बात और थोड़े दिन की।

31 दिसम्बर 2018   |  जानू नागर   (49 बार पढ़ा जा चुका है)

बात और थोड़े दिन की।

चुरा लो और क्या चुराओगे?
पूछेगीं नज़रे,तो क्या बताओगे?
जुबान चुप होगी, होठ सिल जाएंगे।
मयते कब्र मे दफ़न हो जाएंगी।
अब वक्त शुरू हुआ हैं, विलय का।
बैंक ही नहीं सबकुछ विलय हो जाएगा।
चलता रहा यू ही कारवां, आने वाली पीढ़ियाँ भी विलय हो जाएंगी।
खोजते रहना जाति, धर्म, जब इंसानियत ही विलय हो जाएगी।
आसमान का टूटा तारा भी जमी मे आ जाता हैं।
हम सब तो पहले से जमी मे जमे हैं और उसी मे जमते जाएंगे।
तब न दफ़न होगी मइयते कब्र मे न जलेंगी समशान मे।
न होगा नशीब कफन का, बस साया होगा आसमान का

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