"छड़, व्यवस्था और छत"

01 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (103 बार पढ़ा जा चुका है)

"छड़, मकान और छत"


ठिठुर रहा है देश, ठिठुर रहें हैं खेत, ठंड की चपेट में पशु-पंछी, नदी, तालाब और अब महासागर भी जमने लगे हैं अपने खारे पानी को उछालते हुए, लहरों को समेटते हुए। शायद यही कुदरत की शक्ति है जिसे इंसान मानता तो है पर गाँठता नहीं। आज वह बौना बना हुआ है और काँप रहा है अपनी अकड़ लिए पर झुकने को तैयार नहीं। भूल गया विनाशकारी बाढ़, अगन बरसाती गर्मी के पारे को। अब लगता है उसकी घिग्घी बंध गई है, किसानों का कर्ज माफ और बाजार से यूरिया गायब। खेत पीले हो रहे हैं, फसल सोच रही है काश, हम भी वोट देने का अधिकार पा जाते तो आज चुटकी भर खाद के लिए न तरसना पड़ता वगैरह!

एक बार झिनकू भैया के साथ में भी लोहे की दुकान पर उन्हीं के मकान के लिए छड़ खरीदने गया तो दुकानदार ने शेयर मार्केट की सेठ की तरह बोला कि आज का भाव 4900 रुपया प्रति कुंटल का है। सुनकर झिनकू भैया तमतमा गए बोले हमें मूर्ख समझ रहे हो, मालिक बाबू के वहाँ 4700 का भाव है। दुकानदार नरम पड़ा। लगा कि झिनकू भैया की विजय हो गई चोरी पकड़ लिये, पर पासा उलटा पड़ गया, दुकानदार बोला तो वहीं से ले लीजिए, वजन में 20 किलो कम करने में कोई दिक्कत नहीं होती पर मैं अपने ईमान को गिराकर धंधा नहीं करता। झिनकू भैया असमंजस में पड़ गए और बगले झाँकने लगे। उनकी दशा मुझसे देखी न गई तो मैंने दुकानदार को हँसते हुए कहा भाई आप तो ईमानदारी का एक बोर्ड लगा लो और ईमान बेचते रहो, वैसे भी सामान की लूटपाट से दुनियां त्रस्त है। नेता, अभिनेता, खास और आम आदमी भी आज बड़का ईमानदार और चरित्रवान बना हुआ है पर बलात्कार, चोरी, हत्या, आतंकबाद, सरकार की उठापटक न जाने कौन कर रहा है। राक्षस कुल को राम और कृष्ण समाप्त ही कर दिया था, उसका अब नामोनिशान भी नहीं है किसी को भी भूल से कह दो कि भाई आदमी की तरह रहो, सड़क पर थूकना मना है, गाली देना पाप, पराई स्त्रियों पर कुदृष्टि अपराध है इत्यादि तो वह अपना आपा खोकर ऐसा मिसाइल दागेगा कि पुलिस तो क्या , सी.बी.आई भी उसका सुराग नहीं लगा पाएगी कि इस मिसाइल की खरीदी किसने की थी और कैसे की थी। और तो और बिचारे उस नेक आदमी की अर्थी निकलते-निकलते कई साल लग जाएंगे और परिवार खुशकिस्मत रहा तो अस्तियाँ ही विसर्जित कर पायेगा।

दो कमरे की छत लगाने में इतनी दिक्कत है न जाने बहुमंजिली इमारतें कैसे खड़ी हो जाती है। दुकानदार सन्न हो गया और कुर्सी आगे किया कि आप बैठिए एक कप चाय पी लीजिए, सामान अब यहीं से जाएगा और मिनिमम मुनाफा लेकर मैं आप को आश्वस्त करने का भरसक प्रयास करूँगा, मैंने झिनकू भैया से कहा , पेमेंट कर दीजिए। अब और कहीं जाने की जरूरत नहीं है, मकान बनवाएं और उसमें सुख से रहें।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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