आत्म-बोध

15 फरवरी 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (40 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

आत्म-बोध

विजय कुमार तिवारी

"आज कुछ ज्यादा ही उद्वेलित लग रही हो,सब सकुशल है ना?"गुरुदेव रमा को स्नेह से देखते हुए मुस्कराये।

"आपसे मेरा कुछ भी गोपन नहीं रह पाता,"पूर्ण समर्पण का भाव दिखाते हुए रमा हँस पड़ी,"आपकी गहरी दृष्टि मेरे दिल को धड़का देती है और मैं आपकी आँखों की चमक से हिरणी की तरह भयभीत होने लगती हूँ और सम्मोहित भी।"

गुरुदेव मुस्कराये।

रमा की पलकें उन्मिलित हो स्वतः झुक गयीं।गौरवर्णीय चेहरे पर उभर आये स्वेद-कणों को उसने अपने आँचल से पोंछा और गुरुदेव के तनिक समीप ही जमीन पर बैठ गयी।

"पहले पानी पी लो,"गुरुदेव ने बगल के टेबुल पर रखे हुए जग और गिलास की ओर संकेत करते हुए कहा,"तुम प्यासी लग रही हो रमा।"

"हाँ, मैं बहुत प्यासी हूँ गुरुदेव,"रमा ने गहरे भाव से उन्हें देखा और उठ खड़ी हुई।उसने जग से पानी गिलास में डाला परन्तु कुछ सोचकर गिलास को वहीं रख दी।

"क्या हुआ?"

"नहीं,यह आपका गिलास है गुरुदेव।मुझे पाप लगेगा।"रमा ने उन्हें देखा मानो बहुत बड़ा अपराध होते-होते रह गया हो।

"तुम भी तो मेरी हो रमा,"गुरुदेव के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान फैल गयी।

रमा ने मन ही मन सोचा,"काश मैं आपकी अनुगामिनी हो पाती और आपके बताये मार्ग पर चल पाती।"

"आजकल देवव्रत नहीं दिखाई दे रहा,किस दुनिया में खोया हुआ है?"गुरुदेव के प्रश्न से मानो वापस लौटी हो,उसने सहजता से उनकी ओर देखा।

"तुम कुछ सोच रही हो?"गुरुदेव ने पूछा।

"सारी समस्यायें उसी को लेकर हैं गुरुदेव,"रमा ने चेहरे पर उभर रही चिन्ता की रेखाओं को सामान्य करते हुए कहा,"मेरी बातों को समझना ही नहीं चाहता।देश-भक्ति का ज्वार उमड़ता रहता है उसकी शिराओं में।आज के हालात पर बहुत दुखी होता है और कहता है-इतना पतित कैसे हो सकते हैं लोग?"

गुरुदेव सहसा गम्भीर हो गये और उपर छत की ओर देखते हुए बोले,"ऐसी आत्मायें परमात्मा के आदेश से धरती पर आती हैं।ये मशाल की तरह होती हैं,लोगों को ज्ञान का प्रकाश देती हैं।शेष असंख्य लोग अंधेरे में हैं और सारी व्यवस्थाओं को तहस-नहस करते रहते हैं।"

"तभी तो वह मुझे अच्छा लगता है परन्तु उसको लेकर बहुत चिन्ता होती है।शुरु से ही ऐसा है।उसकी बातें चमत्कृत करती हैं,जोश जगाती हैं और स्वयं से उपर उठकर चिन्तन करने को प्रेरित करती हैं।"

गुरुदेव ने अनुमोदन करते हुए कहा,"वह एक संस्कारी आत्मा है और उसका ध्येय उत्तम है।"

"भय होता है गुरुदेव।उसकी विचारधारा को लोग पसन्द नहीं करते।उसका विरोध होता है।अक्सर वह अकेला पड़ जाता है,"रमा ने बेचैनी में कहा।

"फिर भी देवव्रत डिगता नहीं,बदलता और झुकता नहीं क्योंकि उसे आत्म-विश्वास है और वह जानता है कि उसका मार्ग सही है,"गुरुदेव ने कहा,"उसके लिए भय मत करो,परमात्मा उसके साथ हैं।"

रमा के चेहरे पर सन्तोष उभरा और वह मुस्करा उठी,"आप कृपा बनाये रखें गुरुदेव।"

