दाम्पत्य जीवन में व्यवहारिक सोच

10 फरवरी 2019   |  श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव   (114 बार पढ़ा जा चुका है)

दाम्पत्य जीवन में व्यवहारिक सोच

आप चाहे गांव या कस्बे के मध्यवर्गीय परिवार के पढ़े-लिखे व्यक्ति हों अथवा महानगर के किसी संपन्न कुलीन परिवार के सदस्य हों या फिर सामान्य आर्थिक स्तर के कोई अधिकारी अथवा व्यापारी, इस सत्य को मन-ही-मन स्वीकार कर लें कि दाम्पत्य जीवन की सफलता का सीध संबंध पति-पत्नि के आपसी रिश्तों से होता है। पति-पत्नि में यह भावनात्मक जुड़ाव और सेवा भावना जितनी अधिक होगी, संबंधों में दृढ़ता उतनी ही अधिक होगी।

विवाह के बाद स्त्री गृह कार्य का संचालन कर गृहलक्ष्मी बन जाती है और पुरूष परिवार का संरक्षक बन परिवार का कर्ता बन जाता है घर के कामों में दोनों ही एक-दूसरे का सहयोग करने लगते हैं। किसान दिन भल हल चलाकर खेती करता है, तो पत्नि उसका भोजन लेकर कुंए-खेत पर आती है। लेकिन यह रही पुरानी बातें अब समय बदल गया है, तो भी पत्नि ही घर को सजाती-संवारती है। पारिवारिक अपेक्षाओं की पूर्ति करती है। आर्थिक आवश्यकताओं के लिए उच्च जीवन-यापन की इच्छा के लिए अब उसने नौकरी करना भी प्रारंभ कर दिया है। पत्नि की मान-प्रतिष्ठा तभी बढ़ती है, जब वह अपनी पारिवारिक अपेक्षाओं की पूर्ति करने लगती है। चाहे वह नौकरी करते हुए इसे निभाये। यदि उसके नौकरी करने से दाम्पत्य जीवन पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता अथवा तो और मधुरता आती है, वह पति की सहयोगी बन उसके कंधे से कंधा मिलाकर उसे सहयोग देती है तो इस व्यवहार में दोष नहीं देखा जा सकता है।

दाम्पत्य संबंधों मेंं निकटता लाने के लिए पति-पत्नि को अपनी सोच में हमेशा नया पन लाते रहना चाहिए। पति-पत्नि को चाहिए कि वे एक-दूसरे के अच्छे कार्यों, गुणों की प्रशंसा करें। प्रशंसा से आशय केवल उसके रूप-सौंदर्य की प्रशंसा नहीं, बल्कि उनके उन कार्यों की प्रशंसा से है, जिससे पति अथवा पत्नि की मान-प्रतिष्ठा बढ़ रही है।

स्त्री का बहु रूप उसके ससुराल परिवार का केन्द्र बिन्दु होता है। अपने इस रूप के कारण ही उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। परिवार के हर सदस्य की अपेक्षाएं उसी से जुड़ी रहती हैं। एक तरह पति की इच्छाओं का सम्मान तो दूसरी ओर परिवार में सास-ससुर, नंद,देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी और उनके बच्चों आदि की रूचियों, इच्छाओं और मर्यादाओं सभी का ध्यान भी रखना पड़ता है। यही स्त्री का बहु रूप में प्रमुख कर्तव्य होता है। यही कर्तव्य उसके अच्छे व्यवहार का परिणाम भी होता है।

दाम्पत्य जीवन में मधुरता लाने के लिए पति-पत्नि दोनों को जीवन की कठोर वास्तविकताएं स्वीकार करना चाहिए। हर विषम परिस्थिति में किसी को अकेला छोड़ना दाम्पत्य संबंधों पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है। हमेशा एक – दूसरे से सलाह लें और उसे स्वीकार भी करें। दोनों परिवार और अपने भविष्य की योजनाएं मिलकर करें। सबसे जरूरी बात जिद पर न अड़े अथवा संबंध तोड़ लेने की हदों तक न पहुंचे। यह सभी बातें यदि दोनों पति-पत्नि ध्यान में रखें तो अपने दाम्पत्य जीवन में खुशियां लाने से कोई नहीं रोक सकता।

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