे लाकर खड़ा कर दिया। मन उदास-उदास, उस शहर, गाँव से दिल ऊब आया। यही समझो अब कहीं बाहर की तरफ मन खिचने लगा। चंद दिनो मे वो घर की तंगी हालत की परिभाषा को समझ लिया। बड़ा भाई जो पेशे से एक दुकानदार जो नई पुरानी साईकिल की मरम्मत करते भाई देवा से भी लंबा, तगड़ा। उनके चेहरे पर मुस्कान का बना रहना, चेहरा चौड़ा, होठ मोटे-मोटे, दांत मे पीला पन दाँतो का पीला पन होना। नशा करने की वजह नहीं नही, बीमारी का कारण गाँव के पानी मे ही कुछ ऐसा था। दांत खराब होना अच्छे खाँसे चेहरे पर एक फीके पन का सवाल छोड़ देता।

ससुर का सर्र्बर्र बकना, उनको देख कर बच्चो का डर जाना, वो घर पर बहुत कम रहते सुबह से तहमत की झोली बना कर, पानी से भरा कमंडल लेकर दूसरे गाँव की तरफ निकाल जाते। उनका गाना गाने का तरीका अलग जिसमे मानवी प्रवृती शामिल होती। हाँ अगर वो किसी के द्वार पर अड़ जाते तो समझो कुछ न कुछ झोली मे आए बिना टलते नहीं। सुबह से शाम तक जितना कमाते घर ले आते, सविता को झोली थमा देते। सविता किलस जाती की पाता नहीं क्या-क्या लेकर आ जाते है? हालात बिखरे होने की वजह से वह झोली उनका परिवार चलाने का काम करती। उनका किसी से बाते करना अंड-संड बकना उनकी फितरत मे था। पहनावे मे एक गंदा कुर्ता, मटमैला तहमत सविता जिस दिन देखती कि आज उनका दिमाग सही है तो हिम्मत जुटाते हुए उनके कपड़े धो देती, नहला देती। बालो मे सफेदी आ चुकी थी। सास का बचपन मे गुजरना देवा व बड़े भाई को अपने पैरो से खड़ा होना सीखा दिया था।बाप का बैरागी की तरह व्यवहार देख कर दोनों भाइयो ने अपने हिसाब से पढ़ाई किया।

जीवन जीने के लिए पेट को मजबूत होना भी लाज़मी है, उन्होने जिस दिन से होश संभाला उस दिन से दूसरों की मजदूरी करना सीख लिया था। किसी भी तरह का काम हो काम को कर लेना उनके नसीब मे जैसे लिख कर ऊपर वाले ने पैदा किया हो। देवा का रंग साफ चेहरा काफी लुभावना था, देवा का काम पर जाना कुछ न कुछ कमा कर लाना। सविता का इतना वक्त गुजर चूका था कि वो दो बच्चो की माँ बन चुकी थी। जब भी वो माँ बनने वाली होती तो सास व जेठानी की जगह उसकी नानी साथ होती। हर सुख-दुख को बहुत शालीनता के साथ अपने जीवन में ऊतार लेती। कदमो से आगे चलती जिंदगी मे बहुत कुछ छूट चुका था।

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