नक्षत्र - एक विश्लेषण

01 फरवरी 2019   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

नक्षत्र - एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मृगशिर और पौष माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज माघ और फाल्गुन माह…

माघ : इस माह में दो नक्षत्र – आश्लेषा और मघा उदय होते हैं, जिनमें मघा नक्षत्र प्रमुख होता है | इसीलिए इसका नाम “माघ” पड़ा | इसका वैदिक नाम है “तपस” जिसका शाब्दिक अर्थ है तपस्या करना, साधना करना अथवा किसी कार्य में कुशलता प्राप्त करने के लिए उसका अभ्यास करना | गर्मी के लिए, तपने के लिए, तेज के लिए, जलाने के लिए, अग्नि के लिए और सूर्य के लिए भी तपस तथा माघ शब्दों का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है | वसन्त ऋतु का आरम्भ भी माघ माह की शुक्ल पञ्चमी – जिसे हम वसन्त पञ्चमी के नाम से जानते हैं – से माना जाता है |

इस माह में “कल्पवास” का विशेष महत्त्व माना जाता है | संगम के तट पर निवास करने को कल्पवास कहा जाता है | वेदों में यज्ञ यागादि को कल्प की संज्ञा दी गई है | अर्थात इस माह में संगम के तट पर वास करके साधक के द्वारा यज्ञ यागादि का साधन करना साधकों के लिए बहुत श्रेष्ठ माना जाता है | यह कल्पवास पौष शुक्ल एकादशी से आरम्भ होकर माघ शुक्ल द्वादशी तक चलता है | कहा जाता है कि माघ मास में जो व्यक्ति तीन बार प्रयाग में संगम में स्नान करता है उसे इतना पुण्य प्राप्त होता है जितना दस सहस्र अश्वमेध से भी प्राप्त नहीं होता : “प्रयागे माघमासे तुत्र्यहं स्नानस्य यद्रवेत् | दशाश्वमेघसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि ||”

फाल्गुन : दोनों फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों का उदय इस माह में होने के कारण इसका नाम फाल्गुन पड़ा – जिसे आँचलिक बोलियों में फागुन भी कहा जाता है | नाम से ही स्पष्ट है कि इस माह की पूर्णिमा को दोनों फाल्गुन नक्षत्र में से किसी एक नक्षत्र विद्यमान होता है | इसका वैदिक नाम है “तपस्या” अर्थात जो तपस के बाद आए | तपस्या शब्द के भी शाब्दिक अर्थ वही हैं जो तपस के हैं – तप करना, साधना करना, अभ्यास करना, गर्म करना, जलाना, गर्मी से जो उत्पन्न हो इत्यादि |

वैदिक पञ्चांग के अनुसार चैत्र माह से आरम्भ होने वाले सम्वत्सर यानी वर्ष का अन्तिम बारहवाँ मास फाल्गुन मास है | इस पूरे मास भर वसन्त ऋतु विद्यमान रहती है – न अधिक सर्दी होती है न ही अधिक गर्मी – बड़ा औहावना मौसम इस समय रहता है | इसीलिए इस माह में अनेक पर्व मनाए जाते हैं – जिनमें प्रमुख है होली और महा शिवरात्रि |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/01/constellation-nakshatras-36/

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