सफर

05 जनवरी 2019   |  मंजू गीत   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

आज मन की हलचलों ने कदमों को चलने न दिया।बहुत सोचा जाऊं या ना जाऊ । घर दूर, अपने आंखों से दूर, मौसम भी मगरूर ठंडी का है।सफर सहर में है। शाम की बातों ने मन को बोझिल कर दिया था।सब हलचलों और बोझिल शाम को समेट अपनी चारपाई पर तकिए के नीचे दबा लिया था। ठंडी की सिहरन से पूरा तन सिहर रहा था। ये सिहरन कपकपाहट बन दांतों का झुनझुना बन गयी थी। एक मैं और एक मेरी रजाई ही इस बेदर्द ठंडी के साथी थे। अब रह रह कर साथी और भी याद आ रही थी। दुःख सुख तो जीवन है। जीवन साथी साथ होता तो ये ठंड तो बंट जाती।हम दोनों के प्यार मे ये ठंड जगह ही ना पाती।यादों की कड़ी जोड़े मैं एक स्वपन को साथी बना सो गया। आज ना नजर नजर से टकरा रही थी। ना सांसें सासों में समा रही थी। बस रात गहरा रही थी और इसी के साथ मेरी नींद भी गहरा गयी। रात परदेश में चारपाई पर थी।दिल मे उजाला मेरे देश मेरे घर के नरमबिस्तर का था। बिन साथी कब तक सपनों के गलियारों में खोता।भोर मे नींद भी साथ छोड़ गयी।मन की उठती हलचलों ने फोन उठाया और उसमें कैद साथी को नजर भर निहारा। निगाहों की तडप बाहों में आ गयी। ठंडी की सोच छोड़ अब बात वापिस घर लोटने की दौड पर आज गई। अब एक ही गीत जुबान पर चढ आया। घर आजा परदेशी, तोहे गन्ना गुड खिलाए देशी।गुड की मिठास और साथी को बाहों में भरने की आस ने आगे पीछे का सब भुला दिया। सब कुछ छोड़ अब क़दमों को सफर पर बढा।

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