उद्यापन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

02 फरवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (31 बार पढ़ा जा चुका है)

उद्यापन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *सनातन धर्म में समस्त मानव जाति को सुखी बने रहने के अनेकानेक उपाय बताये गये हैं | वैसे तो मनुष्य को सुख एवं दुख उसके आचरण के अनुसार ही प्राप्त होते हैं | हमारे ऋषियों ने प्रत्येक मनुष्य को सुखी रहने के लिए धर्म का पालन करने का निर्देश दिया है | धर्मपालन के कई अंग हैं उनमें सबसे सरल है व्रत करना | कोई भी व्रत किया जाय तो प्रत्येक वर्ष उस व्रत का उद्यापन करने का विधान भी बताया गया है | उद्यापन अर्थात नवीनीकरण करके व्रत का पालन पुन: पूर्व की भाँति करता रहे | उद्यापन किये बिना किसी भी व्रत का नहीं शुभ फल नहीं प्राप्त होता है | व्रत करना आसान है लेकिन व्रत पूरे होने पर उद्यापन भी करने की भी आवश्यकता होती है | कहने का तात्पर्य यह है कि बिना उद्यापन किया व्रत निष्फल ही रहता है इसलिये जरूरी है कि व्रत का उद्यापन किया जाये | भले ही किसी परिजन या परिचित को न बुलाया जाये या बहुत बड़ा आयोजन न करें, लेकिन योग्य ब्राह्मण से व्रत उद्यापन की विधि को संपन्न करना चाहिये | "निर्णय सिंधु" में यह वर्णन मिलता है कि :- "उद्यापनं विना यत्रु तद् व्रतं निष्फलं भवेत" अर्थात किसी भी व्रत का यदि उद्यापन न किया जाय तो उस व्रत का मनोवांछित फल नहीं प्राप्त हो सकता है , अत: किसी भी व्रत का पालन किया जाय तो उस व्रत का वार्षिक उद्यापन उतना ही आवश्यक है जितना कि व्रत करना | जिस प्रकार हम किसी भी वार्षिक त्यौहार पर नवीन हर्षोल्लास से ओतप्रोत होकर वह त्यौहार मनाते हुए नवजीवन की अपेक्षा करते हैं उसी प्रकार किसी भी व्रत का नवीनीकरण उद्यापन के माध्यम से किया जाता रहा है |* *आज के वर्तमान युग में जहाँ मनुष्य कोई भी व्रत - अनुष्ठान निष्काम भाव से करना ही चाहता वहीं किसी भी धार्मिक कृत्य का फल भी तुरंत चाहता है परंतु वह उसे प्राप्त नहीं हो पा रहा है | इसका प्रमुख कारण है कि आज के मनुष्यों के द्वारा धार्मिक कृत्य किये तो जा रहे हैं परंतु उनमें भावना कम एवं दिखावा अघिक ही रहता है साथ ही किसी भी धार्मिक कृत्य के विषय में जानकारी का अभाव भी एक कारण बन जाता है | जिस प्रकार किसी नदी को पार करने के लिए उसकी गहराई को मापना आवश्यक होता है उसी प्रकार किसी भी विधान को अपनाने के पहले उसके विषय में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर लेना ही श्रेयस्कर होता है | मैं " आचार्य अर्जुन तिवारी" प्राय: देखता हूँ कि लोग शिकायत करते रहते हैं कि मैंने इस व्रत का पालन किया परंतु उसका यथोचित फल नहीं प्राप्त हुआ | इस विषय पर मैं यही कहना चाहूँगा कि लोग व्रत का मतलब यह समझते है कि व्रत करने से ही ईश्वर प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाओं को पूरा कर देगा | व्रत करने के लिये न केवल मन और तन शुद्ध होना चाहिये वही व्रत करने के पीछे किसी प्रकार का लालच भी नहीं करें | इसके साथ ही किसी भी व्रत का पालन करने के बाद उसका उद्यापन भी करते रहना चाहिए | उद्यापन का अर्थ व्रत का समापन नहीं बल्कि व्रत नवीनीकरण करते हुए वर्षपर्यन्त हमसे जो सम्भव हो सका वह करने के बाद समर्पण करने की प्रक्रिया होती है |* *व्रत के पालन से अधिक आवश्यकता होती है व्रत के उद्यापन की | समय समय पर यह करते रहना चाहिए |*

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