अन्तर्यात्रा का रहस्य

22 जनवरी 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (65 बार पढ़ा जा चुका है)

अन्तर्यात्रा का रहस्य

विजय कुमार तिवारी

कर सको तो प्रेम करो।यही एक मार्ग है जिससे हमारा संसार भी सुव्यवस्थित होता है और परमार्थ भी।संसार के सारे झमेले रहेंगे।हमें स्वयं उससे निकलने का तरीका खोजना होगा।किसी का दिल हम भी दुखाये होंगे और कोई हमारा।हम तब उतना सावधान नहीं होते जब हम किसी के दुखी होने का कारण बनते हैं।जब दुख हमें होता है तो बिलखने लगते हैं।इस सन्दर्भ में सन्तों ने बहुत कुछ कहा है और हमारे धर्म-ग्रन्थों में भी लिखा गया है।जीवन में दुख आते हैं और धीरे-धीरे उनसे मुक्ति मिलती है।अपने विगत अनुभवों पर गौर करें तो स्पष्टतः दिखता है कि कोई शक्ति है जो हमें बचाकर बाहर निकाल लाती है और हम सकुशल बच जाते हैं।मुझे तो यह भी समझ में आया है और बार-बार अनुभव हुआ है-दुख बाद में आता है,उससे बचाव की व्यवस्था पहले होने लगती है।मालिक की इस अद्भूत लीला पर मेरा रोम-रोम आह्लादित और कृतज्ञ हो उठता है।

अक्सर हम अपने संघर्ष को दुख मान लेते हैं।एक बीज वृक्ष बनने के पहले कितना संघर्ष करता है? बीज को पहले मिट्टी में गलना-मिटना पड़ता है।बीज टकराता नहीं है वल्कि मधुरता से,प्रेम से अपना मार्ग बनाता है और हरे-हरे कोपल के रुप में उपर निकल आता है।दूब घास को देखिये,पत्थरों के आसपास अपना स्वरुप विकसित कर लेती है।प्रकृति से हमें सीखना है।मैं कोई नयी बात नहीं कर रहा।विद्वानों ने कहा है कि जीवित बचे रहने के लिए स्वयं को लचीला बनाना होगा।वही सुरक्षित रह सकता है जो सामञ्जस्य बिठाता है।जो अकड़ता है उसी पर सारे आक्रमण होते हैं।यदि वह अपने व्यवहार-विचार में बदलाव नहीं करता और सामञ्जस्य नहीं बिठाता तो हानि उठाता है और नष्ट हो जाता है।

धैर्य और प्रेम हो तो कुछ भी असम्भव नहीं है।विरोध की हर स्थिति को अपनी परीक्षा और संघर्ष मानना चाहिए।हर संघर्ष हमें मजबूत बनाता है और हम विजेता बनते हैं।जीवन में बहुत कुछ होता रहता है जिसकी कल्पना तक हमें नहीं होती।आत्मविश्वास के साथ हमें लग जाना चाहिए।कभी भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।इन्हीं संघर्षों से गुजरने के बाद हमें सफलता मिलती है।जो हो रहा है,उसमें ईश्वर की कृपा मानकर चला जाय तो अद्भूत सुखानुभूति होती है।यदि मनोनुकूल नहीं लग रहा तो इसे डाक्टर की कड़ुवी दवाई मानकर ग्रहण कर लेना चाहिए।हमें कृतज्ञता का भाव अपनाना चाहिए और हर व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो हमें कुछ देता है और सिखाता है।हमेशा यह भी मानकर चलना चाहिए कि हमारा अगला मार्ग इस पड़ाव से ही होकर जानेवाला है और मंजिल हमारी प्रतीक्षा कर रही है।कभी मत सोचो कि हम गलत रास्ते पर हैं या कोई गलत व्यक्ति मिल गया है।हमेशा पूर्ण विश्वास रखना चाहिए कि परमात्मा सबकुछ देख रहा है।आज जो भी स्थिति-परिस्थिति है वह हमारी उन्नति और विकास के लिए है।जिसने भी संघर्ष किया उसे सफलता मिली है।अपने विगत जीवन पर निरीक्षण करने से स्पष्ट होता जायेगा कि ऐसे ही हालातों से गुजरते हुए हम यहाँ तक पहुँचे हैं।