"तुम अभी भी कुछ छिपा रही हो?"गुरुदेव ने धीरे से रमा से कहा और पीछे मुड़कर किसी को पुकारा।एक युवा के उपस्थित होने पर उन्होंने आदेश दिया,"रमा के लिए जलपान और हम दोनो के लिए चाय की व्यवस्था करो।"

"आपसे कुछ भी छिपा नहीं है गुरुदेव,"रमा ने सिर झुकाये कहना शुरु किया,"मैंने घर में अपने दिल की बात बता दी है परन्तु देवव्रत अभी कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं है।उसकी बातें अपनी जगह सही लगती हैं परन्तु मेरा मन सशंकित हो उठता है।"

थोड़ा रुककर रमा ने कहा,"उसका चिन्तन तो वहाँ से शुरु होता है कि आर्यो के देश का ऐसा पतन कैसे होता गया?मैंने बारहा उसे पुस्तकालयों की प्राचीन पुस्तकों में माथापच्ची करते देखा है।अनार्य आर्यो के विरोधी होते गये और उनका आचरण-व्यवहार इनके विपरीत था।आक्रान्ता के रुप में जो आये उनका उद्देश्य ही रहा कि यहाँ की संस्कृति-सभ्यता को नष्ट किया जाय।देवव्रत एक बात और कहता है--स्वतन्त्र होने के बाद भी हमारी सरकारें उन्हीं रास्तों पर चली हैं और स्थिति को सुधारने के बजाय और बिगाड़ कर रख दिया है।"

गुरुदेव चुपचाप सुनते रहे और गम्भीर मुद्रा में बैठे रहे।सहसा रमा मौन हो गयी और वहाँ नीरव शान्ति व्याप्त हो गयी।मौन तब टूटा जब

चाय पीते हुए उन्होंने कहा,"किसी दिन देवव्रत को साथ ले आना।"

रमा के जाने के बाद बहुत देर तक गुरुदेव चिन्तन करते रहे और स्वतन्त्रता आंदोलन के दिनों की सुनी हुई कहानियाँ याद करते रहे-तब यह देश कितना एक था,लोग एक होकर संघर्ष कर रहे थे। जाति-धर्म,उँच-नीच जैसी बातें नहीं थीं। ऐसा कैसे हो गया कि दुनिया के तमाम देश विकसित होते गये और हम पिछड़ते गये।

रमा की भेंट देवव्रत से उस मोड़पर हुई जहाँ वह किसी बस की प्रतीक्षा कर रहे थे।रमा ने मुस्कराकर अभिवादन किया और बोली,"गुरुदेव आपको याद कर रहे हैं।"

"हाँ,मैं भी मिलना चाहता हूँ गुरुदेव से,"देवव्रत ने भी उत्सुकता दिखाते हुए कहा,"आप गयीं थीं क्या उनका दर्शन करने?"

"हाँ,आज ही गयी थी,"रमा ने किंचित खुश होते हुए कहा।

"बहुत खुश लग रही हो?"देवव्रत गहरी दृष्टि से रमा को देखते हुए मुस्कराया।

"अच्छा लगा कि गुरुदेव ने आपके बारे में पूछा,"रमा ने भी मुस्करा कर कहा। शर्म की लाली उभर आयी उसके चेहरे पर और पलकें उठकर झुक गयीं।

देवव्रत को याद आया-रमा की ऐसी ही मुस्कान पर वह प्रभावित हुआ था जब दोनो पहली बार मिले थे।दोनो के विचारों,पसन्द-नापसन्द और प्राथमिकताओं में बहुत समानता है।देवव्रत जानता है कि रमा में धैर्य है और जीवन को सुन्दर बनाये रखने की अद्भूत क्षमता।रमा को पता है कि देवव्रत का दिल बहुत अच्छा है और वह एक नेक इंसान है।अच्छाई के लिए उसमें जुनून सवार हो जाता है।वह किसी को धोखा नहीं दे सकता।

देवव्रत ने कहा,"रमा,चलो कहीं बैठकर काॅफी पीते हैं।"

"आप कहीं जाने वाले थे?"रमा ने औपचारिकता बस पूछ लिया।मन ही मन खुश हुई और भीतर उमड़ आये भावों को दबाते हुए उसने प्यार से देवव्रत को देखा।

"आज की शाम तुम्हारे नाम,"देवव्रत ने उसके मुस्कान-युक्त सौन्दर्य में डूबकी लगाते हुए रमा को आमन्त्रित किया।मौसम बहुत सुहावना हो चला था और दोनो एक-दूसरे के करीब हो आगे बढ़ चले।

आत्मीय अनुभूति की प्रीतिकर भावनाओं में खोयी रमा को देवव्रत ने बहुत स्नेह से देखा,"कहाँ खो गयी?कुछ और लेना चाहोगी?"

