विवेक :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

14 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

विवेक :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*प्रत्येक मनुष्य एक मन:स्थिति होती है | अपने मन:स्थिति के अनुसार ही वह अपने सारे कार्य संपन्न करता है , परंतु जब मनुष्य की मन:स्थिति में विवेक सुप्तावस्था में होता है तो उसके निर्णय अनुचित होने लगते हैं | प्रत्येक मनुष्य को अपने भीतर के विवेक को जागृत करना चाहिये | जिस दिन विवेक जागृत हो जाता है मनुष्य अपनी समस्याओं का हल स्वयं कर सकता है | विचार कीजिए यदि मनुष्य का विवेक जागृत है तो इस धरा धाम पर जो भी सामग्री , जो भी साधन मानवमात्र को मिले हुए हैं उनका प्रयोग करके मनुष्य कुछ भी करने में सक्षम हो सकता है | इस धरा धाम पर मनुष्य को समय मिला , श्रम मिला , सुंदर हृष्टपुष्ट शरीर मिला और एक सुंदर स्वस्थ मस्तिष्क मिला | समुचित कार्यक्षेत्र एवं परिवार मिलने के बाद भी मनुष्य का विवेक यदि जागृत नहीं है तो इन सभी क्षेत्रों में कैसे क्रियाकलाप करने हैं ? क्या उचित है क्या अनुचित है ? इसका विचार मनुष्य नहीं कर पाता है | जब मनुष्य विचार नहीं कर पाता है तो वह भटक जाता है तथा अपने निश्चित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता है और जो कार्य उसके द्वारा होने चाहिए वह न हो करके अनुचित कार्यों में लिप्त हो जाता है | इसका कारण है मनुष्य के पास विवेक होते हुए भी वह सुप्तावस्था में होता है | जब विवेक सुप्तावस्था में होता है तो मनुष्य अज्ञानी हो जाता है , और अज्ञानी मनुष्य उचित अनुचित का विचार नहीं कर पाता है तथा जीवन भर भटकता रहता है |* *आज मनुष्य सुंदर स्वरूप पा करके अच्छे अच्छे वस्त्र पहनकर समाज में अपने क्रियाकलाप करता है , परंतु विवेकहीनता का परिचय कभी न कभी दे ही देता है , क्योंकि विवेक को जागृत करने का परिश्रम करता हुआ आज का मनुष्य नहीं दिख रहा है | कुछ किताबों को पढ़कर के विवेक जागृत हो जाएगा ऐसा समझने वाले विवेकहीन ही नहीं कहे जा सकते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि आज के मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह हो दूसरों को कोई कार्य करते देख कर के उसी रास्ते पर चलने का प्रयास करने लगता हैं जबकि उसे उस कार्यक्षेत्र का ज्ञान ही नहीं होता है | दूसरों के भीड़ का हिस्सा होने का कार्य तो भेड़ों का होता है मनुष्यों का नहीं | यह आवश्यक नहीं है कि जहां अधिक लोग चल रहे हैं वही हम भी चलने लगें , जो दूसरे लोग कर रहे हैं वही हम भी करने लगें | हमारे आध्यात्मिक गुरुओं ने बताया है की प्रत्येक परिस्थित के विषय में गुण के अनुसार , उसके परिणाम के अनुसार मनुष्य को स्वयं विचार करके ही कोई कार्य संपादित करना चाहिए | यदि मनुष्य के पास स्वतंत्र चिंतन है तो वह उचित अनुचित का निर्धारण कर सकता है अन्यथा भेड़ चाल में चलता हुआ जीवन व्यतीत कर देता है ! जैसा कि आज होता हुआ दिख रहा है | आज चमक दमक में लोग खो गए हैं और पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के बस में हो कर के उसी के अनुयायी बनते चले जा रहे हैं जो कि उचित नहीं कहा जा सकता |* *कौन सा कार्य उचित है कौन सा अनुचित है अपने विवेक के द्वारा विचार करने के बाद यदि मनुष्य अपने कार्य संपादित करता है तो उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है |*

