नववर्ष :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (61 बार पढ़ा जा चुका है)

नववर्ष :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जब से सृष्टि का सृजन हुआ तब से लेकर आज तक सनातन धर्म के छांव तले सृष्टि चलायमान हुई | परिवर्तन सृष्टि का नियम है | जो कल था वह आज नहीं है जो आज है वह कल नहीं रहेगा , दिन बदलते जाते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है जिसे मनुष्य वर्ष का पहला दिन मानकर नववर्ष मनाने में लग जाता है | विचारणीय विषय है कि हम सनातन धर्मी "नववर्ष" कब मनायें ? आदिकाल से इस धरा धाम पर सनातन धर्म का अस्तित्व रहा है | सनातन धर्मावलंबी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नव वर्ष मनाते हैं | क्योंकि इस दिन ही सृष्टि का सृजन हुआ और यह सृष्टि का पहला दिन माना जाता है | इसके साथ ही जैसे-जैसे इस धरा धाम पर अन्य धर्मों का उद्भव हुआ उसी प्रकार सबके "नववर्ष" भी अलग अलग हो गये | कलियुग में सनातन धर्म के मानने वाले विक्रम संवतसर को अपना सम्वत मानते हुए इसके प्रारम्भ पर ही नववर्ष मनाते हैं | अन्य नववर्ष भी मनाये जाते हैं | जैसे सम्राट कनिष्क ने शक संवत प्रारंभ किया | बौद्ध धर्म के मानने वाले बुद्ध पूर्णिमा अर्थात १७ अप्रैल को "नववर्ष" मनाते हैं | ईसाई संवत्सर १ जनवरी से प्रारंभ माना जाता है | जबकि प्राचीनकाल में ईसाई सम्वत भी चैत्र माह (अप्रैल माह) से प्रारंभ होता था परंतु सनातन विरोधियों ने इसे जनवरी से कर दिया , जबकि ईसाइयों के एक अन्य पंथ द्वारा आज भी चैत्र माह में ईसाई संवत्सर का प्रारंभ माना जाता है | उसी प्रकार मोहर्रम माह से पहले दिन से मुस्लिम समुदाय का "नववर्ष" , दीपावली के अगले दिन से जैन धर्म का "नववर्ष" तो होली के दूसरे दिन सिख समुदाय अपना नववर्ष मनाता है | इस प्रकार विभिन्न धर्मावलंबी अपने अपने मतानुसार नव वर्ष मनाते हैं | अब विचार कीजिए कि हम कौन हैं और अपना "नववर्ष" कब मनायें ??* *आज इस प्रकार संपूर्ण विश्व में ईसाई नववर्ष की धूम मची हुयी है उसे देख कर ही लगता है कि हम शायद अपना धर्म एवं अपना कर्म सब कुछ भूलते जा रहे हैं | चाहे वह सनातन धर्म हो , बौद्ध धर्म हो , इस्लाम धर्म हो या अन्य कोई धर्म , सभी मिलकर जिस प्रकार ईसाई नववर्ष की शुभकामनाओं का आदान प्रदान कर रहे हैं उससे तो यही लगता है अंग्रेजों द्वारा दिया गया पराधीनता का यह पर्व हमारे मनोमस्तिष्क पर बैठ चुका है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सभी सनातन धर्मियों से पूछना चाहता हूं कि जिस प्रकार सनातन के धार्मिक त्योहारों होली एवं दीपावली पर प्रदूषण के नाम पर अनेकों प्रतिबंध लगाने की आवाजें उठती है क्या ३१ दिसंबर को भी कहीं से कोई आवाज उठी | कल ३१ दिसम्बर की रात को जिस प्रकार पटाखे दागे गये एवं जश्न मनाया गया क्या उससे प्रदूषण नहीं हो रहा है ?? यह देख कर सभी सनातन धर्मियों को यह समझ जाना चाहिए कि पटाखों एवं रंग - अबीरों से प्रदूषण मात्र सनातन धर्म के पर्व / त्यौहारों में फैलता है अन्यथा नहीं | यदि यही हाल हमारा रहा तो निश्चित है कि हमारे आने वाली संताने यह भूल जायेंगी कि हम कौन हैं ? और हमारे पर्व क्या है ?? चैत्र मास में मनाए जाने वाले नववर्ष संवत्सर को जानने वाला कोई नहीं होगा | क्योंकि जब हम स्वयं ईसाई नववर्ष मनाने में व्यस्त हैं तो हमारी आने वाली पीढ़ियों कौन बताएगा कि हमारा नववर्ष जनवरी नहीं अपितु चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है | मेरे कथन पर विचार करने की आवश्यकता है | हमें समझ जाना चाहिए कि हम तो सब के धर्मों को मानने वाले हैं परन्तु क्या हमारे पर्व एवं त्योहारों को भी मानने वाला कोई इस संसार में है ? नहीं मिलेगा कोई भी , क्योंकि हम स्वयं उनको भूलते जा रहे हैं ! यदि आज हमारे पर्व / त्यौहारों की चमक कान्तिहीन हो रही है तो उसका कारण हम स्वयं हैं |* *सबका अपना-अपना नववर्ष है सभी लोग प्रेम के अपने अपने मतानुसार इसको मनायें परंतु कम से कम हम तो यह ध्यान रखें कि हम क्या हैं ? और हमारा नववर्ष कब है ??*

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