Khaab Foundation: खाब फाउंडेशन की पहल दे रही है सैकड़ो मानसिक रोगियों को जीवन जीने की एक नई दिशा

03 जनवरी 2019   |  अंकिशा मिश्रा   (81 बार पढ़ा जा चुका है)

Khaab Foundation: खाब फाउंडेशन की पहल दे रही है सैकड़ो मानसिक रोगियों को जीवन जीने की एक नई दिशा

खाब फाउंडेशन एक ऐसी गैर सरकारी संस्था है जिसका उद्देश्य मानसिक रोगियों की मदद करना और उनको उस रोग से बाहर निकालना है।



खाब फाउंडेशन एक ऐसी गैर सरकारी संस्था है जिसका उद्देश्य मानसिक रोगियों की मदद करना और उनको उस रोग से बाहर निकालना है।मानसिक रोग जिसका नाम सुनते ही लोगों के ज़हन में एक शब्द आता हैं “पागल” लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि हर मानसिक रोगी पागल हो। जैसे शारीरिक रोग होते हैं वैसे ही मानसिक रोग भी होते हैं। साल 2017 ये वो वक़्त था जब भारत में समाज के हर वर्ग के लोग अपने शारीरिक स्वास्थ के प्रति जागरूक हो रहे थे और काफ़ी हद तक हो भी चुके थे। समाज में काफ़ी हद तक लोगों को कैन्सर, एच॰आई॰वी॰ जैसी गम्भीर रोग से लेकर ब्लड प्रेसर और कलास्त्रोल जैसी छोटे रोग के बारे में पता था। मगर अभी भी कुछ ऐसा था जो लोगों को मालूम होना चाहिए था या फिर यूँ कहें कि लोग उसके बारे में जागरूक तो थे मगर उसको स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।


ये वो दौर था जब लोग शारीरिक स्वास्थ की समस्याओं पर अब खुल के बोलने लगे थे मगर आपने मानसिक स्वास्थ को लेकर अभी भी खुल कर बात नहीं कर पा रहे थे क्योंकि मानसिक स्वास्थ को समाज दो वर्गों में बट चुका था।



पहला वर्ग जो कि समाज का शिक्षित और आर्थिक मज़बूत शहरी वर्ग था जिसका मानना था कि मानसिक रोग और उपचार के लिए मानसिक चिकित्सक के पास जाने से उनको पागल कि श्रेणी में डाल दिया जाएगा। ये वो लोग थे जो मानसिक समस्या के उपचार के लिए मनोचिकित्सक के पास जाना नहीं चाहते थे।


दूसरा वर्ग उन लोगों को था जो कि ना ही शिक्षित थे और ना आर्थिक रूप से मज़बूत यानि ग्रामीण और पिछड़ा वर्ग जो मानसिक रोग को तंत्र-मन्त्र, जादू-टोना या भूत-प्रेत का साया मानते थे जिसका उपचार के लिए वो तंत्रिक और ओझाओं के पास जाते थे।


मानसिक रोगों के प्रति समाज का ये रवैया देख मनोविज्ञानी आकाश पाल ने मानसिक रोगियों के लिए एक कदम उठाया और उन्होंने साल 2017 में लखनऊ,उत्तर प्रदेश में खाब फाउंडेशन की नींव रखी। खाब फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य समाज में और लोगों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है।


खाब फाउंडेशन के बारे में


बता दें कि खाब फाउंडेशन की शुरुआत सितंबर 2017 में मनोविज्ञानी आकाश पाल द्वारा लखनऊ में की गई थी। ख़ाब फ़ाउंडेशन भारत सरकार द्वारा रिजेस्टर संस्था है जिसमें में 7 बोर्ड मेम्बर (जिसमें शहर के नामी मनोचिकत्सक भी है) , 10 टीम मेम्बर 15 वालेंटियर (volunteer) है जो लगातार जागरूकता अभियान में कार्यरत है। ख़ाब फ़ाउंडेशन लगातार मेंटल हेल्थ अवरेनाएस वर्क्शाप करती रहती है जिसमें वो समाज के हर वर्ग के और हर उम्र लोगों के पास जा कर उनको मनोरोग के विषय में शिक्षित करती है।



