धार्मिकता

22 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (46 बार पढ़ा जा चुका है)

धार्मिकता

*हमारा देश भारत सामाजिक के साथ - साथ धार्मिक देश भी है | प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को धार्मिक दिखाना भी चाहता है | परंतु एक धार्मिक को किस तरह होना चाहिए इस पर विचार नहीं करना चाहता है | हमारे महापुरुषों ने बताया है कि धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाओं और उसके चरित्रों को केवल उसके शाब्दिक अर्थों में नहीं लेना चाहिए बल्कि उसमें निहित भाव क्या हैं - इस पर ध्यान देना जरूरी है | श्रीमद्भागवत पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है-दक्ष प्रजापति की सोलह बतायी गयी इनमें से तेरह का विवाह धर्म के साथ हुआ है | धर्म की पत्नियों के नाम थे | श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री(लज्जा) और मूर्ति | हम पुराणोंकी बातों को मनगढंत मानते हुए भले ही दक्ष प्रजापति , उनकी कन्यायों और उन तेरह कन्याओं के पति धर्म के अस्तित्व को नकार दें, किन्तु इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि वास्तविक धर्म ( हिन्दू, मुस्लिम. सिख, ईसाई आदि नहीं ) से इन तेरह गुणों की युति सर्वथा उपयुक्त है | विचार कीजिये धर्म ने इन तेरह पत्नियों से कौन कौन से पुत्र उत्पन्न किये | श्रद्धा से शुभ, मैत्री से प्रसाद, दया से अभय, शान्ति से सुख, तुष्टि से मोद,पुष्टि से अहंकार,क्रिया से योग, उन्नति से दर्प, बुद्धि से अर्थ , मेधा से स्मृति, तितिक्षा से क्षेम, ह्री (लज्जा) से प्रश्रय (विनय) और मूर्ति से नर नारायण उत्पन्न हुए |अपने सीमित ज्ञान से मैं तो इतना ही निष्कर्ष निकाल पाया कि जिस व्यक्ति में उपरोक्त तेरह गुण विद्यमान हैं ,वह धार्मिक कहा जा सकता है, मंदिर में घंटियाँ बजाने वाला,पांच वक्त की नमाज अदा करने वाला या गुरुद्वारे में मत्था टेकने वाला नहीं |* *आज इन गुणों का सर्वथा लोप दिखाई पड़ रहा है | लोग धार्मिक बनने का ढोंग तो कर रहे हैं परंतु धार्मिकता के एक भी लक्षण इन धार्मिकों में यदि ढूंढा जाय तो मिलना असंभव हो जाता है | धर्म की तेरह पत्नियां एवं उनके पुत्रों के नाम मात्र नाम न हो करके धर्म के लक्षण है , परंतु विचार कीजिए क्या यह लक्षण किसी में परिलक्षित होते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के धार्मिकों को देख रहा हूं जो धर्म के नाम पर कट्टरता दिखा करके धार्मिक बनने का स्वांग कर रहे हैं | आज जगह जगह पर धर्म के नाम पर लोगों की हत्याएं तक की जा रही हैं | क्या इसे उचित माना जा सकता है ? शायद नहीं | धार्मिक कौन है और अधार्मिक कौन है ? इसका निर्णय मनुष्य के गुणों से होता है | हमारे महापुरुषों ने कहा है कि वास्तविक धार्मिक वही है जिसका मन एक जगह स्थिर हो जाय , क्योंकि दौड़ता हुआ मन कभी धार्मिक नहीं हो सकता है | आज यह अभाव में दिखाई पड़ रहा है | ज्यादा न कहते हुए यही कहना चाहूंगा कि धर्म के लक्षणों को आत्मसात करने वाला ही धार्मिक होता है , भले वह पूजा अनुष्ठान न करता हो | क्योंकि जब मनुष्य के मानसिक लक्षण सकारात्मक होते हैं तभी वह धर्म के लक्षणों का अनुगमन कर सकता है अन्यथा दिखावा मात्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | आज इस विषय को लेकर के चर्चाएं होती रहती हैं और लोग स्वयं को धार्मिक होने का दावा भी करते हैं परंतु ऐसे लोगों को अपने हृदय में झांक कर देखना चाहिए कि क्या उनके अंदर धर्म के एक भी लक्षण है |* *धार्मिकता जाति देख कर नहीं आती है बल्कि मनुष्य के स्वभाव में निहित होती है | प्रत्येक मनुष्य को स्वयं का आकलन करना चाहिए कि क्या वह धार्मिक है ??*

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