हमारी संस्कृति :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

15 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

हमारी संस्कृति :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*प्राचीन काल से ही सनातन धर्म की मान्यताएं एवं इसके संस्कार स्वयं में एक दिव्य धारणा लिए हुए मानव मात्र के कल्याण के लिए हमारे महापुरुषों के द्वारा प्रतिपादित किए गए हैं | प्रत्येक मनुष्य में संस्कार का होना बहुत आवश्यक है क्योंकि संस्कार के बिना मनुष्य पशुवत् हो जाता है | मीमांसादर्शन में संस्कार के विषय में बताया गया है कि :- "संस्कारो नाम स भवति यस्मिञ्जाते पदार्थो भवति योग्यः कस्यचिदर्थस्य" अर्थात :- संस्कार वह है, जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है | अन्य साहित्यों में संस्कार के लिए कहा गया है :- "योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्कारा इत्युच्यन्ते" अर्थात:- संस्कार वे क्रियाएँ तथा रीतियाँ हैं, जो योग्यता प्रदान करती हैं | हमारे यहां सोलह संस्कारों का विधान जीव मात्र के लिए बताया गया है , इनमें से मुख्य विवाह संस्कार और उसके पहले होने वाला उपनयन संस्कार है | उपनयन संस्कार में मंडपपिरवेश करने से पहले वर (दूल्हे) का क्षौरकर्म कराने का विधान है | क्षौरकर्म कराने का अर्थ हुआ शुद्ध होना | शुद्धता के साथ दाढ़ी बाल इत्यादि का शुद्धिकरण करके ही वर पूजन के लिए मंडप में आता था | इससे उसमें एक नई ऊर्जा का संचार होता था | इसके अतिरिक्त हमारे जीवन में ग्रहों का प्रभाव भी बड़ा ही व्यापक होता है | मनुष्य के सुख संपत्ति आदि के लिए शुक्र ग्रह को प्रभावी माना गया है , और मानवमात्र को कटे - फटे वस्त्र पहनने से बचने का निर्देश दिया गया है | क्योंकि सब कुछ होते हुए भी यदि मनुष्य ऐसे वस्त्र धारण करता है तो यह दरिद्रता का सूचक माना गया है | समय-समय पर ज्योतिष शास्त्र एवं नीति शास्त्र के माध्यम से मानव मात्र को सचेत करने का कार्य सनातन धर्म के महापुरुषों ने किया है |* *आज मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया है | जिस युग में हम जी रहे हैं उसे आधुनिक युग कहा जाता है | आधुनिक युग एवं इसकी आधुनिकता सें लगभग सभी प्रभावित दिख रहे हैं | मानव जीवन में बताए गए सोलह संस्कारों में से कुछेक संस्कारों को मात्र कुछ लोगों के द्वारा मानने के अतिरिक्त आज मानव कोई भी संस्कार मानने के लिए तैयार नहीं है | सबसे मुख्य संस्कार जहां से मनुष्य अपना गृहस्थ जीवन प्रारंभ करता है उस विवाह संस्कार में भी अब लोग अपनी मनमानी करने लगे हैं | पाश्चात्य संस्कृति या फिल्मी अभिनेताओं की नकल करते हुए आज के युवा दूल्हे क्षौरकर्म न करा करके वैसे ही दूल्हा बनकर के कन्या के दरवाजे पर पहुंच रहे हैं , इसी कारण उनके जीवन में अशुद्धता व्याप्त रहती है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के युवाओं के पहनावे को देख कर के बरबस ही हंस पड़ता हूं कि वे पाश्चात्य की आधुनिकता से इतने ज्यादा प्रभावित हैं कि जगह जगह फटे हुए वस्त्र पहन कर समाज में टहलते हैं और उसे नाम दे देते हैं फैशन का | उनको शायद यह नहीं पता है कि विदेशों में जो वस्त्र प्रयोग के योग्य नहीं रह जाते हैं उन्हें आधुनिकता का रंग दे कर के भारत के बाजारों में बेचा जा रहा है और आधुनिकता की चमक दमक में बौखलाये हमारे युवा उन्हें नया फैशन समझ कर के हाथों हाथ खरीद कर अपने दरिद्रता का प्रदर्शन कर रहे हैं | दरिद्रता के सूचक इन परिधानों का त्याग करके ईश्वर ने जो हमें दिया है उस में संतुष्ट रहना सीखना पड़ेगा |* *पाश्चात्य संस्कृति को अपनाना कोई बुरा नहीं परंतु उसके लिए अपनी मूल संस्कृति को भूल जाना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता |*

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