व्यापारी

22 जनवरी 2019   |  मंजू गीत   (10 बार पढ़ा जा चुका है)

हर कोई आज व्यापारी हो गया है। सुख-दुख के तोल में ममता तोल रहा है। ग़म है सिर्फ उसका, फल है ये उसकी करनी का, उसे देखने, सोचने, समझने वाला बोल रहा है। हर कोई आज व्यापारी हो गया है। प्यार को प्रेम समझ कर, अपने घर, आंगन को लांघ, जो दहलीज पार कर गई। आज उसके दिल को नहीं कोई टटोल रहा है। हर कोई आज व्यापारी हो गया है। घर, आंगन मजबूत बनें थे, दिल से शायद वो घर खाली थे, जो घर पाने की ख्वाहिशों में, वो लांघ गई समाज के दायरें,पर ममता ने आज भी उसे बीच भंवर में नहीं छोड़ा है। कहते हैं वो खुद बर्बाद है। हर कोई आज व्यापारी हो गया है। ममता उसके लिए अपनों की नज़रों से रूसवा है, समाज ने नज़रों से तोल लिया। हर किसी ने यह बोल दिया, इसे रहने दो अपनी बनाई दुनिया में, तुम उसे छोड़कर आ जाओ। हर कोई आज व्यापारी हो गया है। दिल खोखले, दिमाग के ढकोसलों में, आज घर सबके बन रहे। रिश्ते नाते दौलत, शौहरत के गुलाम हुए। समाज के तोल में, हर कोई आज व्यापारी हुए। हर किसी की जुबान कभी न कभी कहती है, मुझे समाज से चिढ़ है। आखिर रहना तो इसी समाज में है। खुद कठपुतली बन जाते हैं, समाज की, और बगावत करने वाले को, उसका दोष गिनाते है। हर कोई आज व्यापारी हो गया है। समाज के घुन का शिकार, दिमाग से सोचने वाला, हर कोई व्यापारी हो गया है।

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