"बस काॅफी ही,"रमा ने धीरे से कहा,"आप चाहें तो कुछ और ले लीजिए।"बस इतना ही कह पायी जबकि कहना चाहती थी कि आप अवश्य कुछ और ले लीजिए।उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी वाणी उसका साथ नहीं दे रही है और अपना सही भाव व्यक्त नहीं कर पा रही है।उसकी आँखें भर आयी।उसने देवव्रत को देखा-कितना भोला लग रहा है।रमा को लगा,शायद उसे भी ऐसी ही अनुभूति हो रही होगी।शरारत भरी स्मित मुस्कान के भाव चेहरे पर उभरे और उसे विचित्र सुखानुभूति हुई।

साथ ही उसे ऐसा भी लगा कि देवव्रत को पुनः कोई बात याद गयी है और वह अधीर हो उठा है।उसने अपनी काॅफी थोड़ी तेजी से खत्म की और उठ खड़ा हुआ।रमा अब इन बातों की अभ्यस्त हो चुकी है।दोनो बाहर निकले और मन्दिर की ओर बढ़ चले। झील की सीढ़ियों से होते हुए वे दूर किनारे तक गये और बैठ गये।देवव्रत के चेहरे पर गम्भीरता छायी थी जिसे वह बनावटी मुस्कान से ढकना चाह रहा था।

"क्या बात है?"रमा ने धीरे से पूछा।

"आज तुम्हें जरुर बताऊँगा रमा," उसने कहा,"हमारी जनता बहुत भोली है और कुछ लोग बहुत मक्कार।"

रमा को समझते देर नहीं लगी कि देवव्रत ऐसे ही चिन्तन में उलझा हुआ है। उसने हामी भरी और हँस पड़ी।

"तुम्हें चिन्ता नहीं होती कि सभी दल एक हो रहे हैं जो हमेशा एक-दूसरे के विरोध में राजनीति करते रहे?"देवव्रत ने अपनी चिन्ता में रमा को भी शामिल करना चाहा।

रमा हँस पड़ी,"गुरुदेव के सामने इस विषय पर बातें करेंगे।आप चाहें तो कल ही चलें हम लोग।उनका मार्गदर्शन भी मिलेगा और दर्शन भी।"

"बातों को टालना कोई तुमसे सीखे,"देवव्रत भी हँस पड़ा।

"आज बहुत दिनों बाद हम मिले हैं।फोन पर बातें करना आपको पसन्द नहीं।जब से घर में मैंने आपके बारे में बातें की है,एक अघोषित दबाव महसूस करती रहती हूँ।पिता जी की आँखों में बेचैनी देखती हूँ।समझ में नहीं आता कि क्या करु?"

"तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं है क्या ?"सहसा देवव्रत गम्भीर हो गया।उसने भीतर कुछ ज्वार सा महसूस किया और रमा का हाथ थाम लिया।

रमा चौंक सी गयी परन्तु उसने अपना हाथ नहीं छुड़ाया। उसे विचित्र सी सिहरन महसूस हुई और रोमांचित हो उठी।उसने धीरे से कहा," आप कभी भी ऐसा नहीं सोचें।मुझे अपने आप से भी ज्यादा आप पर विश्वास है।"थोड़ा रुक कर उसने कहा,"यदि अन्यथा ना लें तो एक निवेदन करना चाहूँगी।"

"तुम्हारी बातों को अन्यथा लेने का सवाल ही नहीं है रमा।तुमने कभी कोई ऐसी बात नहीं की है कि अन्यथा लिया जाय।मैं जानता हूँ कि तुम मेरे जीवन को हर तरह से सजा-सँवार दोगी। मैं खुद ही अस्त-व्यस्त,बेतरतीब आदमी हूँ।"देवव्रत हँस पड़ा।

"मैं चाहती हूँ कि एक बार आप मेरे घर आओ और माँ-पिता से मिल लो,"रमा ने पूरी संजीदगी से कहा।

देवव्रत ने भी उसी गर्मजोशी से उत्तर दिया,"जैसी आपकी आज्ञा।" किंचित रुककर उसने कहा,"परन्तु गुरुदेव से मिलने के बाद।"

