2019 के लोकसभा चुनाव केे बाद ‘‘एनडीए’’ के प्रधानमंत्री क्या नितिन गडकरी होगें?

02 फरवरी 2019   |  राजीव खण्डेलवाल   (30 बार पढ़ा जा चुका है)

2019 के लोकसभा चुनाव केे बाद ‘‘एनडीए’’ के प्रधानमंत्री क्या नितिन गडकरी होगें?

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आरएसएस के करीबी, कॉर्पोरेट और व्यापार जगत के चहेते और केन्द्र की मोदी सरकार के नियत अवधि में अपेक्षित परिणाम देने वाले सड़क परिवहन, जहाज रानी व गंगा सफाई विभाग के मंत्री नितिन गडकरी केे पिछले कुछ समय से जो बयान आ रहे है वे निश्चित रूप से सामान्य से हट कर रहे हैं। गडकरी के मन की बात की कुछ बानगिया निम्नानुसार हैंः-

पहला 4 अगस्त 2018 के ‘‘आरक्षण देकर क्या होगा नौकरियां ही नहीं है’’। दूसरा अक्टूबर 2018 में ‘‘भरोसा नहीं था जीतेगें, तो बडे़ वादे किए, लेकिन जीत गए’’। तीसरा 23 दिसम्बर 2018 को एक कार्यक्रम में उन्होने कहा, ‘‘यदि मैं पार्टी का अध्यक्ष हंू और मेरे सांसद और विधायक अच्छा नहीं करते है, तो कौन जिम्मेदार होगा’’? मुझे नेहरू के भाषण पसंद हैं, कहते हुये उन्होने कहा कुछ ‘‘सिस्टम को सुधारने के लिए दूसरे की तरफ उंगली क्यों करते हो, अपनी तरफ क्यों नहीं करते हो। जवाहर लाल नेहरू कहते थे ‘‘इंडिया इज़ नॉट ए नेशन. इट इज़ ए पॉपुलेशन, इस देश का हर व्यक्ति देश के लिए प्रश्न है, समस्या हैं, तो मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि मैं स्वयं देश के सामने समस्या नहीं बनूंगा’’। तीन विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा, सफलता के कई दावेदार होते है, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता। ‘‘सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं। नेतृत्व को हार व विफलता की भी जिम्मेदारी स्वीकार करने चाहिए’’। एक टीवी कार्यक्रम को दिये साक्षात्कार में गडकरी ने कहा ‘‘हमारे पास इतने नेता हैं, और हमंें उनके सामने बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हे कुछ काम देना हैं। उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘‘कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर मुंह बंद करने की जरूरत है’’। अभी हाल ही मंे यह बयान आया है कि सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओं जो पूरे हो सकें गडकरी ने कहा कि मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं मैं जो बोलता हूं वो 100 फीसदी डंके की चोट पर पूरा करता हूं। ये समस्त बयान निश्चित रूप से भाजपा की संस्कृति से न तो मेल खाते है और न ही भाजपा की आंतरिक कार्य पद्धति में सामान्य या असामान्य रूप से ंसंभव होते हैं। मतलब साफ है, संघ प्रमुख को विश्वास में लिये बिना या उनकी मूक सहमति या इशारों के बगैर ऐसे बयान संभव नहीं है।

याद कीजिए भाजपा की कार्यप्रणाली जनसंघ के जमाने से जहां स्थापित पार्टी लाईन के बाहर जाकर जिसने भी कोई प्रश्न वाचक चिन्ह लगाया है, नेतृत्व पर उंगली उठाई है या नीतियों अथवा नीतिगत फैंसलों पर प्रश्न किया है उन्हे या तो पार्टी के बाहर ही कर दिया गया या उनके पर कतर दिये गये या (मार्गदर्शक मंडल बनाकर) उन्हे एक कोने में बैठा दिया गया। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष पीताम्बरा दास, बलराज मधोक से लेकर लालकृष्ण आडवानी तक, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुश्री उमा भारती आदि ऐसे अनेक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने है। इस वास्तविकता के बावजूद नितिन गडकरी ने जो कुछ भी विभिन्न अवसरो पर कहने की हिम्मत की, वह सत्यता है। लेकिन भाजपा के आज के राजनैतिक परिवेश में कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितने ही उच्च ओहदे पर क्यों न हो, आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बिना ऐसा (दुः)साहसी कदम नहीं उठा सकता। इसीलिए ऐसा भासित होता है कि भविष्य की स्थिति का आकलन कर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद उत्पन्न होने वाली आशंका पूर्ण (आशा पूर्ण नहीं) स्थिति का मुकाबला करने के लिए नितिन गडकरी को आगे कर उन्हे एनडीए के प्रधानमंत्री पद की ओर अग्रेसित किया जा रहा है। इसका स्वागत भी किया जाना चाहिये। भविष्य के दुष्परिणाम की आशंकाओं को महसूस /स्वीकार करके राजनीति में जब योजना बद्ध दूर-दृष्टि की नीति अपनाई जाती है, तभी उस विपरीत स्थिति से सफलतापूर्वक निपटा जा सकता हैं। संभवतः संघ की इसी मंशा के अनुरूप नितिन गडकरी के उक्त बयान आये हों।

उक्त सच्चाई को मानते हुये ही शायद कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा गडकरी जी के बयान पर मैं एक हिन्दी की कहावत याद कराना चाहता हूं ‘‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’’ याने उनकी निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहती है, और निशाने पर प्रधानमंत्री हैं।

अगला लेख: ‘‘कुंभ’’ ‘‘महाकुंभ’’ और ‘‘अर्धकुंभ’’ में क्या कोई अंतर हैं?



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