भाषा

22 जनवरी 2019   |  मंजू गीत   (75 बार पढ़ा जा चुका है)

भाषा है हर संवाद के लिए जरूरी, फिर क्यों बनें अंग्रेजी जरूरी? अपनी निज भाषा, क्यों बनें तमाशा? शब्दों के अर्थ में बंधकर, बोले जो भी भाषा, वहीं है अपनी आशा संवाद के लिए जरूरी है जितनी भाषा, खुद को सुनाने के लिए भी, जरूरी है अपनी भाषा। चहुंओर लड़ाई है, कहीं क्षेत्रवादिता, कहीं भाषावादिता, वाद, विवाद, प्रतिवाद से ज्यादा बेहतरीन संवाद की। पंछियों की अपनी बोली, जानवरों की अपनी बोली, प्रकृति की अपनी बोली, इंसानियत की कहां गयी बोली? चार कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बदले बोली। जो अहसास के अर्थ में बांध दें, बोले ऐसी बोली। शब्दों की नगरी में भी शब्द नहीं मिले, वह है अहसासों की बोली। भाषा है हर संवाद के लिए जरूरी, यह संवाद ही रहें, ना बने मजबूरी। खुद को दे मजबूती, वहीं भाषा है जरूरी।

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