विवेक :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

अगला लेख: अहंकारी विद्वता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
06 जनवरी 2019
*सृष्टि के आदिकाल में परमपिता परमात्मा ने एक से अनेक होने की कामना करके भिन्न - भिन्न योनियों का सृजन करके उनमें जीव का आरोपण किया | जड़ - चेतन जितनी भी सृष्टि इस धराधाम पर दिखाई पड़ती है सब उसी कृपालु परमात्मा के अंश से उत्पन्न हुई | कहने का तात्पर्य यह है कि सभी जीवों के साथ ही जड़ पदार्थों में भी
06 जनवरी 2019
06 जनवरी 2019
*हमारे पूर्वजों ने अनेक साधनाएं करके हम सब के लिए दुर्लभ साधन उपलब्ध कराया है |साधना क्या है यह जान लेना बहुत आवश्यक है | जैसा कि हम जानते हैं की कुछ ऋषियों ने एकांत में बैठकर साधना की तो कुछ ने संसार में ही रहकर की स्वयं को साधक बना लिया | साधना का अर्थ केवल एकांतवास या ध्यान नहीं होता | वह स
06 जनवरी 2019
30 दिसम्बर 2018
*इस धराधाम पर आदिकाल से मानव जीवन बहुत ही दिव्य एवं विस्तृत रहा है | मनुष्य अपने जीवन काल में अनेक प्रकार के क्रियाकलापों से हो करके जीवन यात्रा पूरी करता है | यहाँ मनुष्य के कर्मों के द्वारा समाज में उसकी श्रेणी निर्धारित हो जाती है | यह निर्धारण समाज में तभी हो पाता है जब मनुष्य के कर्म समाज के अन
30 दिसम्बर 2018
07 जनवरी 2019
*इस धरा धाम पर जन्म लेकर के मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक आने को क्रियाकलाप संपादित करता रहता है एवं अपने क्रियाकलापों के द्वारा समाज में स्थापित होता है | कभी-कभी ऐसा होता है कि मनुष्य जन्म लेने के तुरंत बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और कभी कभी युवावस्था में उसकी मृत्यु हो जाती है | ऐसी स्
07 जनवरी 2019
16 जनवरी 2019
वक़्त का विप्लव सड़क पर प्रसव राजधानी में पथरीला ज़मीर कराहती बेघर नारी झेलती जनवरी की ठण्ड और प्रसव-पीर प्रसवोपराँत जच्चा-बच्चा 18 घँटे तड़पे सड़क पर ज़माने से लड़ने पहुँचाये गये अस्पताल के बिस्तर परहालात प्रतिकूल फिर भी नहीं टूटी साँसेंकरतीं वक़्त से दो-दो हाथ जिजीविषा की फाँसें जब एनजीओ उठाते हैं दीन
16 जनवरी 2019
06 जनवरी 2019
*इस संसार में मनुष्य जहाँ समय समय पर दिव्य ज्ञान के सद्गुणों को प्राप्त करता रहता है वहीं उसको काम , क्रोध , मोह , लोभ आदि भी अपने शिकंजे में कसने को प्रतिक्षण तत्पर रहते हैं | मनुष्य का तनिक भी डगमगाना उन्हें इस पथ का पथिक बना देता है | मनुष्य को लोभ ले डूबता है | लोभ क्या है, लोभ लालच को कहते हैं।
06 जनवरी 2019
07 जनवरी 2019
*मनुष्य जब इस धरा धाम पर जन्म लेता है तो उसके जन्म से लेकर की मृत्यु पर्यंत पूरे जीवन काल में सुख एवं दुख समय समय पर आते जाते रहते हैं | प्रायः विद्वानों ने अपनी टीकाओं में यह लिखा है कि जब मनुष्य के विपरीत कोई कार्य होता है तब वह दुखी हो जाता है , और जब अपने अनुकूल सारे कार्य होते रहते हैं तब वह सु
07 जनवरी 2019
01 जनवरी 2019
*संपूर्ण संसार में मनुष्य अपने दिव्य चरित्र एवं बुद्धि विवेक के अनुसार क्रियाकलाप करने के कारण ही सर्वोच्च प्राणी के रूप में स्थापित हुआ | मनुष्य का पहला धर्म होता है मानवता , और मानवता का निर्माण करती है नैतिकता ! क्योंकि नैतिक शिक्षा की मानव को मानव बनाती है | नैतिक गुणों के बल पर ही मनुष्य वंदनी
01 जनवरी 2019
16 जनवरी 2019
*हमारे देश भारत में कई जाति / सम्प्रदाय के लोग रहते हैं | कई प्रदेशों की विभिन्न संस्कृतियों / सभ्यताओं का मिश्रण यहाँ देखने को मिलता है | सबकी वेशभूषा , रहन - सहन एवं भाषायें भी भिन्न हैं | प्रत्येक प्रदेश की अपनी एक अलग मातृभाषा भी यहाँ देखने को मिलती है | हमारी राष्ट्रभाषा तो हिन्दी है परंतु भिन्
16 जनवरी 2019
13 जनवरी 2019
*इस धरती पर इतने प्राणी है कि उनकी गिनती कर पाना संभव नहीं है | इन प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य माना जाता है | मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी इसलिए माना जाता है क्योंकि उसमें जो विशेषतायें हैं वह अन्य प्राणियों में नहीं पायी जाती हैं | वैसे तो ईश्वर ने मनुष्य में विशेषताओं का भण्डार भर दिया ह
13 जनवरी 2019
09 जनवरी 2019
*इस धरा धाम पर ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों का सृजन किया है | इनमें जलचर , थलचर एवं नभचर तीन श्रेणियाँ मुख्य हैं | इन तीनों श्रेणियों में भी सर्वश्रेष्ठ योनि मानव योनि कही गई है | मनुष्य जीवन सृष्टि की सर्वोपरि कलाकृति है , ऐसी सर्वांगपूर्ण रचना किसी और प्राणी की नहीं है | यह असाधारण उपहार हमको मिला
09 जनवरी 2019
09 जनवरी 2019
*सनातन धर्म में यह बताया जाता है कि सृष्टि की रचना करने वाले परम पिता परमात्मा जिन्हें ईश्वर कहा जाता है वे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं | कोई भी ऐसा स्थान नहीं है जहां परमात्मा की उपस्थिति न हो | उस परमात्मा का कोई स्वरूप नहीं है | गोस्वामी तुलसीदास जी अपने मानस में लिखते हैं :-- "बिनु पग चलइ सु
09 जनवरी 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x