स्त्री-पुरुष

29 जनवरी 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (33 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

स्त्री-पुरुष

विजय कुमार तिवारी


इसके पीछे कुछ कहानियाँ हैं जिन्हें महिलाओं ने लिखा है और खूब प्रसिद्धी बटोर रही हैं।कहानियाँ तो अपनी जगह हैं,परन्तु उनपर आयीं टिप्पणियाँ रोचक कम, दिल जलाने लगती हैं।लगता है-यह पुरुषों के प्रति अन्याय और विद्रोह है।रहना,पलना और जीना दोनो को साथ-साथ ही है।दोनो के भीतर प्रेम,ईर्ष्या आकर्षण और विकर्षण जैसी भावनायें जागती हैं।दोनो में कमोवेश प्रगटन का ज्वार उमड़ता ही है।कोई भीतर ही भीतर सुलगता रहता है और कोई प्रगट कर देता है।यह भी सही है कि ऐसे मामलो मे स्त्रियाँ अधिक धैर्यवान होती हैं,इसीलिये वे बच जाती हैं।पुरुष धैर्यहीन और उतावला होता है,इसलिए जगहँसाई का पात्र बनता है,मान-मर्यादा खो देता है और लम्पट,धूर्त,व्यभिचारी जैसे नाना आभूषणों से नवाजा जाता है।यहाँ पेशेवर चरित्रहीनों की चर्चा नहीं हो रही है।

एक साहित्यिक मित्र हैं-देवेन्द्र और उनकी धर्मपत्नी हैं-सन्ध्या।दोनो खूब पढ़े-लिखे हैं,समझदार हैं और ऐसे हालातों की सटीक व्याख्या करके ज्ञान-चेतना बढ़ाते रहते हैं।देवेन्द्र कभी-कभी आक्रामक हो उठता है और किसी हद तक जाने पर उतारु हो जाता है।सन्ध्या बहुत शान्त है और मुस्कराती रहती है।उसकी बातों का कोई भी कायल हो सकता है।वह हँस कर कहती है,"तुम कितना भी उड़ लो,कितना भी उमड़-घुमड़ लो,तुम्हें शान्ति मेरी धरती पर बरस कर ही मिलेगी।"

वह एक बात और कहती है,"तुम कितना भी सता लो,मारो,पीटो,घर से निकाल बेसहारा कर दो परन्तु तुम्हें शान्ति मुझे अपनाकर और प्यार करके ही मिलेगी।"

सन्ध्या दार्शनिक भाव से कहती है,"संसार की सारी स्त्रियाँ इस रहस्य को जानती,समझती हैं,इसीलिए धैर्य नहीं खोतीं।पुरुष क्रिया करता है और प्रतिक्रिया की उम्मीद रखता है,जबकि स्त्री समर्पण करती है।"

सन्ध्या मुखर होकर कहती है,"जिस किसी पुरुष ने,जब कभी अपनी स्त्री को प्रतिक्रिया के लिए बाध्य किया है,वह टिक नहीं पाता,हार जाता है और उसका विनाश हो जाता है।"

सन्ध्या के चेहरे पर प्रेम सहित मुस्कान उभरती है।वह दयालु हो उठती है और कहती है,"पुरुष स्त्री को समझ कहाँ पाता है?समझने की कोशिश भी नहीं करता।अपनी आक्रामकता दिखाता है और बल से हासिल करना चाहता है।स्त्री विफर उठती है,दुखी होती है और लाचार होकर मुँह मोड़ लेती है।फिर भी उसका विनाश नहीं चाहती,उसका इंतजार करती है,चाहती है कि वह लौट आये और उसका पुरुष बनकर रहे।उसके समर्पण का सम्मान करे।स्त्री जानती है कि परमात्मा ने पुरुष में बल इसलिए दिया है कि वह अपनी स्त्री को सुरक्षा प्रदान करे और अन्य स्त्रियों के प्रति मर्यादा का भाव रखे।"

