सर्व व्यापक परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (65 बार पढ़ा जा चुका है)

सर्व व्यापक परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में यह बताया जाता है कि सृष्टि की रचना करने वाले परम पिता परमात्मा जिन्हें ईश्वर कहा जाता है वे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं | कोई भी ऐसा स्थान नहीं है जहां परमात्मा की उपस्थिति न हो | उस परमात्मा का कोई स्वरूप नहीं है | गोस्वामी तुलसीदास जी अपने मानस में लिखते हैं :-- "बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना ! कर बनु कर्म करइ विधि नाना !! आनन रहित सकल रस भोगी ! विनु वानी वक्ता बड़ जोगी !!" अर्थात :- वह परमात्मा बिना पैर के चलता है बिना कानों के सुनता है | शरीर न होने पर भी सभी रसों का उपभोग करता है और वाणी हीन होकर भी सबसे बड़ा वक्ता वही है | ऐसे परमपिता परमात्मा की उपस्थिति समय-समय पर होती रही है | जब दैत्त्यराज हरिणाकश्यप ने अपने पुत्र पहलाद को खंभे में बांधकर मारना चाहा तो उसी खम्भे से परमात्मा प्रगट हो जाता है | ऐसे परमात्मा की पूजा - आराधना मानव अनेक रूपों में करता है | यद्यपि परमात्मा का कोई स्वरूप नहीं है इसलिए जो भी जिस रूप में उनका ध्यान करता है वह उसी स्वरूप में मानव को मिल जाते हैं | गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं :- "ये यथा मा प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" अर्थात:- मुझको जो जैसे भजता है मैं उसको उसी स्वरूप में मिल जाता हूं | परमात्मा को पाने के लिए लोग अपने घर में तो उनका ध्यान करते ही हैं साथ ही मंदिरों और तीर्थों में जाकर के उस कृपालु परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करने का प्रयास करते हैं | ऐसा करके मनुष्य उस परमात्मा के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है , जिसकी कृपा से वह संसार में आया और संसार के सारे क्रियाकलाप संपादित कर रहा है | ऐसे कृपाल परमात्मा को कभी भी भूलना नहीं चाहिए | कोई भी नैतिक / अनैतिक कार्य करते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि हम सब से तो छुप सकते हैं परंतु उस परमात्मा से छुपकर कोई कार्य नहीं कर सकते |* *आज समाज नें बहुत विकास कर लिया है |और इस समाज में अनेक बुद्धिजीवी प्रकट हो गये हैं जो परमात्मा के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा कर रहे हैं | कई लोग तो ऐसे भी हैं जो यह कहते हुए भी सुने जाते हैं कि जब परमात्मा कण कण में व्याप्त हैं तो उनको पाने के लिए तीर्थों या मंदिरों में जाने की क्या आवश्यकता है ?? ऐसे सभी अधिक पढ़े लिखे लोगों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना पूछना चाहता हूं कि जब परमात्मा को पाने के लिए मंदिर में नहीं जाया जा सकता है तो ज्ञान प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाने की क्या आवश्यकता है | सारा ज्ञान पुस्तकों में होने के बाद भी मनुष्य विद्यालय क्यों जाता है ? उन पुस्तकों को अपने घर पर रख कर के वह विद्वान क्यों नहीं बन जाता ? अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए मनुष्य जिस प्रकार समय-समय पर अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेता है और ऐसा करके वह ज्ञानी बनता है | जिस प्रकार ज्ञानी बनने के लिए सारी पुस्तकें होने पर भी विद्यालय जाना अनिवार्य है , उसी प्रकार कण कण में व्याप्त उस परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करने के लिए तीर्थों एवं मंदिरों में जाना भी परम आवश्यक है | परंतु कुछ लोग झूठी शान के लिए इनका विरोध करते हुए नहीं थकते | वह ऐसा समाज को दिखाने के लिए करते तो हैं परंतु ऐसे लोग भी सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते | सनातन मान्यताओं का विरोध करने वाले समाज में तो बढ़ चढ़कर भाषण देते हैं परंतु अपने स्वयं के घर में पूर्वजों द्वारा माने जा रहे प्राचीन रीति - रिवाजों को मानने के लिए बाध्य हैं | यही मनुष्य के चरित्र का दोहरापन है |* *जब बिना विद्यालय के मनुष्य शिक्षित नहीं हो सकता है तो बिना मंदिर एवं तीर्थों का सेवन किये मनुष्य परमात्मा का सानिध्य प्राप्त कर लेगा यह भला कैसे संभव है ??*

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