सबसे जरुरी है अपनी भावनाओं को गहराई से समझना।अक्सर हम भावनाओं के चलते सही निर्णय नहीं कर पाते और विचलित होकर दुखी होने लगते हैं।

हानि और लाभ का गणित बड़ा विचित्र होता है।जो भी व्यक्ति तात्कालिक लाभ से खुश होता है उसे भविष्य की हानि नहीं दिखती।उसी तरह जो आज की हानि से दुखी है उसे भविष्य का लाभ नहीं दिखता।

हमारी ईच्छा से यदि सबकुछ होता तो यह दुनिया कब की नष्ट हो गयी होती।प्रायः सभी अपने विरोधियों को जीवित देखना नहीं चाहते।कल्पना कीजिए यदि भगवान हमारी ऐसी नकारात्मक भावनाओं के अनुसार होने देता तो क्या यह सृष्टि बची रहती।परमात्मा हमारे कर्मों के आधार पर देता है। यदि हम दुखी हैं तो इसकी जिम्मेदारी हमारी है।परमात्मा के इस विधान को जितना जल्दी हम समझ लें और तदनुसार जीवन जीना शुरु कर दें,उतना ही हमारा भला है,अन्यथा हम दुखी होते रहेंगे और मानसिक बेचैनी में रहेंगे।इस दुख और बेचैनी से निकलना हमें ही होगा। हमें ही मार्ग खोजना होगा।इस सत्य को ना समझ पाने के चलते ही लोग दुख भोगते रहते हैं। हम वर्तमान की हानि में तर्क खोजते हैं,कार्य-कारण की गुत्थी सुलझाना चाहते हैं,जबकि इसका हमारे अनेक जन्मों से सम्बन्ध होता है।जो आज हमारे सुखों का कारण हैं वह अनेक जन्मों से हमारे साथ हैं।हमने उन्हें भी अनेक जन्मों में सुख दिया है।उसी तरह से हमे दुख या हानि देनेवाला भी वही वापस कर रहा है जो हमने कभी उसे दिया है।हम उसी के प्रति ज्यादा चिन्ता करते हैं जो दुख दे रहा है।मेरा मानना है यदि हम इस हानि को झेल नहीं सकते और फिर उसे दुख देने की कोशिश करते हैं तो यह सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होगा और हर जन्म में हम दुखी होते रहेंगे।

प्रेम,भक्ति और त्याग स्वतः जागने लगते हैं जब हम आत्म-चिन्तन करने लगते हैं। यही हमारी अन्तर्यात्रा का रहस्य है।सन्त कहते हैं कि स्वयं को समर्पित कर दो परमात्मा के चरणों में।भीतर उतरो,गहराई में जाओ।यह बाहर का कोलाहल तुम्हें छू नहीं पायेगा।तुम्हारी बेचैनी,दुखानुभूति,तुम्हारा हानि-लाभ का गणितीय ज्ञान तभी तक है जब तक तुम्हारा विश्वास परमात्मा पर नहीं है।जिस क्षण तुमने स्वयं को बदलना शुरु कर दिया, तुम्हारे जीवन में रूपान्तरण होने लगेगा।तुम प्रेमी बन जाओगे। कोई पराया नहीं होगा और भीतर के सारे मलिन भाव लुप्त हो जायेंगे। तुम्हारा हृदय पवित्र हो जायेगा और तुम करुणा,प्रेम की मूर्ति बन जाओगे।परमात्मा का स्थायी निवास तुम्हारे हृदय में होगा।

मुझे ऐसी अनुभूतियाँ हुईं हैं और महसूस करता हूँ कि प्रेम का मार्ग सबसे अच्छा है।जो भी तुम्हें दुखी कर रहा है उसे क्षमा करके देखो। दिल की गहराईयों से क्षमा कर दो। यदि सचमुच तुमने क्षमा करना सीख लिया तो निश्चय जानो परमात्मा तुम्हारे साथ होगा और उसकी कृपा से तुम्हें सबकुछ मिल जायेगा।ईश्वर के पास प्रेम लेकर जाओ,ऐसा सभी कहते हैं।मैं कहना चाहता हूँ-उसके बन्दों से प्रेम करो,उसके जीव-जगत और बनस्पति-जगत से प्रेम करो।अपने दिल से वैर निकाल दो और प्रेम भर लो।इसमें अद्भूत आनन्द है।



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