सन्ध्या की बातों में दम है,सच्चाई है।देवेन्द्र सहमति में सिर हिलाता है परन्तु तर्क देता है,विरोध करता है।उसके नथूने फड़कने लगते हैं,चेहरा लाल हो उठता है और लगता है-कोई ज्वालामुखी फटने वाला है।सन्ध्या को ऐसे हालात से निपटने आता है और उसे वह अपनी गह्वर घाटियों में बहा ले जाती है।वहाँ का सौन्दर्य,वहाँ की उष्मा उसे सुखानुभूति देते हैं।उसे तृप्ति मिलती है और वह शान्त होता है।सन्ध्या अपने समर्पण का सम्मान अनुभव करती है,सुखी होती है और मुस्कराती है।देवेन्द्र को मानो कोई नशा है।शायद विजेता भाव है।सन्ध्या ही नहीं,दुनिया की तमाम स्त्रियाँ अपने पुरुषों को इस तरह जीतने देती हैं।सन्ध्या समझती है कि देवेन्द्र की ऐसी जीत में ही उसकी जीत है।तमाम स्त्रियाँ जानती हैं कि यहाँ कोई नहीं हारता।इसीलिए सभी स्त्रियाँ मुस्कराती हैं।

देवेन्द्र की तन्द्रा लौटती है।वह जागता है और अनुभव करता है कि उसकी चेतना कहीं लुप्त हो गयी थी।वह अपने वश में नहीं था।हारा हुआ महसूस करता है परन्तु स्वीकार नहीं करता।सन्ध्या हँसती है और मन ही मन कहती है,"देवेन्द्र तुम वही पुरुष हो जो हार कर भी सच स्वीकार नहीं करते।"

सन्ध्या संसार की सभी नारियों से याचना करना चाहती है,"पुरुष के बिना हम अधूरी हैं और पुरुष का तो अस्तित्व ही नहीं है हमारे बिना।उसपर लांछन मत लगाओ।उसे समझने की कोशिश करो।वह हमारी कोख में पलता है।उन दिनों और महीनों में हमारे भीतर चल रहे सारे उथल-पुथल का उस पर प्रभाव पड़ता है।हमारी चेतन-अचेतन गतिविधियों से वह अछूता नहीं होता वल्कि उसी से उसके संस्कार बनने शुरु होते हैं।जब उसकी चेतना जागती है तो सबसे पहले वह हमें ही पहचानता है और उसकी दुनिया हम से ही शुरु होती है।उसके सौन्दर्य-बोध की अनुभूति हमसे अलग हो ही नहीं सकती इसलिए वह हमारे सौन्दर्य में खोया रहता है और सुन्दरता देखने-पाने के लिए हमारे आसपास डोलता फिरता है।इसी तरह उसकी सारी भावनात्मक अनुभूतियों का सम्बन्ध हमसे है।किसी ने सही कहा है,"मुझे अच्छी माँए दो,मैं तुझे अच्छा राष्ट्र दूँगा।"

सन्ध्या एक बात और कहती है,"आज हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं और अपने को एक बनावटी दुनिया में सीमित किये बैठे हैं।फलतः तृप्ति के साधन घट गये हैं और जिस परिवेश में रह रहे हैं वहाँ भीड़ और कोलाहल है।जीवन में संघर्ष बढ़ा है,आर्थिक-व्यवस्था चरमरा गयी है और आपाधापी मची है।प्रेम दिल से दिल में उतरता है और एक-दूसरे को उसकी अनुभूति होती है,विश्वास होता है। आज लोग कहते फिरते हैं,मैं प्रेम करता हूँ।यह प्रेम हो ही नहीं सकता।यदि हो भी तो टिकाऊ नहीं होगा।हमें अपने धन और संसाधनों की तरह ही शरीर की रक्षा करनी चाहिए और अपनी भावनाओं की भी। यह काम हम सजग रहकर कर सकती हैं।"

देवेन्द्र को देखते हुए सन्ध्या मुस्कराती है और कहती है," पुरुष तो बच्चे की तरह होते हैं-रोना,मचलना,जिद्द करना,शरारतें करना,तोड़फोड़ करना और हाव-भाव दिखाना उनकी आदते हैं।क्या करती है माँ ऐसे बच्चे के साथ?वह अपने बच्चे को दुत्कारती नहीं और ना ही लांछन लगाती है।वह प्यार करती है और प्यार से ही उसका दिल जीतती है।"

देवेन्द्र भी हँस देता है और कहता है,"यदि ऐसे ही तुम मेरा ध्यान रखा करो, खुद भी खुश रहा करो तो------"

सन्ध्या मुस्कराती है," जीवन में एक-दूसरे के लिए प्यार की कभी भी कमी नहीं होनी चाहिए और लांछन,उलाहना के बिना।"

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