अपमान एवं सम्मान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

24 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

अपमान एवं सम्मान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *इस संसार में संपूर्ण धरा धाम पर मनुष्य एक दूसरे से जुड़ा हुआ है | मानव जीवन में शब्दों का बड़ा प्रभाव पड़ता है | ऐसे ही दो शब्द मानव जीवन की धारा को बदल देते हैं जिसे अपमान एवं सम्मान के नाम से जाना जाता है | मनुष्य मन के अधीन माना जाता है और मान शब्द मन से ही बना है | यदि विश्लेषण किया जाय तो जो शब्द अपने मन को छुद्र बनाए वह अपमान कहा जा सकता है और जिन शब्दों के द्वारा आप की बड़ाई हो , प्रशंसा हो , वह सम्मान की श्रेणी में आता है | जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन भर इन्हीं दो शब्दों के आसपास घूमता रहता है | हमारे महापुरुषों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि परमपिता परमात्मा प्रत्येक आत्मा में निवास करता है अत: कभी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए ! क्योंकि वह सीधे-सीधे ईश्वर का अपमान हो जाता है | संसार में मनुष्य से मनुष्य का रिश्ता इन्हीं दो शब्दों पर टिका है | जहां भी सम्मान है अर्थात व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपने सामान समझ कर उसे प्रति व्यवहार कर रहा है वहाँ रिश्ते बनते हैं , सुदृढ़ बनते हैं , परंतु जहां व्यक्ति दूसरे को छुद्र समझ रहा है , उसकी उपेक्षा कर रहा है वहां रिश्ते टूट जाते हैं | संसार के संपूर्ण देशों की , समस्त समाजों की और परिपूर्ण परिवारों के रिश्तो का यही शब्द आधार हैं | जो हमें अपने समान समझता है उससे रिश्ते बन जाते हैं और जो हमें छोटा समझता है उस से रिश्ते टूट जाते हैं | पूर्वकाल में माता पिता एवं संतान का रिश्ता इन दो शब्दों से बिल्कुल अलग था , जहां माता पिता संतान को अपना ही अंश मानते थे वही संतान माता-पिता से स्वयं को उत्पन्न मान करके उनका जीवन भर सम्मान करता था | यदि कोई कम ज्ञानी या अपने स्वभाव के अनुसार कर्म नहीं करने वाला होता था तो भी उसे अपने बराबर बैठा करके उस से सामंजस्य बनाने का प्रयास किया जाता था परंतु अब यह संभव नहीं लग रहा है |* *आज जिस प्रकार संस्कारों का लोप होता जा रहा है , मनुष्य अहंभाव से ग्रसित होता जा रहा है , ऐसे में किसी से सम्मान मिल जाना किसी तपस्या के वरदान जैसा ही हो सकता है | आज ऊँचे मंचों पर बैठकर "ईश्वर की सर्वव्यापकता" का उपदेश देने वाले भी कहीं भी किसी का भी अपमान कर देने से नहीं चूक रहे हैं | आज यदि समाज , समूह एवं परिवार टूट रहे हैं तो उसका मुख्य कारण यही कहा जा सकता है कि आज मनुष्य सबसे अपना सम्मान तो करवाना चाहता है परंतु स्वयं अवसर मिलने पर किसी का भी अपमान करने से नहीं चूक रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज थोड़ी सी बात को अपमान एवं सम्मान से जोड़कर मनुष्य अपने निकटतम रिश्तों को भी तिलांजलि देता चला जा रहा है | आज के शिष्य , मित्र एवं संतानें अपने माता - पिता , गुरु एवं मित्रता का सम्मान करने में भी अपना अपमान समझने लगे हैं | किसी को भी कहीं भी अपमानित करके आज का मनुष्य स्वयं को गौरवान्वित मानता है | ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि यह सृष्टि ही "कर्मप्रधान" होते हुए चक्रानुक्रम में चलती है ! यहाँ मनुष्य जो बाँटता उसे वही वापस मिलता है | जब स्वयं का अपमान होता है तो मनुष्य दुखी हो जाता है | ऐसी स्थिति में दुखी न होकरके आत्मचिंतन करना चाहिए |* *किसी को भी अपमानित करके कोई सम्मानित नहीं हो सकता है | अपने रिश्तों को टूटने से बचाये रखने का प्रयास करते रहना चाहिए |*

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