ख़ाब फ़ाउंडेशन के संस्थापक आकाश पाल का कहना है कि अब वो वक़्त आ गया है जब समाज में हर एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ के प्रति शिक्षित हो और मानसिक समस्या पर खुल के बात करे जिसके चलते उन्होंने “ लेट्स स्पीक आउट” नामक मुहिम शुरू की जिसमें वो लोगों से मानो-रोग की समस्या, लक्षण और उपचार पर बात करते हैं।


खाब फाउंडेशन से लगभग 1000 से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं और साल भर में लगभग 5000 से ज्यादा लोग खाब फाउंडेशन की वर्कशॉप में शामिल होते हैं। बता दें कि खाब फाउंडेशन के सदस्य हॉस्पिटल, स्कूल एवं वंचित बस्तियों में जाकर मानसिक रोगों के प्रति निःशुल्क जानकारी देते हैं। पिछले एक साल में खाब फाउंडेशन ने 100 से भी अधिक जागरूकता वर्कशॉप किये हैं जिसमें डोर टू डोर गतिविधि, वृद्धावस्था और अनाथालय कार्यशाला, बीमारी और देखभाल करने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम, स्कूल और युवा परामर्श शामिल हैं।

खाब फाउंडेशन किस तरह मनोरोगियों की मदद करता है ?


  • मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम के लिए कार्यशाला।


  • रोगी आत्म-जागरूकता और स्वतंत्र प्रशिक्षण कार्यक्रम।


  • रोगी का परिवार और देखभाल करने वाला परामर्श और प्रशिक्षण कार्यक्रम।


  • डोर टू डोर गतिविधियां।

बातचीत के दौरान मनोविज्ञानी आकाश पाल ने बताया कि मनोरोगी दो प्रकार के होते है।“पहला मनोवैज्ञानिक विकार(Psychotic disorder), जैसे कि सिज़ोफ्रेनिया(schizophrenia) और द्विध्रुवी विकार(bipolar disorder),भ्रम, मतिभ्रम और मनोविकृति के अन्य लक्षण शामिल हैं। दूसरा गैर-मनोवैज्ञानिक विकार(Non-psychotic disorders), जिसे न्यूरोसिस कहा जाता था, इसमें अवसादग्रस्तता विकार और चिंता विकार जैसे फोबिया, पैनिक अटैक और जुनूनी-बाध्यकारी विकार (ओसीडी) शामिल हैं।”


साथ ही आकाश पाल ने यह भी बताया मानसिक स्वास्थ्य के रोगों की कोई उम्र नहीं है, लेकिन ज़्यादतर मानसिक बीमारियां युवाओं और वयस्कों में देखी जाती है 7 साल से 30 साल तक ले लोग मानसिक रोगों का ज़्यादा शिकार होते हैं जिसकी वजह बाहरी कारक, सहकर्मी दबाव, काम के coemations, तनाव, यौन इच्छा, पोर्नोग्राफी, ड्रग्स की लत और अच्छे माता-पिता की कमी मानी जाती है । साथ ही जैविक और आनुवंशिक कारण भी मानसिक रोगों की वजह मानी जाती है ।


आज भारत में लगभग हर कोई मानो-रोग की समस्या से जूझ रहा है। चाहे वो बच्चों में पढ़ाई में बढ़ते तनाव हो, परीक्षा के परिणाम के डर से आत्महत्या करना हो या नौजवान में व्यवसाय का तनाव हो या सम्बन्धों में तनाव आना ये सभी कारण मानसिक स्वास्थ को प्रभावित करते हैं। वक़्त है कि लोग आपनी समस्या जैसे ग़ुस्सैल स्वभाव, चिड़चिड़ापन, नशे की लत, पोर्न अडिक्शन, स्ट्रेस या फ़िर बोईपोलर, सीजोफ़ेनिया, जैसी बीमारियों पर न सिर्फ बात करें बल्कि इससे झूझते लोगों इसके उपचार के प्रति भी जागरूक हों।


ख़ाब फ़ाउंडेशन लगातार इस प्रयास में लगा हुआ है कि आने वाले कुछ सालों में देश के हर हिस्से में लोग मानसिक रोगों के प्रति जागरूक हो जिससे मानो-रोग से सम्बंधित सभी धरणानाए ख़त्म की जा सकें।


खाब फाउंडेशन न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि भोपाल, रायपुर, कोलकाता, बंगलोरे, दिल्ली जैसे राज्यों में कार्यरत है।




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