कर्म प्रधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

06 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

कर्म प्रधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल में परमपिता परमात्मा ने एक से अनेक होने की कामना करके भिन्न - भिन्न योनियों का सृजन करके उनमें जीव का आरोपण किया | जड़ - चेतन जितनी भी सृष्टि इस धराधाम पर दिखाई पड़ती है सब उसी कृपालु परमात्मा के अंश से उत्पन्न हुई | कहने का तात्पर्य यह है कि सभी जीवों के साथ ही जड़ पदार्थों में भी परमात्मा का ही अंश है | गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में कहा भी है :-- "ईश्वर सर्व भूतमय अहई" अर्थात परमात्मा हर जगह अपने अंश से विद्यमान है | फिर परमात्मा ने कर्मसिद्धांत एवं कर्मफल बनाकर जीवों को यह बताने का प्रयास किया कि जो जैसा कर्म करेगा उसको उसी के अनुरूप फल भोगना पड़ेगा , यह सिद्धांत प्रतिपादित करते ईश्वर ने जीवों को कर्म करने के लिए स्वतंत्र कर दिया | इस पृथ्वी पर अवतार लेने के बाद वह परमात्मा भी इस कर्मफल के सिद्धांत से नहीं बच पाया है | भीष्मपितामह जैसे दिव्य पुरुष यदि शरशैय्या पर पड़े तो यह उनके पूर्वकर्मों का ही फल था क्योंकि उन्होंने पूर्वजन्म में एक सर्प को बबूल के कांटों पर फेंक दिया था | यह ईश्वर की महान कृति है कि कोई भी अपने किये कर्मों के फल से बच नहीं सकता | जब इस सिद्धांत से मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम एवं लीलापुरुषोत्तम श्री कृष्ण नहीं बच पाये तो साधारण जीवों की क्या बात की जाय | जो भी इस धराधाम पर आया है उसको अपने कर्मों के अनुसार फल भोगना ही पड़ेगा , यदि इस जन्म में वह बच गया तो भी वे कर्म तब तक उसका पीछा नहीं छोड़ते जब तक वह जीव उस पूर्व के कर्मों का फल भुगत नहीं लेता | इसके लिए उसे भले ही कई जन्म लेने पड़ें | यही ईश्वर का कर्मसुद्धांत एवं न्यायप्रियता है |* *आज जिस प्रकार चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई है मनुष्य मनुष्य के प्राण लेने पर तुला हुआ है , जीव हत्याएं हो रही है ! यह सब देख कर ह्रदय द्रवित एवं मस्तिष्क कुंठित हो जाता है | क्योंकि एक तरफ तो हमें यह बताया जाता है कि वह परमात्मा सब के भीतर वास कर रहा है | बाबा जी मानस में बताते हैं कि :-- "ईश्वर अंश जीव अविनाशी !" अर्थात सभी जीव उस ईश्वर के ही अंशी है तो ऐसा क्यों हो रहा है ? अनेक लोग प्रश्न कर देते हैं कि जब एक कसाई जीव हत्या करता है तो क्या उस पशु में ईश्वर का वास नहीं है ?? क्या ईश्वर ही ईश्वर को मार रहा है ?? ऐसे सभी लोगों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह बताना चाहूंगा कि ईश्वर तो सब में है परंतु ईश्वर किसी को नहीं मार रहा है बल्कि यदि आज मनुष्य मनुष्य के प्राण ले रहा है , मनुष्य पशु के प्राण ले रहा है तो यह उसके कर्म हैं | कुछ इस जन्म के , कुछ पूर्व जन्म के | आज यदि एक कसाई के द्वारा जीव हत्या की जाती है तो यह मान लेना चाहिए की पूर्व जन्म में इस जीव ने भी कसाई की हत्या की होगी | क्योंकि सनातन धर्म यह बताता है कि यहां कोई किसी को न सुख देता है ना कोई दुख देता है सब अपने ही कर्मों का फल भोग रहे हैं | आज जो त्राहि त्राहि मची है इसका कारण वह परमात्मा नहीं बल्कि हम स्वयं एवं हमारे कर्म हैं | हमारे पूर्व जन्म के कर्म आज हमारे समक्ष फलित हो रहे हैं | गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि "अपने किये हुए कर्म को मनुष्य को भोगना ही पड़ता है , इससे कोई भी बच नहीं सकता है" | यदि भगवान श्री राम ब्रह्म के अवतार थे तो रावण में भी उसी ब्रह्म का अंश था , परंतु रावण के कर्म ही उसके वध के कारण बने | संचित , क्रियमाण एवं प्रारब्ध इन तीन प्रकार के कर्म से प्रत्येक जीव को मिलने वाले फल को भोगना ही पड़ता है | अधिक कुछ ना कह के इतना ही कहना चाहूंगा कि अनेक ग्रंथों को पढ़ने के बाद भी आज यदि मनुष्य के कर्म सकारात्मक नहीं है , एवं उसके बाद भी यदि मनुष्य परमात्मा से शिकायत करता है तो यह उसकी महज मूर्खता ही है |* *यहां कोई किसी को नहीं मारता है बल्कि उस जीव के कर्म ही उसको मारते हैं | यही सनातन का सिद्धांत और यही ईश्वर द्वारा रचित कर्म सिद्धांत है |*

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