मनभेद

18 जनवरी 2019   |  मंजू गीत   (3 बार पढ़ा जा चुका है)

रिश्ते सब छूट गए हाथों से, बस मतलब से साथ हुए, संबंध आ गये बाजारों में, दौलत में निलाम हुए। सुख-दुख सबके अपने अपने, कहना सुनना सब खेल हुए। 'मत' भेद 'मन' भेद बन गया, झूठी हामी संस्कार हुए। वार्तालाप के शिष्टाचार में, खुद को ही मार चले। जान,सोच, समझ कर मौन रहे, खुद की नज़रों में गुनहगार हुए। जुबान बिनतोल जो बोल गई, उसका मोल सहते रहे। रीता रीता सा है 'साथ का वादा' रीती रीती सी है संवेदनाएं, धरती क्या, आसमां क्या, प्रीत मरी सब लहुलुहान हो चले। रिश्ते छूट गए हाथों से, हालातों के गुलाम हो गए।

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