स्पर्श

17 जनवरी 2019   |  मंजू गीत   (30 बार पढ़ा जा चुका है)

स्पर्श (यादों का) मैं खेल रही हूं तेरे आंगन में, क्योंकि मैं आज भी तुम्हारी मुस्कान हूं। तुम ही कहते थे ना,तुम मेरे होंठों की मुस्कुराहट में हों। जब मेरे अंतर्मन में कोई बात लगती है मैं आज भी तुम्हारी मुस्कान को ले आती हूं अपने होंठो पर, तुम अपनी गिलगिली उंगलियों को मेरे होंठों पर रख देते थे ना, जब मैं रोती थी। तुम ही तो कहते थे ना, देख मेरे सांचे दियों में तूने कितना पानी भर दिया। चख कर देख इस पानी में तुने कितना नूण मिला दिया। अपने होंठ चाट कर देख,जब तू हंसती है तो कितनी मिठी लगती है। मैं भी खूब थी।जो तुमसे नजरें बचाकर मैं चोरी से अपनी आंखों का पानी चख लिया करती, वो सच में नमकीन होता था। मैं रोने के बाद अपने होंठों में कपड़ा दबा कर उससे अपनी आंखों को साफ करती थी और हंसती थी। पता है क्यों, ताकि मेरी आंखें मिठी हो जाएं। आज भी जब कभी आंखों में पानी आता है, तो मैं फिर वही अपने होंठों पर रखी ,तुम्हारी वो गिलगिली सी उंगलियां याद आ जाती है। जो आज भी मिठी सी मुस्कुराहट, मेरे होंठों को दे जाती है।

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