मन का भंवर

31 जनवरी 2019   |  गौरीगन गुप्ता   (31 बार पढ़ा जा चुका है)

मन का भंवर अकस्मात मीनू के जीवन में कैसी दुविधा आन पड़ी????जीवन में अजीव सा सन्नाटा छा गया.मीनू ने जेठ-जिठानी के कहने पर ही उनकी झोली में खुशिया डालने के लिए कदम उठाया था.लेकिन .....पहले से इस तरह का अंदेशा भी होता तो शायद .......चंद दिनों पूर्व जिन खावों में डूबी हुई थी,वो आज दिवास्वप्न सा लग रहा था..... तेरे पर्दापर्ण की खबर सुन किलकारी सुनने को व्याकुल थे....जब तेरे अस्तित्व से वो अपरिचित थे तो जिठानी जी की दुःख वेदना आनन्द में अवतरित हो गई थी.लेकिन लिंग परीक्षण दौरान तेरी पहचान सामने आते ही दोनों के चेहरे मुरझा गये .जिठानी की ममता तो जाग उठती थी लेकिन जेठ जी अपनी बात पर अडिग रहे,उनके फैसले ने मीनू को मंझधार में छोड़ दिया...... हताश हो ..मीनू भाव शून्य चेहरे से अपने भीतर पनपती जिन्दगी को साँसों को शांत करने का निर्णय ले ,अस्पताल के अंदर दाखिल हुई.भीतर-ही भीतर हिचकियाँ समेटती लेकिन आँखों में नदियाँ उमड़ने लगती.असीम दर्द से कराह उठी...अनसूखे अंतर्मन की बैचेनी समन्दर के ज्वर-भाटे की तरह उफनती -दबती.दर्द को अंदर से समेटते हुए निढाल-सी आपरेशन टेबिल पर पसर गई. तभी जडवत हुए शरीर में फडफडाहट हुई.मेरे अंश को मुझसे अलग करने का उपक्रम...मैं कैसी माँ हूँ...मैं अपने ही अंश.... को हाथों में लेना तो दूर....उसे देख भी नही पाऊँगी...इसी अनुभव से दिल दहल उठा..दिलोदिमाग के झंझावत में अपने को मजबूत करती हुई संकल्प लेती हुई एक पल को सोचने लगती...अगर तू आ भी आ...गई तो वो सारी खुशियाँ ना दे पाऊँ जिसकी तू हकदार हैं...मन ममत्व से भर गया...जैसे दो पल रहे हैं..वैसे तीसरा सही...... लेकिन क्षणिक भर में ही किया संकल्प सूखे पत्ते की तरह त्रण-त्रण होकर छितर गया ,सपनों की विचारों की लड़ियाँ टूटकर बिखर गई..... मैं ... क्या करती????तेरी हत्या का सर मत्थे मड रही थी .....एक बेटी को कितने नाजों से पाल रहे हैं और दूसरी इस तरह..... मेरी बच्ची मुझे माफ़ कर देना....लाख मिन्नते करने पर भी तुझे अपनाने वाले चिकने घड़े से बन गये हैं...की गई खुशामदें पानी की बूंदों की तरह बह गई..... अंतर्विद्रोह आंसू के रूप में फूट पड़ा....इसी अन्तर्द्वन्द में कब अचेत हो गई पता ही नही चला....... होश आया तो जिठानी मीनू का हाथ थामे हुए..सांत्वना देती...शायद कुछ कहने को अधखुला मुंह....मन ही मन बुदबुदाकर रह जाती.....कही न कही मीनू की इस मानसिक पीड़ा की कसूरवार अपने आप को ठहरा रही थी.शायद अपनी बात का पश्चाताप भी हो रहा होगा.इसी कशमकश में अपनी भूल को याद कर रही होगी...कि मुझे तो अपने अंगन में बच्चे की किलकारियां सुननी थी..फिर वो बेटा होता या ..

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