दोनो हँस पड़े।

रात में रमा ने गुरुदेव को फोन किया।"आपका आशीर्वाद इतनी जल्दी फलीभूत होगा,मैंने सोचा नहीं था,"प्रणाम करने के बाद उसने कहा,"कल हमदोनो आपका दर्शन करने रहे हैं।"

गुरुदेव ने कहा,"दस बजे के बाद ही आना और दोपहर का तुम दोनो का प्रसाद यहीं आश्रम में मेरे साथ ही होगा।"

रमा का मन प्रफुल्लित हो उठा।उसने इसे शुभ संकेत माना।गुरुदेव की उसके पूरे परिवार पर कृपा रहती है।बचपन से ही वह पिता-माँ के साथ आश्रम जाती रही है।एक बार मन में आया कि देवव्रत को फोन करके बता दे परन्तु उसने स्वयं को रोक लिया।कब तक जागती रही और कब सोयी,पता ही नहीं चला। प्रातः माँ ने जगाया।

समय से दोनो गुरुदेव के सामने उपस्थित हुए।

"मैं प्रतीक्षा कर ही रहा था,"गुरुदेव ने कहा,'दोपहर तक हम पूर्णतः स्वतन्त्र हैं और हमारी बातचीत थोड़ी दूर स्थित पंचवटी की शीतल छाया में होगी।"

रमा को यह स्थान बहुत आध्यात्मिक और शान्त लगा। स्निग्ध वातावरण मनोहारी तो था ही,रमा को लगा मानो कोई अदृश्य बोझ उतर रहा हो।

बिना देर किये गुरुदेव ने देवव्रत से कहा,"तुम्हारी चिन्तायें उचित और सामयिक हैं। देश के सभी नागरिकों,विशेष रुप से युवाओं को आज की हर स्थिति-परिस्थिति पर गहन विचार करना चाहिए।अच्छाई और बुराई आदिकाल से है।राम-रावण,कृष्ण-कंस,पाण्डव-कौरव,आदिशक्ति-दैत्यों,निशाचरों के बीच का युद्ध होता रहा है। आज स्थिति इसलिए भयावह है कि बुराई सभी के भीतर व्याप्त हो गयी है और अधिकांश लोग बुराई का ही पक्ष लेते हैं।"

देवव्रत और रमा ध्यान से सुनते रहे।

गुरुदेव ने अपना प्रवचन जारी रखा,"कर्म का फल सभी को भोगना है।कोई बच नहीं सकता। जो अच्छाई के खिलाफ एकत्र हो रहे हैं,उनसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।कोई है जो हम सभी को देखता है और न्याय करता है। हमें उस शक्ति पर विश्वास करना होगा।हर व्यक्ति को अपना सही कर्म करना चाहिए।यह संसार परमात्मा का है और इसका संचालन वह सदैव सफलतापूर्वक करता है।जो हो रहा है, वही उसकी मर्जी है।"

देवव्रत को बहुत सी बातें असहज करने लगीं और उसके ध्यान में हत्यायें,मारकाट,घोटाले और गाली-गलौज के दृश्य उभरे।गुरुदेव समझ गये। उन्होंने कहा,"यह आत्माओं का खेल है।पतित और भटकी हुई आत्मायें भी अपना कल्याण चाहती हैं परन्तु उन्हें दुख-भोगना हॊ पड़ता है।आज की राजनीति ने लोगो को बाँट दिया है।लोग दूर तक देख नहीं पाते।तात्कालिक स्वार्थ में पड़कर अनुचित निर्णय करते हैं।एक पुरोहित ने अपने यजमानों से जीवन के अन्तिम दिनों में कहा कि आज तक आपलोगों को कथा सुनाता रहा और दान-दक्षिणा लेता रहा।आज सत्य कहता हूँ,आप लोग सही मन से ईश्वर को समर्पित हो जाओ,उसी में सद्गति है।

देवव्रत का मन शान्त होने लगा।उसने कहा,"गुरुदेव आपकी बातें समझ में रही हैं परन्तु कभी-कभी चिन्ता होने लगती है।"

"संसार में रहो,शादी करो और विवेक-सम्मत कर्म करो,"गुरुदेव ने मुस्कराते हुए कहा,"जो उचित लगे,करते रहो।शेष परमात्मा पर छोड दो।वह न्याय ही करेगा।"

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