सुखी कौन ? दुखी कौन ?? :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

07 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

सुखी कौन   ? दुखी कौन ?? :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य जब इस धरा धाम पर जन्म लेता है तो उसके जन्म से लेकर की मृत्यु पर्यंत पूरे जीवन काल में सुख एवं दुख समय समय पर आते जाते रहते हैं | प्रायः विद्वानों ने अपनी टीकाओं में यह लिखा है कि जब मनुष्य के विपरीत कोई कार्य होता है तब वह दुखी हो जाता है , और जब अपने अनुकूल सारे कार्य होते रहते हैं तब वह सुख का अनुभव करता है | इस संसार में सर्वाधिक सुखी कौन है ? इसकी व्याख्या करते हुए हमारे आध्यात्मिक गुरुओं ने लिखा है :- "अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतस: ! सदा संतुष्टमनस: सर्वा: सुखमय: दिश: !! अर्थात :-- अकिञ्चन , संयमी , शांतचित्त वाले , प्रसनचित्त वाले और संतोषी मनुष्य को सभी दिशाएं सुखमय प्रतीत होती है | मनुष्य सुखी तभी हो सकता है जब उसको संतोष हो | अपने किए हुए कर्म के द्वारा जब मनुष्य संतोष को प्राप्त होता है तब वह सुख का अनुभव करता है , परंतु इतना सब होने के बाद भी मनुष्य सुखी नहीं रह पाता है क्योंकि इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि वह दूसरों का सुख नहीं देख पाता है | मनुष्य सुखी तभी हो सकता है जब उसके मन में किसी भी वस्तु की अभिलाषा ना रह जाय क्योंकि किसी वस्तु की अभिलाषा हो और वह ना प्राप्त हो तो मनुष्य दुखी हो जाता है | और वस्तु को प्राप्त ना कर पाने का दोष वह स्वयं के ऊपर न लगा कर दूसरों के ऊपर लगाने का प्रयास करता है |* *आज समाज में जिधर भी दृष्टि उठाओ सभी दुखी ही दिखाई पड़ते है कोई भी सुखी नहीं दिखाई पड़ता है | मनुष्य के दुख का कारण जहां एक ओर उसके अंतःकरण में व्याप्त हो चुकी ईर्ष्या द्वेष की भावना प्रमुख है , वहीं संसार के प्रति प्रबल मोह भी इसका सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है | गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपने मानस में लिखा है :-- "मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला"" मनुष्य को सुख और दुख किसी दूसरे के द्वारा नहीं बल्कि अपने ही कर्मों के द्वारा प्राप्त होता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यही कहना चाहूंगा कि आज न तो कोई अञ्किचन रह गया है और न ही किसी का चित्त शान्त है | यह सत्य है कि संतोष और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए चित्त का शान्त होना बहुत आवश्यक है | जब तक मनुष्य का चित्त नहीं शान्त होगा तब तक वह सुख की अनुभूति नहीं कर सकता है | इस विषय पर अनेकों पुस्तकें लिखी गई परंतु इसका अंत नहीं दिखाई पड़ रहा है , और ऐसा लगता है कि जब तक यह सृष्टि रहेगी , तब तक मनुष्य रहेगा और साथ में रहेंगे सुख एवं दुख और यह चर्चा अनवरत चलती रहेगी |* *मनुष्य के हृदय में उठ रहे विचार ही उसके सुख एवं दुख का कारण होते हैं | यह विषय गहनता से विचार करने वाला है |*

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