सहनशीलता

22 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (82 बार पढ़ा जा चुका है)

सहनशीलता

*इस धराधाम पर मनुष्य का एक दिव्य इतिहास रहा है | मनुष्य के भीतर कई गुण होते हैं इन गुणों में मनुष्य की गंभीरता एवं सहनशीलता मनुष्य को दिव्य बनाती है | मनुष्य को गंभीर होने के साथ सहनशील भी होना पड़ता है यही गंभीरता एवं सहनशीलता मनुष्य को महामानव बनाती है | मथुरा में जन्म लेकर गोकुल आने के बाद कंस के भेजे हुए अनेकानेक राक्षसों का अनाचार सहते हुए बालकृष्ण गंभीर ही बने रहे एवं अपनी गंभीरता दिखाते हुए वे अपने कला कौशल से सभी दैत्यों का संहार करते रहे | भगवान कृष्ण की बात गोकुल में सभी मानते थे यदि वे कहते तो सभी लोग गोकुल / वृंदावन का त्याग करके अन्यत्र कहीं भी जा सकते थे | परंतु उन्होंने "न दैन्यं न पलायनं" की विधा को आधार मानकर वहीं रहते हुए इन दैत्यों का डटकर सामना तो करते ही रहे साथ गम्भीरता से उचित समय की प्रतीक्षा करते रहे | आगे क्या हुआ यह सभी जानते हैं | मनुष्य के जीवन में कई ऐसे पात्र , घटनायें उसको असहज करने वाले होते हैं परंतु मनुष्य को ऐसे समय में स्वयं की गम्भीरता एवं सहनशीलता की परीक्षा लेनी चाहिए | प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि में यह कुसमय होता है | इसी कुसमय में जो क्रोध मोहादि पर विजय प्राप्त करके स्वयं को सम्हाल ले लगा वही महामानव कहलाता है | प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अच्छा व बुरा समय आता रहता है | अच्छा समय तो बहुत जल्दी व्यतीत हो जाता है , परंतु बुरा समय काटना कठिन हो जाता है | जिसे मनुष्य बुरा समय समझता है वास्तव में वही उसके परीक्षा की घड़ी होती है और इसमें प्रत्येक मनुष्य को गम्भीर एवं सहनशील होकर इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना चाहिए |* *आज हम जिस युग में जीवन यापन कर रहे हैं उसे आधुनिक युग कहा जाता है | आज के आधुनिक युग को यदि दम्भी युग कहा जाय तो अतिशयोक्ति ना होगी | आज प्रत्येक मनुष्य अपने दम्भ में छोटों को प्रेम एवं बड़ों को सम्मान देना भूलता चला जा रहा है , परंतु ऐसे में गंभीर व्यक्ति को अपनी गंभीरता बनाए रखना चाहिए | जिस प्रकार घर में सर्प घुस जाने पर लोग अपना घर ना छोड़ करके उस सर्प के निकलने की प्रतीक्षा करते हैं उसी प्रकार यदि किसी के जीवन में ऐसा समय आ जाता है तो उस समय व्यक्ति को गंभीरता का परिचय देते हुए उस समय को व्यतीत हो जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देखता हूं कि जब गांव से कोई हाथी निकल पड़ता है तो अनेक ग्रामसिंह (कुत्ते) उसके विरोध स्वरूप इकट्ठे होकर की उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक भौंकते चले जाते हैं , परंतु वह मदमस्त हाथी अपनी चाल में चलता चला जाता है | यदि वह हाथी एक बार घूम जाय तो उन ग्रामसिंहों का पता ना चले परंतु गम्भीरती बनाए रखते हुए वह हाथी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जाता है | अपने चारों तरफ उठ रही आवाजों का ध्यान न देकर प्रत्येक मनुष्य को उस हाथी की भांति सहनशील एवं गंभीर होकर के अपने लक्ष्य पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए | मैं मानता हूं कि ऐसा कर पाना संभव नहीं हो पाता है क्योंकि कभी-कभी मनुष्य को ऐसे लोग असहज कर देते हैं जिनका स्थान उनके हृदय में होता है | ऐसी स्थिति मैं व्यक्ति उद्विग्न हो जाता है और कभी-कभी वह अपनी गंभीरता और सहनशीलता का त्याग भी करता हुआ देखा जाता है | जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि यही मनुष्य के गंभीरता एवं सहनशीलता की परीक्षा होती है |* *मैं मानता हूं कि ऐसी स्थिति किसी का भी सहज हो पाना संभव नहीं है , परंतु महापुरुषों वही होते हैं जो ऐसी घटनाओं को धूल की तरह झटक देते हैं |*

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