मानसिक कष्ट

22 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

मानसिक कष्ट

*इस संसार में मनुष्य समय-समय पर सुख - दुख , प्रसन्नता एवं कष्ट का अनुभव करता रहता है | संसार में कई प्रकार के कष्टों से मनुष्य घिरा हुआ है परंतु मुख्यतः दो प्रकार के कष्ट होते हैं एक शारीरिक कष्ट और दूसरा मानसिक कष्ट | शारीरिक कष्ट से मनुष्य यदि ग्रसित है तो वह औषधि ले करके अपना कष्ट मिटा सकता है परंतु मानसिक कष्ट यदि किसी को हो जाता है तो उसकी औषधि मिलना असंभव हो जाता है | मनुष्य को अधिकतर शारीरिक कष्ट की अपेक्षा मानसिक ज्यादा होता है , क्योंकि मानसिक कष्ट का कारण हमारे स्वयं के भीतर ही होता है | नित्य मनुष्य अपने लिए मानसिक कष्ट पैदा करता है जिसके कारण नित्य ही मनुष्य में विरोध , ईर्ष्या और असुरक्षा आदि की भावना उत्पन्न होती रहती है | संसार में अधिकतर लोगों के लिए यही पीड़ा का कारण है | मानसिक कष्ट होने का एक कारण मुख्य रूप से और है कि जिसे हम ह्रदय से मानते हैं यदि उसके द्वारा हमारे विपरीत कोई कर्म किया जाता है या कोई ऐसा दोष लगाया जाता है जिसके दोषी हम नहीं होते हैं तो अपार मानसिक कष्ट होता है , जिसकी औषधि इस संसार में नहीं है | मानसिक कष्ट का सबसे बड़ा कारण मनुष्य के अपने विचार होते हैं | मानसिक कष्ट का स्रोत मनुष्य का मन है | हमारे महापुरुषों ने मनुष्य के मन को कूड़ादान की संज्ञा दी है | यह ऐसा कूड़ादान है जिसमें जिसकी जो इच्छा होती है वह कचरा डाल जाता है और हम सब अपने अंदर समाहित करते रहते हैं जबकि यहीं पर विचार करना आवश्यक होता है यह हमें क्या ग्रहण करना है क्या नहीं | अनेक तरह के विचार एवं टिप्पणियों हमें प्राप्त होती रहती हैं जिसे हम अपने मन में रख लेते हैं और उसी पर विचार किया करते हैं और यही विचार बारंबार हमें मानसिक कष्ट पहुंचाते रहते हैं | अतः प्रत्येक मनुष्य को कौन से विचार ग्रहण करने हैं और कौन सा अपने मन से निकाल देना है इस पर विचार करना चाहिए |* *आज संसार में शारीरिक कष्ट से पीड़ित लोग तो मिलते हैं लेकिन उन से कहीं ज्यादा मानसिक कष्ट से पीड़ित लोग समाज में दिखाई पड़ते हैं | यह कहा जा सकता है कि आज पूरी मानवता मानसिक कष्ट से पीड़ित है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यदि इन कारणों पर विचार करता हूं तो यह तथ्य निकलकर सामने आता है कि हमें यदि कोई अनजान व्यक्ति कुछ कह देता है तो हमें उतना मानसिक कष्ट नहीं होता जितना कि उस व्यक्ति के द्वारा कुछ कहने से हो जाता है जिसका स्थान हमारे हृदय में है | ऐसे व्यक्ति के द्वारा यदि हमारे साथ घात किया जाता है या हम को अपमानित करने का प्रयास किया जाता है तो हम मानसिकता से पीड़ित हो जाते हैं | इसका मुख्य कारण उस व्यक्ति के प्रति हमारा मोह है , क्योंकि जिससे मनुष्य को मोंह नहीं होता है उसकी बात को एक झटके में अपने हृदय से निकाल देता है परंतु जहां तनिक भी मोह है वहां पर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं , और बार बार उसी विचार को दोहराते रहते हैं कि हमको अमुक व्यक्ति ने ऐसा कैसे कह दिया | यही हमारे मानसिक कष्ट का कारण बन जाता है जिससे हम पीड़ित होते रहते हैं | जिस प्रकार हम अपने शारीरिक कष्ट के लिए चिकित्सक की शरण में जाते हैं उसी प्रकार मानसिक कष्ट से छुटकारा पाने के लिए अपने मन को ही चिकित्सक बनाकर की आत्म मंथन करने की आवश्यकता होती है , क्योंकि आपके मानसिक कष्ट को मन चिकित्सा से ही मिटाया जा सकता है |* *मानसिक कष्ट मनुष्य के जीवन की दिशा परिवर्तित कर देते हैं | अतः प्रत्येक मनुष्य को इस पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है कि हम कहीं मानसिक कष्ट से पीड़ित तो नहीं हो रहे हैं |*

मानसिक कष्ट

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