बून चान की याद में.

20 जनवरी 2019   |  pradeep   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

" लिखा नहीं कुछ वक्त से बून तेरी याद में,

गम तेरे दुनियां से कूच का कुछ इस कदर रहा."

बून चान मेरी चिड़िया का नाम है , जो पिछले साल 10 नवम्बर को एक हादसे में दुनियां से कूच कर गई. बून चान हर वक्त मेरे कम्प्यूटर पर बैठी रहती थी और मैं उसे देख कर लिखता पढ़ता रहता था, या यूँ कहे की वो मेरे लिखने पढ़ने की हिस्सेदार भी थी और राजदार भी. उसके जाने के बाद से कुछ अकेलापन सा छा गया, और मेरा लिखना पढ़ना कुछ वक्त के लिए रुक गया. आज बहुत लम्बे वक्त के बाद कुछ लिखने बैठा हूँ. इसलिए सबसे पहले बून चान के बारे में ही लिख रहा हूँ. करीब डेढ़ साल पहले वो हमारे घर आई थी, तब सिर्फ एक महीने की थी, खुद खाना भी नहीं खा सकती थी, उसे एक नली में कुछ दानो को गर्म पानी में भिगो कर उसकी चोंच में डाल कर खिलाया करते थे. नली को देख कर वो अपनी छोटी सी चोंच खोल कर चींचीं कर छोटे छोटे पंख फड़फड़ाने लगती, उस नली को वो अपनी माँ की चोंच समझ कर उन भीगे दानों को खा लेती. उड़ना नहीं जानती थी सिर्फ़ थोड़ा कूद लेती थी. धीरे धीरे बड़ी होने लगी दाना ख़ुद खाने लगी, छोटे छोटे पंख खोल कर थोड़ा थोड़ा उड़ने लगी. ज्याद उड़ नहीं पाती थी इसलिए मेरे हाथ पर या कंधे पर आकर बैठ जाती , कभी कान काटती तो कभी गालों को कटती, मुँह के करीब आने की कोशिश करती और जब भी मौका मिलता मेरे होंटो को काटती, अपनी चोंच को मेरे मुँह में डालने की कोशिश करती. धीरे धीरे लम्बी उड़ान भरने लगी और उड़ कर दिवार घड़ी पर बैठ जाती. हमने उसे पिंजरे में बंद करना छोड़ दिया. पूरा घर अब उसकी दुनियां बन गया. कभी, दिवार घड़ी तो कभी टीवी, कभी कैलेंडर तो कभी कम्प्यूटर. पुरे घर में आज़ादी से उड़ती फिरती. मेरे काम से घर लौटने पर उड़ कर मेरे कंधे पर आ बैठती, फिर मेरे साथ ही रहती. मैं बावर्चीखाने में खाना बनाऊ तो वो सामने चोपिंगबोर्ड पर बैठ अपनी ज़ुबान में गाना गा कर कभी फुदक फुदक कर मेरा मन बहलाती. मैं कम्प्यूटर पर काम करूँ तो कभी कम्प्यूटर के ऊपर तो कभी कीबोर्ड पर बैठ गाना गाती . शीशे में निहारना इस कदर पसंद था की जब घर में कोई नहीं होता तो टेलीफोन के पीछे रखे शीशे के पास बैठ कर खुद को निहारती . शीशे के पीछे कुछ कागज़ इकठ्ठे कर रखे थे और चुपचाप वहाँ जाकर बैठ जाती कोई भी शीशे के करीब जाए तो बाहर आकर फोन के ऊपर बैठ बताने की कोशिश करती की शीशे के पीछे कुछ नहीं है. वो नहीं चाहती की कोई उसे वहाँ शीशे के पीछे देखे. रात के दस बजते ही वो पीछे के कमरे में जहाँ अँधेरा होता वहाँ दिवार घड़ी पर जाकर सो जाती. अगर उस कमरे के दरवाज़े बंद होते तो परेशान होकर इधर उधर उड़ कर बताने की कोशिश करती की उस का सोने का वक्त हो गया और उस कमरे का दरवाज़ा बंद है, जैसे ही उस कमरे का दरवाज़ा खोलते वो तेज़ी से उड़ कर उस कमरे की दीवार घडी पर सोने चली जाती. उसके उस कमरे में जाने के बाद हम फिर दरवाज़ा बंद कर देते ताकि उसे परेशानी ना हो. सुबह पांच बजते ही वो दरवाज़ा खोलने के लिए आवाज़ लगाने लगती और दरवाज़ा खुलते ही हमारे कमरे में आ जाती. मेरी रज़ाई पर बैठ मुझे उठा देती, और फिर मेरे कंधे पर बैठ मेरे साथ चलती. मैं वाशबेसिन पर शेव बनाता तो वो वहां टंगे तौलिये पर बैठ जाती और कभी उड़ कर कंधे पर तो कभी सिर पर बैठ जाती. मैं हाथ मुँह धोकर पूजा करता तब भी वो मेरे हाथ पर बैठ गीता का पाठ सुनती. मेरी गीता के पन्नो पर उसने अपनी चोंच के निशाँ छोड़ दिए. मेरे खाने की थाली पर बैठ जाती और मेरे हटाने पर गुस्सा हो जाती , खाने में भी चोंच मारती. डबलरोटी को खाता देख ले तो उसे खाने के लिए हाथ पर बैठ जाती और मेरे साथ ही खाती. आज भी पूरे घर में उसकी यादें बसी हैं. उसकी चोंच से बनाये कॉपी, किताबो पर निशान अभी भी है. मेरे दिल और दिमाग में उसकी यादें आज भी है, और हमेशा रहेंगी. आज भी हम उसको उतना ही प्यार करते है, जितना जब वो हमारे साथ थी. उसकी कब्र एक गमले में बना सदाबहार गुलाब के फूल लगा दिए जिसपर लाल और सफ़ेद गुलाब खिल रहे है, और बून चान के हमारे पास होने का एहसास करा रहे है. उसका सफ़ेद रंग सफ़ेद गुलाब में खिलता है और उसकी लाल चोंच , लाल पंजे लाल गुलाब में. (आलिम)

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