सुबह की चाय

16 फरवरी 2019   |  श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

सुबह की चाय - शब्द (shabd.in)

सुशीला जो की एक मध्यम परिवार की महिला हैं॰॰॰॰॰ उसका पति मोहन गावों के बाहर एक मील में सुबह 10 बजे से रात को 11 बजे तक की नौकरी करता हैं. सुशीला और मोहन के अलावा घर में बापूजी भी साथ रहते हैं. तीनो में आपस में बड़ा लगाव और प्रेम है. ये छोटा सा परिवार बड़ी ख़ुशी से अपनी ज़िंदगी जीता है. बापूजी भी आपने आप में बड़े सतुष्ट व्यक्ति हैं, मगर हैं बड़े चाय के शौक़ीन.


मोहन को घर आते-आते काफी रात हो जाने के कारण सुशीला रसोईघर का सामान दो दिन पहले ही लाने को कह देना उचित समझती हैं । जिससे मोहन सुबह या जब भी उसके पास समय हो, वो सामान लेके रख दे. क्यूंकि घर की और सुशीला की जरुरत की चीज़े न भी हों तो वो काम चला लेती है मगर बापू जी को भले एक समय का भोजन देर से मिले पर सुबह-सुबह की चाय तो उनको समय पर चाहिए.


गाँव का परिवार है ऐसे में बहू घर से बाहर जाकर कोई सामान लाती है तो गाँव में दस तरह की बातें तो होती है और फिर बापूजी भी भला किसी पडोसी से समान ले ये तो इनके स्वभिमान के परे ही हैं ।


चीनी कम होते देख सुशीला ने अपने पति को चीनी लेन के लिए दो दिन पहले से कह कर रखा पर मोहन की नौकरी से आते-आते दुकाने ही बंद हो जाती है॰॰॰ गाँव की वहीं चार- पाँच दुकाने.


'चीनी ले आये क्या..सुबह बापूजी को चाय बनानी हैं?' सुशीला ने मोहन को आते ही बोला, सुशीला जानती थी की मोहन आज भी चीनी लेकर नहीं आये होंगे, लेकिन ये उसका याद दिलाने का बहाना था.


'अरे मैं क्या करू दुकाने बंद हो गई ॰॰॰॰' मोहन ने आँखें चुराते हुए सुशीला को जवाब दिया.

'अब क्या करें'-सुशीला बोली.


'करना क्या हैं, सुबह थोड़ी डॉट खा लेना...' मोहन सुशीला से बोला.


'अरे वाह ! मैं क्यों डॉट सुनु,' सुशीला पलटते हुए बोली, 'मैंने तो दो रोज पहले से ही आपको बता दिया था की घर में चीनी लाना हैं, अब आप ही सब सभालना बड़े आये डांट खा लेना...' कहते हुए सुशीला किचन में चली गई.


'अच्छा -अच्छा सुबह देखते हैं ॰॰॰' मोहन ने झट से बोला और दोनों खाना खाने की लिए तैयारी करने लगे.


सुबह हुई, बापूजी उठे स्नान आदि कर के तैयार हो गए और सुशीला को आवाज़ लगाई की.. 'अरे अख़बार के साथ चाय कहा हैं ॰॰'

बहु सुशीला अपने तेज़ तर्रार दिमाग से तरकीब लगाई और थोड़ा झिझकते हुए बोली- '॰॰॰बापूजी, दूध बिल्ली पी गयी,'


'....तो मोहन कहाँ है उससे बोल की दूध और ले आये.,' बापू जी ने अखबार का पन्ना पलटते हुए सुशीला को बोला.


'वो... बापूजी ये गए थे, तब तक पूरा दूध बिक चूका था, लेकिन बापू जी आप चिंता मत करो बस थोड़ी देर में ही दुकान खुलते से ही दूध मांगा कर चाय बना दूँगी'


फिर क्या बापू जी को चाय ना मिलने पर बापूजी का मूड ख़राब हो गया. ये बात सुशीला भी जानती थी की बापू जी का मूड अब ख़राब होने वाला है मगर वो क्या करती.


उधर बाबूजी की बड़बड़ शुरू ॰॰॰॰


इधर मोहन दुकान खुलते ही चुपके से शक्कर लेकर किचन में रख देता है. उस समय मोहन सुशीला और बापू जी सारी बातें सुन चूका था.


मोहन सुशीला को धन्यवाद देते हुए कहता हैं ॰॰'सुशीला आज तुमने बाबूजी की कहासुनी सुन कर मेरी गलती अपने सर ले ली पर अब से तुम्हारे रसोईघर की चीजें दो दिन पहले ही ला दूंगा॰॰॰॰'


अपनी मुस्कराहट को दबाते हुए सुशीला बोली - 'ठीक हैं ॰॰ठीक हैं, हटो अब मुझे बापू जी को चाय देने दो, वैसे ही बहुत देर हो चुकी है' मोहन के चेहरे पर भी एक हलकी से मुस्कान आ चुकी थी.


सुशीला ने लाकर बापूजी को चाय दी, बापूजी भी अपनी सुबह की चाय को देखते हुए सारा गुस्सा भूल गए. सुशीला, मोहन और बापूजी अपनी-अपनी 'सुबह की चाय' की चुस्कियां लेने में मस्त हो गए.

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