आरक्षण बनाम संरक्षण

07 फरवरी 2019   |  pradeep   (37 बार पढ़ा जा चुका है)

हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद 1950 में हिदुस्तान का सविधान लागू हुआ, और उसमे दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. दलितों और आदिवासियों का आरक्षण सामाजिक असमानता की वजह से किया गया था ना की आर्थिक असमानता की वजह से किया गया था. आर्थिक असमानता हर जाति और हर मज़हब में हो सकती है पर सामाजिक असमानता केवल और केवल एक वर्ग विशेष के लिए थी. ऐसा वर्ग जिसे जानवर से भी बदत्तर माना जाता था. हज़ारो साल जिनको जीने के मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा गया. ऐसे पिछड़े वर्ग को आगे लाने और उनको सामान अधिकार दिलाने के लिए इस आरक्षण की व्यवस्था की गई थी ना की आर्थिक असमानता के लिए. उसके लिए अलग वयवस्था थी गरीबी उन्मूलन की, गरीबो की मदद की. स्वर्णो को कभी भी अच्छा नहीं लगा दलितों का उत्थान, और वो इस आरक्षण का विरोध करते रहे. सबसे बड़ा उनका दावा था कि आरक्षण से स्तर में गिरावट आएगी. यह स्तर में गिरावट आएगी बात बिलकुल सही है कुछ ऐसे क्षेत्र है जहाँ आरक्षण नहीं दिया जा सकता पर कही भी आरक्षण ना दिया जाए तो वो दलित, आदिवासी समाज का उत्थान कैसे होगा, इस सब को ध्यान में रख कर आरक्षण दिया गया था. फिर आरक्षण राजनीति का दावं बन गया जिसे पहली बार वी. पी सरकार ने इस्तेमाल किया ओबीसी को आरक्षण देकर. ओबीसी के दावेदार जो खुद हमेशा से बहुत मज़बूत स्थिति में थे पर शायद वक्त के साथ आर्थिक असमानता के शिकार हुए या खुद शैक्षिक आधार पर समाज में निम्नस्तर पर पहुंचे हो, पर उनके साथ कभी भी सामाजिक अन्याय नहीं हुआ फिर भी वी पी सिंह ने अपने डोलते सिंहासन को बचाने के लिए ओबीसी का इस्तेमाल किया . आज मोदीजी का सिंहासन डोलने लगा तो आर्थिक पिछड़े स्वर्णो को आरक्षण दे दिया. जो लोग आरक्षण का विरोध करते थे कि उससे पढ़ाई या काम के स्तर में गिरावट आएगी आज उनके मुँह में दही जम गया. आर्थिक असमानता विश्व के हर देश में है और उसके लिए किसी देश में आरक्षण नहीं है, सिर्फ आर्थिक पिछड़े लोगो के लिए आर्थिक सुविधाय दी जाती है. सामाजिक असमानता किसी देश में नहीं है इसलिए इस तरह का आरक्षण भी नहीं है. हिन्दुस्तान को यदि बर्बाद किया है तो मनुवादी व्यवस्था ने और इस व्यवस्था के दोष को ख़त्म करने के लिए आरक्षण आवश्यक है पर सिर्फ और सिर्फ सामाजिक असमानता के लिए ना की आर्थिक असमानता के लिए. आर्थिक असमानता के लिए गरीबी उन्मूलन योजना की आवश्यकता है ना की आरक्षण की. हिन्दुस्तान में हज़ारों साल की मनुवादी सोच से आज भी मुक्ति नहीं मिली , आज भी दलितों पर अत्याचार हो रहा है, स्वर्ण ही नहीं उनके खुद के नेता भी राजनीति और सत्ता की दौड़ में उनके समानता के अधिकार के लिए कुछ नहीं कर रहे. सत्ता में कैसे बने रहे यही उनकी चिंता है. आज ज़रूरत है हिन्दुस्तान के युवा वर्ग के जागने की अगर आज भी वो उस समाज को जो हज़ारो साल से प्रताड़ित हो रहा है उसके उत्थान के लिए कुछ नहीं करेंगे तो हिन्दुस्तान विश्व गुरु तो क्या बनेगा सिर्फ लेबर सप्लाई का देश बना रहेगा. पहले ड्राइवर या लेबर के काम के लिए हिन्दुस्तानी विदेश जाते थे और अब आई टी लेबर के नाम पर. इसलिए यह समझना होगा कि आरक्षण और संरक्षण में फर्क होता है. पिछड़े वर्गों के लोगो को आरक्षण चाहिए और आर्थिक पिछड़े लोगो को संरक्षण यानी वित्तय सहायता.

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